प्रभुक प्राप्ति साधना सँ नहि, सिर्फ मान्यता सँ – एक सहज आ सुन्दर दर्शन

स्वाध्याय

– श्रीरामसुखदासजी महाराज लिखित ‘जीनव का सत्य’ पुस्तक केर दोसर अध्याय “प्रभुकी प्राप्ति साधनासे नहीं, केवल मान्यतासे’ केर अनुवाद

– अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी

प्रभुक प्राप्ति साधना सँ नहि, सिर्फ मान्यता सँ

हमरा लोकनिक अनुभव यैह अछि जे हम वैह छी जे बाल्यकाल मे रही, मुदा ई शरीर आर संसार प्रतिक्षण बदैल रहल अछि। एहि तरहें शास्त्र कहैत अछि जे परमात्मा छथि। ‘हम’ आ ‘परमात्मा’ नहि बदलयवला छी आर शरीर तथा संसार बदलयवला अछि। ‘हम’ केर ‘परमात्मा’ सँ एकता भेल आर शरीर केर संसारक संग एकता भेल। एहि शरीर मे जे गाढापन अछि, वैह पृथ्वीक अंश थिक। एहिमे जे गर्मी अछि, ओ सूर्य तथा अग्निक अंश थिक। एकर वायु वायुक अंश थिक आर एहिमे पोलाहट यानि जे आंगूर गड़ैत अछि ओ आकाशक अंश थिक।

हम छी, ई आत्म-ज्ञान थिक आर परमात्मा छथि से परमात्म-ज्ञान थिक। हम आर परमात्मा केर एकता अछि आर शरीर तथा हमर कहायवला सामग्रीक संसारक संग एकता अछि। तैँ एहि अपन कहायवला वस्तुक द्वारा संसारक सेवा कय देबाक अछि आर अपना-आपकेँ परमात्मा केँ दऽ देनाय अछि। बस, एतबा बात छैक।

आब प्रश्न ई उठैत अछि जे जखन बात एतेक सुगम छैक तऽ फेर ई ठहरैत कियैक छैक? एकर उत्तर अछि जे अहाँ एहि बात केँ महत्व नहि दैत छी, आदर नहि दैत छी। ई अभ्यासजन्य नहि अछि। एकरा या त मानि लियऽ या जानि लियऽ। जेना ई नेपाल छी त अहाँ एकर अभ्यास नहि केलहुँ, सिर्फ मानि लेल जे ई नेपाल छी। अहाँ मानय मे स्वतन्त्र छी। मानय चाही त एखन मानि सकैत छी आर नहि मानय चाही त जन्म-जन्म धरि तक नहि मानि सकब। अहाँ अहिना टा मानि लियऽ जे परमात्मा छथि त काज बनि जायत। या फेर अहाँ जानि ली जे हमर (अविनाशीक) नाशवान् संसारक संग सम्बन्ध नहि अछि तैयो अहाँक काज बनि जायत। हम नहि बदलैत छी, मुदा शरीर आर संसार बदलैत अछि, ई एकदम सँ बुझल बात अछि। एहि जानय आ मानय मे अभ्यासक आवश्यकता नहि। यैह सत्य आर शास्त्रक बात थिक। जँ अहाँ एहि बात केँ आदरपूर्वक स्वीकार कय लेब त अहाँ केँ करोड़ों टका भेटला सँ ओहेन शान्ति नहि भेटत जतेक कि एहि बात केँ मानि लेला सँ भेटत।

एकटा बात आरो छैक जे अहाँ ओहि बात केँ महत्व नहि दैत छी जे बात मुफ्त मे भेट जाएत अछि। जँ एक-एक बातपर सौ-सौ टका टैक्स लगा देल जाय त संभवतः ओहि बात केँ आदर देबैक। आर खूब भटकलाक बाद, बद्रीनारायण जेहेन पहाड़ सब घूमलाक बाद यैह बात प्राप्त होयत तऽ एकरा महत्व दितियैक आ मानि लितियैक। एखन घरे बैसल बिना कोनो मूल्य देने ई बात भेट रहल अछि तैँ महत्व नहि दैत छी। जे कियो भाइ एहि बात केँ महत्व देलक अछि, एकर मूल्य चुकेलक अछि, ओकरा लाभ भेलैक अछि। जे कियो भाइ एहि बातक लेल अपमान सहलक अछि, निन्दा सहलक अछि, कष्ट सहलक अछि, विपरीत परिस्थिति सहलक अछि, ओकरा लाभ अवश्य भेलैक अछि; कियैक तऽ ओ मूल्य चुकेलक अछि। जँ जोरदार लगन आ तड़पन भऽ जाय तऽ तत्त्वज्ञान तत्काल भऽ जाय। तैँ अहाँ एहि बात केँ महत्व दी जे आब तऽ बात अहाँ केँ भेट गेल, आब ई नहि निकैल सकत।

