साधनोपयोगी पत्र – मानव जीवन केँ सफल बनेबाक सहज सूत्र (अवश्य पठनीय)

स्वाध्याय

स्रोतः कल्याण, अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी

१. वैराग्य आर भजन केना हो?

प्रिय महोदय!

सप्रेम हरिस्मरण!

अपनेक एक पत्र पहिने भेटल छल। किछु समयक बाद दोसर सेहो भेटल। पहिले पत्रक जबाब नहि देल जा सकल, एकरा लेल कोनो तरहक विचार नहि करबा चाही। अहाँ हमर पत्रक प्रतीक्षा करैत रहैत छी, ई अहाँक बड पैघ प्रेमक बात छी। एतेक प्रेम करयवला प्रेमी लोकनि केँ हम समय पर हुनकर पत्रक उत्तर तक नहि लिख पबैत छी, एहि अपराध सँ छुटबाक लेल सेहो प्रेमीजनक प्रेमक मात्र भरोसा अछि। अपन शक्ति सँ तऽ किछुओ होएत नहि देखाएछ। प्रेमक सामने कोनो शक्ति किछु काजो नहि करैत छैक।

‘हर समय वैराग्य बनल रहय तथा भगवानक स्मरण होएत रहय’ ‍ एहि तरहक अहाँक अभिलाषा बहुते सराहनीय अछि। जगत् केर अनित्यता, दुःखरूपता आर भयानकता केर नीक जेकाँ ज्ञान भेलाक बाद जगत् केर पदार्थ सभ मे आसक्ति नहि रहैत छैक। जाबत धरि एहि मे नित्यता, सुख आर रमणीयताक अर्थ लगैत रहत ताबत धरि एहि मे राग अछि। एकरा वास्ते बेर-बेर संसार मे जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधिरूप दुःख-दोष देखबाक चाही तथा सत्संग, विचार आर विवेक केर द्वारा रमणीयता, सुख तथा नित्यताक बोध करबाक चाही।

वास्तव मे ई सब विषय जाहि रूप मे देखाएत छैक, ताहि रूप मे छहिये नहि। हम सब अपन मोहाच्छादित दृष्टिक कारण टा एकर स्वरूप यथार्थ नहि देखि पबैत छी, ताहि सँ एहि सब मे फँसावट भऽ रहल अछि। जहर सँ भरल नकली सोनाक घैलक समान, अथवा सुगन्धित इत्र आदि वस्तु सँ झाँपिकय राखल गेल विष्ठाक समान, अथवा सोनाक खोली सँ मढल रहल जहरीला साँपक समान, अथवा छाउर सँ झाँपल रहल प्रबल आगिक समान संसार केर विषय बेर-बेर मृत्यु देबयवला, घृणित, जहरीला तथा जराबयवला होएछ।

एना तरहें बुझिकय – तथा एकर परिवर्तनशीलता, क्षणभंगुरता, दृष्टिभेद सँ अनुकूल एवं प्रतिकूलरूपता, वियोगशीलता, मृत्युमयता आदिपर विचार कय केँ एहि सब सँ मोन हँटेबाक चाही। एहि सभक रूप जखन ठीक-ठीक समझ मे आबि जायत तखन एहि सब सँ राग निकलिकय स्वतः अपनहि एहि सँ वैराग्य भऽ जायत। फेर जाहि तरहें हम सब जानि-बुझिकय अफीम नहि खाएत छी, आगिक ढेरी मे हाथ नहि घोंसियबैत छी, साँप केँ हाथ नहि लगबैत छी, विष्ठा केँ नहि छूबैत छी – ताहि तरहें विषय सँ अलग भऽ जाएत छी। एहि मे प्रीति होयब तथा ओकरा ग्रहण करब त अलग रहल, एकर चिन्तन सेहो हमरा लोकनि केँ नहि सोहायत। विषय सभक चर्चा सेहो नूनगर लागय लागत।

