मनन करय योग्यः सिद्धिक आधार श्रद्धा

आध्यात्मिक कथा

(अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी)
बहुत पहिनेक बात थिक। सिंहकेतु नामक एक पंचालदेशीय राजकुमार अपन सब सेवक संग लय केँ एक दिन वन मे शिकार खेलाय लेल गेलाह। हुनकहि सेवक मध्य एक शबर केँ शिकारक खोज करैत समय एम्हर-ओम्हर घूमैत एकटा टूटल-फूटल शिवालय देखाय पड़लैक। तेकर चबूतरा पर एकटा शिवलिंग पड़ल छलैक, जे टूटिकय जलहरी सँ सर्वथा अलग भऽ गेल छलैक। शबर ओहि शिवलिंग केँ मूर्तिमान् सौभाग्यक समान उठा लेलक। ओ राजकुमारक पास पहुँचल आ बड़ा विनयपूर्वक ताहि शिवलिंग केँ देखाकय कहय लागल, “प्रभो! देखू, ई कतेक सुन्दर शिवलिंग अछि! जँ अहाँ कृपापूर्वक हमरा पूजाक विधि बता दी तँ हम नित्य एकर पूजा कयल करू!”
 
निषाद केर एहि तरहें पूछलापर राजकुमार प्रेमपूर्वक पूजाक विधि बता देलनि। षोडशोपचार पूजनक अतिरिक्त ओ चिताभस्म चढेबाक बात सेहो बतौलनि। आब ओ शबर प्रतिदिन ओहि शिवलिंग केँ स्नान कराकय चन्दन, अक्षत, वनक नव-नव पत्र, पुष्प, फल, धूप, दीप, नृत्य, गीत, वाद्यक द्वारा भगवान् महेश्वरक पूजा करय लागल। ओ प्रतिदिन चिताभस्म सेहो अवश्य भेंट करैत छल। तत्पश्चात् ओ स्वयं प्रसाद ग्रहण करय। एहि तरहें ओ श्रद्धालु शबर पत्नीक संग भक्तिपूर्वक भगवान् शंकर केर आराधना मे पूर्णरूपेण डूबल रहैत छल।
 
एक दिन ओ शबर पूजा लेल बैसल तऽ देखैत अछि जे पात्र मे चिताभस्म कनिकबो शेष नहि छलैक। ओ बड़ा प्रयत्न सँ एम्हर-ओम्हर तकलक, मुदा ओकरा कतहु चिताभस्म नहि भेटलैक। अन्त मे से बात ओ पत्नी सँ कहलक। संगहि ओ ईहो कहलक जे ‘जँ चिताभस्म नहि भेटत तऽ पूजाक बिना हम आब क्षणो भरि जीवित नहि रहि सकब’।
 
घरवाली ओकरा चिन्तित देखिकय कहलकैक, “नाथ! अहाँ डराउ नहि। एकटा उपाय अछि। ई घर तऽ पुरान भऽए गेल अछि। हम एहि मे आगि लगाकय एहि मे प्रवेश कय जाएत छी। एहि सँ अहाँ केँ पूजाक निमित्त पर्याप्त चिताभस्म तैयार भऽ जायत।” बहुत वाद-विवादक बाद शबर सेहो ओहि प्रस्ताव सँ सहमत भऽ गेल। शबरी तखन स्वामीक आज्ञा लय स्नान केलक आर ओहि घर मे आगि लगाकय अग्निक तीन बेर परिक्रम केलक, पति केँ नमस्कार कय आर सदाशिव भगवान् केँ हृदय मे ध्यान करिते आगि मे घुसि गेल। ओ क्षणहि भरि मे जैरकय भस्म भऽ गेल। फेर शबर वैह भस्म सँ भगवान् भूतनाथ केर पूजा केलक।
 
शबर केँ कोनो विषाद तऽ छलैक नहि। स्वभाववशात् पूजाक बाद ओ प्रसाद देबाक लेल अपन स्त्री केँ शोर पाड़लक। स्मरण करिते ओ स्त्री तुरंत आबिकय ठाढ भऽ गेलैक। आब शबर केँ ओकर जरबाक बात याद एलैक। आश्चर्यचकित होएत ओ पूछलकैक जे ‘अहाँ आर ई मकान तऽ सबटा जैर गेल छल, फेर ई सब कोना भेल?”
 
शबरी कहलकैक, “आगि मे हम घुसलहुँ तऽ हमरा लागल जेना हम जल मे घुसि रहल छी। आधा क्षणतक तऽ प्रगाढ निद्रा जेकाँ लागल आर फेर आब जगलहुँ अछि। जगलापर देखैत छी जे ई घर सेहो पूर्ववत् ठाढ अछि। आब प्रसादक लेल एतय एलहुँ अछि।”
 
निषाद-दम्पती एना बात कइये रहल छलाह ता धरि हुनका सभक सोझाँ एकटा दिव्य विमान आबि गेल। ओहि पर भगवान् केर चारि टा गण छलाह। ओ जहिना हुनका लोकनि केँ स्पर्ष कयलन्हि आर विमानपर बैसौलनि, हुनका लोकनिक शरीर दिव्य भऽ गेल। वास्तव मे श्रद्धायुक्त भगवदाराधना एहने माहात्म्य छैक। (स्कन्दपुराण)
 
हरिः हरः!!