द्वादश ज्योतिर्लिंगः मल्लिकार्जुन – दक्षिणक कैलाश केर पौराणिक आ लौकिक स्वरूप

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग – पौराणिक आ लौकिक स्वरूप

आन्ध्र प्रदेश केर कृष्णा ज़िला मे कृष्णा नदी केर तट पर श्रीशैल पर्वत पर श्रीमल्लिकार्जुन विराजमान छथि। एकरा लोक दक्षिणक कैलाश कहैत छैक। अनेकों धर्मग्रन्थ सभमे एहि स्थानक महिमा कहल गेल अछि। महाभारतक अनुसार श्रीशैल पर्वत पर भगवान शिव केर पूजन कयला सँ अश्वमेध यज्ञ करबाक फल प्राप्त होइत अछि। किछु ग्रन्थ मे तऽ एतय धरि लिखल छैक जे श्रीशैल केर शिखरक दर्शन मात्र करय सँ दर्शकक सब तरहक कष्ट दूर भागि जाइत अछि, ओकरा अनन्त सुख केर प्राप्ति होएत छैक आर आवागमन केर चक्कर सँ मुक्त भऽ जाइत अछि। एहि आशय केर वर्णन शिव महापुराण केर कोटिरुद्र संहिताक पन्द्रहम अध्याय मे उपलब्ध होइत अछि –
 
तदिद्नं हि समारभ्य मल्लिकार्जुन सम्भवम्।
लिंगं चैव शिवस्यैकं प्रसिद्धं भुवनत्रये॥
तल्लिंग यः समीक्षते स सवैः किल्बिषैरपि।
मुच्यते नात्र सन्देहः सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥
दुःखं च दूरतो याति सुखमात्यंतिकं लभेत।
जननीगर्भसम्भूत कष्टं नाप्नोति वै पुनः॥
धनधान्यसमृद्धिश्च प्रतिष्ठाऽऽरोग्यमेव च।
अभीष्टफलसिद्धिश्च जायते नात्र संशयः॥
 
पौराणिक कथानक मे सूत तथा ऋषि-मुनिक आपसी बातचीत सँ श्रीशैलम् मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंगक कथा एहि सँ पूर्व मे प्रकाशित कयल जा चुकल अछि। शिव पार्वती केर पुत्र स्वामी कार्तिकेय और गणेश दुनू भाइ विवाहक लेल आपस मे झगड़ा करय लगलाह। कार्तिकेय केर कहब छलन्हि जे ओ पैघ छथि, ताहि लेल विवाह पहिने हुनकर हेबाक चाहियनि। मुदा श्रीगणेश अपन विवाह पहिने करय चाहि रहल छलाह। एहि झगड़ा पर फैसला देबाक लेल दुनू भाइ अपन माता-पिता भवानी और शंकर केर पास पहुँचलाह। हुनका लोकनिक माता-पिता कहलखिन जे तूँ दुनू गोटा मे सँ जे कियो एहि पृथ्वीक पहिने परिक्रमा कयकेँ पहिने हमरा सभक पास एतय आओत, ओकरे विवाह पहिने हेतैक। शर्त सुनित कार्तिकेय जी पृथ्वीक परिक्रमा करबाक लेल दौड़ि पड़लाह। एम्हर स्थूलकाय श्री गणेश जी और हुनकर वाहन सेहो मूस, भले एतेक जल्दी सँ ओ परिक्रमा कोना कय सकितथि! गणेश जी केर सामने भारी समस्या उपस्थित रहनि। श्रीगणेश जी शरीर सँ ज़रूर स्थूल छलाह, लेकिन ओ बुद्धिक सागर छथि। ओ कनिके सोच-विचार कयलन्हि आ अपनहि माता पार्वती तथा पिता देवाधिदेव महेश्वर सँ एकटा आसन पर बैसबाक आग्रह कयलन्हि। ओहि दुनू गोटा केँ आसन पर बैसि गेलाक बाद श्रीगणेश द्वारा हुनकहि लोकनिक सात बेर परिक्रमा कय, फेर विधिवत् पूजन कयलन्हि –
 
पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति यः।
तस्य वै पृथिवीजन्यं फलं भवति निश्चितम्॥
 