एहि तरहें भगवानक स्मरण नहि होयबा मे सेहो प्रधान कारण भगवानक यथार्थ तत्त्व, प्रभाव, रहस्य, महिमा आर गुणक ज्ञान केर अभाव टा होएछ। श्रीभगवानक एको टा गुणक रहस्य, एको टा नामक महिमा, एको टा चरित्रक प्रबाव, एको टा शक्तिक तत्त्व जानि लेल जाय अथवा एको टा रूपक कनिको-टा झाँकी मात्र केर ज्ञान सेहो जँ भऽ जाय तँ फेर भगवान् सँ क्षणहु भरि लेल चित्त नहि हँटय। फेर विषय मे दुःख-दोष देखिकय ओहि सँ चित्त हँटेबाक आवश्यकता नहि रहत, अपने-आप विषय सभ मे आसक्ति नष्ट भऽ जाएत छैक। जाहि तरहें सूर्य भगवान् केर उदय भेलापर दीपक मे कोनो आकर्षण नहि रहैत छैक, तहिना भगवानक कनिको टा झाँकी देखा गेलाक बाद विषयक सब रस अनेरौ फीका भऽ जाएत छैक। असल बात तऽ यैह छैक जे फेर ओकर तात्त्विक दृष्टि मे विषय सभक अस्तित्वे नहि रहैत छैक। एकमात्र सच्चिदानन्दघन भगवान् मात्र अखण्ड, अचल, सनातन, अज, अविनाशी, सर्वव्यापिनी सत्ता रहि जाएत छैक। ओकरा फेर आनन्दघन परमात्माक सिवाय आर किछुओ नहि अर्थाएत छैक। एहि अवस्था मे ओकरा सँ परमात्माक असली भजन अपनहि-आप होमय लगैत छैक। वास्तव मे सूर्य आर दीपक केर उदाहरणक तुलना परमात्माक ज्ञान आर विषय आदिक संग नहि भऽ सकैत अछि, तथापि बुझबाक लेल उदाहरण देल जाएत अछि।

संसार केर विषय सभक स्वरूप तथा परमात्माक महिमाक यथार्थ रूप सँ जानबाक लेल सत्संग तथा भजन मात्र प्रधान साधन थिक। वैराग्यवान् सच्चा विरक्त, अनन्य भगवत्प्रेमी आर सम्यग्‌दर्शी ज्ञानी केर सत्संग सँ विषय सभक आ भगवानक स्वरूप-स्थिति सुनबाक-जनबाक लेल भेटैत अछि। फेर भजन कयला सँ मल केर नाश भेलापर सुनल तथा जानल गेल बात केँ हृदय ग्रहण करैत अछि। तैँ जहाँ धरि बनि सकय, सर्वस्व त्यागिकय पर्यन्त भजन तथा सत्संग लेल मनुष्य केँ पर्यत्न करबाक चाही।

हर समय नामजप केना हो?

‘हरेक समय भगवानक नाम केर जप भेल करय’ एकर उपाय पूछने छी से स्वाभाविक नाम-स्मरण तऽ भगवानक महत्व जानले सँ होएत छैक। भगवानक नामपर जेना-जेना विश्वास, प्रेम बढैत अछि, तेना-तेना नामजप बेसी भऽ सकैत अछि। भगवानक नाम मे भूल होयब अभ्यासक अभावक कारण होएछ; मुदा प्रधान कारण तऽ विश्वास आर प्रेमक कमी टा बुझबाक चाही। विश्वास तथा प्रेम सेहो भजन आर सत्संग सँ होएत छैक। ताहि लेल सत्संग तथा नामजप-रूपी भजन केर मात्र विशेष अभ्यास करबाक चाही। भजन करैत-करैत – भगवानक नामजप केर अभ्यास करैत-करैत विश्वास बढिकय नामजप मे अपने-आपे प्रगति भऽ सकैत अछि। नामजप मे असली उन्नति तखनहि बुझबाक चाही, जखन नामजप मे भूल नहि हो तथा एक-एक नाम मे एहेन महान आनन्द आबय कि जेकर तुलना सम्राट्-पद केर प्राप्ति सँ सेहो नहि कयल जा सकैक तथा एतेक प्रेम उपजय कि नाम-स्मरणक संगहि देह-सिहरन, दहोबहो नोर बहब, कंठ भरब आ गद्गद् वाणी आदि होमय लागय।

महापुरुषक महिमा

महापुरुषक दया बाबत लिखलहुँ से तऽ ठीक छैक; मुदा हमरा अहाँ महापुरुष बुझलहुँ, ई अहाँक गलती थिक। हम त साधारण आदमी छी। ओना त एकलव्य भील पाथरहि केर मूर्ति केँ अपन श्रद्धा सँ द्रोणाचार्य बुझि लेने छलाह। एहि तरहें अहाँ किनकहु मे महापुरुषक भावना कय सकैत छी; लेकिन सच मे हम त महापुरुषक चरण-धुलि केर सेहो भिखारी टा छी। रहल महापुरुषक दयाक बात, से महापुरुष लोकनि तँ सबपर स्वाभाविके दया सदिखन रखैत छथि, केकरो सच्चा महापुरुष भेट गेल तऽ ओकर सहजहि कल्याण भऽ सकैत छैक। हुनक महापुरुषत्वपर आर हुनकर दयापर विश्वास करयवला आर हुनकर आज्ञा आर रुचिक अनुसार आचरण करयवला एक-सँ-एक उत्तरोत्तर श्रेष्ठ छथि। अपना केँ महापुरुषक शरण कय दियए तथा महापुरुषक रुचिक अनुसार जीवन बना लियए, तखन तँ ओहि क्षण कल्याण भऽ जाय।

अहाँ केँ श्रीगंगाजीक तटपर जेबाक बहुत इच्छा होएत अछि, से श्रीगंगाजीक तट त परम पवित्र अछि आर ओतय निवास करब सेहो बड़ा सौभाग्यक चिह्न अछि, मुदा कहियो कतहु जेबा-एबाके संकल्प नहि कयकेँ श्रीभगवानक नाम केर जप विशेष प्रेम तथा विशुद्ध मुख्य भाव सँ करबाक चेष्टा करक चाही। भगवान् केर नाम सँ सब किछु सहज भऽ सकैत अछि। शेष प्रभुकृपा!

२. भगवत्पूजाक भाव सँ धन कमाउ

सप्रेम हरिस्मरण!

जगत् मे सब स्वार्थक मात्र सम्बन्ध छैक। वस्तुतः कियो केकरो नहि थिकैक। अहाँ माता-पिताक सेवाक लेल धन कमेबाक आवश्यकता बतेलहुँ, से ठीक अछि। धन कमेनाय खराब बात थोड़े न छैक! नीक नियत सँ आर न्यायपूर्वक धन जरूर कमेबाक चाही, मुदा से वास्तव मे अपन हाथक बात नहि थिकैक। प्रारब्धक अनुसार जेहेन हेबाक हेतैक, से हेतैक। न्याययुक्त चेष्टा करू। भगवानक आज्ञा मानिकय – भगवानक पूजाक बुद्धि सँ धन कमेबाक प्रयत्न करू। भगवान् जँ रचिकय राखि देने हेता तऽ धन भेट जायत। नहि रचने हेता त नहि भेटत। भगवानक विधानपर संतोष करबाक चाही।

भगवत्प्रेमक बात हम कि लिखू! हम तऽ प्रेम सँ बहुत दूर छी। हँ, सुनने छी – भगवत्प्रेम बहुत ऊँच वस्तु थिक। मोक्ष तक केर इच्छाक त्याग कयला सँ ओहि प्रेमक प्राप्ति होएत छैक। हम त एक श्रीभगवन्नाम केँ जनैत छी। ओकर पूरा महत्व तँ नहि जनैत छी – मुदा विश्वास अछि जे भगवन्नाम सँ सब किछु भऽ सकैत छैक आर अहाँ केँ सेहो तेकरे आश्रय लेबाक नम्र सलाह दैत छी।

अहाँ माता-पिताक सेवाक उद्देश्य सँ, एहि कर्मक द्वारा भगवत्पूजनक भाव सँ भगवन्नाम केर जप करैते धन कमेबाक न्याय आर सत्ययुक्त प्रयत्न करू आर भगवान् फलरूप मे जे किछु दय दैथि, ओकरे माथ पर चढाउ। शेष प्रभुकृपा!

हमर नोटः

उपरोक्त पत्र लिखनिहार व्यक्तित्वक नाम नहि भेटबाक कारण हम श्रद्धेय स्वामी रामसुखदासजी महाराज, गीताप्रेस केर संस्थापक ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका, आदिसम्पादक नित्यलीलालीन भाईजी श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार तथा सम्पादक श्री राधेश्यामजी खेमका, सह-सम्पादक डा. प्रेमप्रकाश लक्कड़ सहित समस्त ओहि महानुभाव केँ सुमिरैत छी जे एतेक सुन्दर-सुन्दर सन्देश आ सद्ज्ञान सँ भरल ‘कल्याण’ पत्रिकाक प्रकाशन-वितरण करैत छथि। संगहि, हमरा जाहि स्रोत सँ ई पोथी प्राप्त होएत अछि, ताहि महापुरुष स्व. रामानन्द जाजू एवं श्रीमान् महेश जाजू प्रति सादर आभार प्रकट करैत छी। जीवन धन्य भऽ रहल अछि जे भगवानक दया सँ भेटल किछु समय एहेन सुन्दर ज्ञानामृत ग्रहण करबाक अवसर भेटि जाएत अछि, आर धन्य-धन्य बुझि रहल छी अपन भाग्य केँ जे एकरा पुनः मैथिलीकरण कय अपन मिथिलावासी धरि एहि घोर कलिकाल मे सोझाँ राखि पबैत छी। अस्तु! प्रणाम!! जय सियाराम!! जय जय सियाराम!!