एहि तरहें श्रीगणेश माता-पिता केर परिक्रमा कयकेँ पृथ्वीक परिक्रमा सँ प्राप्त होमयवला फल केर प्राप्तिक अधिकारी बनि गेलाह। हुनक चतुर बुद्धि केँ देखि कय शिव और पार्वती दुनू बहुत प्रसन्न भेलाह आर ओ सब श्रीगणेश केर विवाह सेहो करा देलनि। जखन स्वामी कार्तिकेय सम्पूर्ण पृथ्वी केर परिक्रमा कयकेँ वापस एलाह, ताहि समय श्रीगणेश जीक विवाह विश्वरूप प्रजापति केर पुत्री सिद्धि एवं बुद्धिक संग भऽ चुकल छलन्हि। एतबा टा नहि, श्री गणेशजी केँ हुनक ‘सिद्धि’ नामक पत्नी सँ ‘क्षेम’ तथा बुद्धि नामक पत्नी सँ ‘लाभ’, ई दू पुत्ररत्न सेहो भेट गेल छलन्हि। भ्रमणशील और जगत् केर कल्याण करनिहार देवर्षि नारद द्वारा स्वामी कार्तिकेय सँ ई समस्त वृत्तांत कहि सुनायल गेल। श्रीगणेश केर विवाह आर हुनका पुत्र लाभ केर समाचार सुनिकय स्वामी कार्तिकेय जैर उठला। एहि प्रकरण सँ नाराज़ कार्तिक शिष्टाचार केर पालन करैत अपन माता-पिताक चरण छुलनि आर ओतय सँ चलि पड़लाह।
 
माता-पिता सँ अलग भेलाक बाद कार्तिक स्वामी क्रौंच पर्वत पर रहय लगलाह। शिव और पार्वती अपन पुत्र कार्तिकेय केँ समझा-बुझाकय बजेबाक लेल देवर्षि नारद केँ क्रौंचपर्वत पर पठेलनि। देवर्षि नारद बहुतो प्रकार सँ स्वामी केँ मनेबाक प्रयास कयलन्हि, मुदा ओ वापस नहि एलाह। तेकरा बाद कोमल हृदय माता पार्वती पुत्र स्नेह मे व्याकुल भऽ गेलीह। ओ भगवान् शिव जी केँ संग लय क्रौंच पर्वत पर पहुँचि गेलीह। एम्हर स्वामी कार्तिकेय केँ क्रौंच पर्वतपर अपन माता-पिताक आगमन केर सूचना भेट गेलनि आर ओ ओतय सँ आरो तीन योजन अर्थात् छत्तीस किलोमीटर दूर चलि गेलाह। कार्तिकेय केर चलि गेलापर भगवान् शिव ओहि क्रौंच पर्वत पर ज्योतिर्लिंग केर रूप मे प्रकट भऽ गेलाह। तहिये सँ ओ ‘मल्लिकार्जुन’ ज्योतिर्लिंग केर नाम सँ प्रसिद्ध भेलाह। ‘मल्लिका’ माता पार्वती केर नाम थिक, जखन कि ‘अर्जुन’ भगवान् शंकर केँ कहल जाइत छन्हि। एहि तरहें सम्मिलित रूप सँ ‘मल्लिकार्जुन’ नाम उक्त ज्योतिर्लिंग केर जगत् मे प्रसिद्धि पेलक।
 

अन्य कथानक

एक अन्य कथानक अनुसार कौंच पर्वत केर समीपहि मे चन्द्रगुप्त नामक कोनो राजाक राजधानी रहय। हुनक राजकन्या कोनो संकट मे पड़ि गेल छलीह। ओहि विपत्ति सँ बचबाक लेल ओ अपन पिताक राजमहल सँ भागिकय पर्वतराज केर शरण मे पहुँचि गेलीह। ओ कन्या ग्वाला सभक संग कन्दमूल खाइथ आ दूध पिबैत छलीह। एहि प्रकारें ओकर जीवन-निर्वाह ओहि पर्वत पर होमय लागल। ओहि कन्याक पास एकटा श्यामा (काली) गौ छलीह, जेकर सेवा ओ अपने करैत छलीह। ओहि गौ केर संग विचित्र घटना घटित होमय लागल। कियो व्यक्ति नुकाकय प्रतिदिन ओहि श्यामाक दूध दूहि लैत छल। एक दिन ओ कन्या कुनु चोर केँ श्यामाक दूध दुहिते देख लेलक, देखिते ओ क्रोध सँ आगिबबूला भऽ ओकरा मारय लेल दौड़ि गेली। जखन ओ गौ केर नजदीक पहुँचली, तऽ आश्चर्यक ठेगान नहि रहलनि, कियैक तँ ओतय हुनका एकटा शिवलिंग केर अतिरिक्त आर किछुओ नजरि नहि पड़लन्हि। आगाँ जा कय ओ राजकुमारी ओहि शिवलिंग केर ऊपर एकटा सुन्दर सन मन्दिर बनवा देलीह। वैह प्राचीन शिवलिंग आइ ‘मल्लिकार्जुन’ ज्योतिर्लिंग केर नाम सँ प्रसिद्ध अछि। एहि मन्दिर केर भलीभाँति सर्वेक्षण कयलाक बाद पुरातत्त्ववेत्ता एहेन अनुमान केलनि अछि जे एकर निर्माणकार्य लगभग दुइ हज़ार वर्ष प्राचीन अछि। एहि ऐतिहासिक मन्दिर केर दर्शनार्थ बड़-बड़ राजा-महाराजा समय-समय पर अबैत रहैत छथि।
 

अन्य तीर्थ एवं दर्शनीय स्थल

 
मुख्य मंदिरक बाहर पीपर आ पाकैर केर सम्मिलित वृक्ष अछि। ताहिक आसपास चबूतरा छैक। दक्षिण भारत केर दोसर मंदिर सभक समान एतय सेहो मूर्ति तक जेबाक लेल टिकट कार्यालय सँ लेबय पड़ैत छैक। पूजाक शुल्क टिकट सेहो पृथक् होएत छैक। एतय लिंग मूर्ति केर स्पर्श प्राप्त होएत छैक। मल्लिकार्जुन मंदिर केर पाछाँ मे पार्वती मंदिर सेहो अछि। हिनका मल्लिका देवी कहल जाइत छन्हि। सभा मंडप मे नन्दीक विशाल मूर्ति छैक।
 

पातालगंगा – मंदिर केर पूर्वद्वार सँ लगभग दुइ मील पर पातालगंगा अछि। एकर मार्ग कठिन छैक। एक मील उतार आर फेर ८५२ टा सीढ़ी छैक। पर्वत केर नीचाँ कृष्णा नदी अछि। यात्री स्नान कय केँ ओतय सँ चढ़ेबाक लेल जल लैत छथि। ओतय कृष्णा नदी मे दुइ नाला मिलैत अछि। ओ स्थान त्रिवेणी कहाइत अछि। ओकरे समीप पूर्वक दिशा मे एकटा गुफा मे भैरवादि मूर्ति सब विराजमान् अछि। ई गुफा कतेको मील गहिंर कहल जाइत अछि। आब यात्री सब मोटर बस सँ ४ मील आबिकय कृष्णा मे स्नान करैत छथि।

 
भ्रमराम्बादेवी – मल्लिकार्जुन मंदिर सँ पश्चिम मे दू मील पर ई मंदिर अछि। ई ५१ शक्तिपीठ मे गानल जाइत अछि। एतय सतीक ग्रीवा गिरल छल।
 
शिखरेश्वर – मल्लिकार्जुन सँ ६ मील पर शिखरेश्वर तथा हाटकेश्वर मंदिर अछि। ई मार्ग कठिन अछि।
 
विल्वन – शिखरेश्वर सँ ६ मील पर एकम्मा देवी केर मंदिर घोर वन मे अछि। एतय मार्गदर्शक आ सुरक्षाक बिना यात्रा संभव नहि। हिंसक पशु एतुक वन मे बहुत अछि।
 
श्रीशैल केर ई समूचा क्षेत्र घोर वन मे अछि। तैँ मोटर मार्ग टा अछि। पैदल एतुका यात्रा केवल शिवरात्रि पर होएत छैक।
 

विजयनगर केर महाराजा द्वारा निर्माण

 
आइ सँ लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व श्री विजयनगर केर महाराजा कृष्णराय एतय पहुँचल छलाह। ओ एतय एकटा सुन्दर मण्डप केर सेहो निर्माण करौने छलाह, जेकर शिखर सोनाक बनायल गेल छल। तेकर डेढ़ सौ वर्ष बाद महाराज शिवाजी सेहो मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग केर दर्शन हेतु क्रौंच पर्वत पर पहुँचल छलाह। ओ मन्दिर सँ कनिकबा दूरी पर यात्री सभक लेल एकटा उत्तम धर्मशाला बनबौलनि। एहि पर्वत पर बहुतो रास शिवलिंग भेटैत अछि। एतय महाशिवरात्रिक दिन मेला लगैत अछि। मन्दिरक पास जगदम्बाक सेहो एकटा स्थान अछि। एतय माँ पार्वती केँ ‘भ्रमराम्बा’ कहल जाइत छन्हि। मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंगक पहाड़ी सँ पाँच किलोमीटर नीचाँ पातालगंगाक नाम सँ प्रसिद्ध कृष्णा नदी अछि, जाहि मे स्नान करबाक महत्त्व शास्त्र सभमे वर्णित अछि।
हरिः हरः!!
(संकलन एवं अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी, स्रोतः भारतकोश)