उदयपुरक राणाक बारे मे सुनने छी जे ओ सत्संगक बात सुनैथ आर ओहिमे जे बात नीक लगैन, से सुनैत देरी तुरन्त चैल दैथ, ओ एहि लेल जे कहीं ईहो बात निकैल नहि जाय। तैँ आइये एहि बात केँ दृढता सँ पकड़ि लेल जाउ जे अहाँ स्वयं रहयवला छी आर ई शरीर संसार बदलयवला अछि। अहाँ नहि बदलयवला बदलनिहारक संग मिलि जाइत छी, अपन ओकरहि संग एकता मानि लैत छी, यैह गलती होएत अछि। जँ अहाँ एहि बदलयवला शरीर-संसारक संग नहि मिलब त समता मे स्वतः स्थिति होयत। अहाँ एकरा सँ भिन्न छी। एहि कारण अहाँ अनुकूलता-प्रतिकूलताक अनुभव करैत छी। दुनू परिस्थितिक अनुभव वैह कय सकैत अछि जे दुनू समय रहैत अछि। अहाँ परिस्थितिक प्रभाव केँ स्वीकार करैत छी, तखन सुखी-दुःखी रहैत छी। जँ परिस्थितिक प्रभाव केँ स्वीकार नहि करब त नहिये सुख होयत, नहि दुःख। समता मे स्वतः स्थिति भऽ जायत।

अहाँ सुनने होयब जे नारदजी व्यासजी केँ अपन पूर्व जन्मक बात कहलनि। नारदजी अपन मायक संग सन्त लोकनिक समीप जाइथ त हुनकर भगवान् मे भक्ति भऽ गेलनि। फेर हुनकर माँ मरि गेली। बच्चा केँ मायक मरलापर बहुत दुःख होएत छैक, कियैक तँ माँ बच्चाक आधार थिक। मुदा नारदजी खूब खुशी भेलाह। से सुखी-दुःखी होयब अपन हाथक बात थिक। एहि वास्ते भगवान् कहैत छथि –

‘न त्वं शोचितुमर्हसि।’ (गीता – २/२७)

‘तूँ शोक करय योग्य नहि छँ’ – आर अन्त मे कहैत छथिन ‘मा शुचः’ – शोक जुनि करे। शोक करब, नहि करब अपना हाथक बात थिक। शोक-चिन्ता करब, सुखी-दुःखी होयब प्रारब्धक फल नहि छी। अनुकूलता-प्रतिकूलताक एनाय-गेनाय प्रारब्ध (कर्म) केर फल थिक। मुदा ओहि मे सुखी-दुःखी भेनाय या नहि भेनाय अहाँक मर्जी छी, ई सुख-दुःख आबय-जायवला छी। एहि मे कि त सुखी होइ आ कि दुःखी होइ? बड़ा आश्चर्यक बात छैक। जेना एखन हम दरबज्जापर ठाढ भऽ जाय आर मोटर सब खूबे आबय त हम राजी भऽ जाय जे आइ तऽ खूब मोटर आयल। दोसर दिन मानू मोटर नहि आयल तऽ दुःखी भऽ जाय और लागय कानी जे आइ तऽ कुनू मोटर नहि आयल। एनाही अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति सब अबैत-जाइत रहैत छैक, कखनहुँ अनुकूल आबि गेल, कखनहि नहि आयल। कखनहुँ प्रतिकूल आबि गेल, कखनहुँ नहि आयल। ई धन-सम्पत्ति और परिवार आदि सबटा आबय-जायवला छी आर अहाँ रहयवला छी। एहिमे राजी या नाराज कियैक होइ? ‘समदुःखसुखः स्वस्थः’ सुख-दुःख मे सम रहला सँ अपन ‘स्व’ मे स्थित भऽ जायब। यानि परम आनन्द तथा परम शान्ति प्राप्त कय लेब, लोक सेहो प्रशंसा करत आर महात्मा कहत। भगवान् कहता जे हमर प्यारा छी। मुदा जँ सुख-दुःख मे सुखी-दुःखी होएत रहब त अपने त दुःख पेबे करब, लोक सब सेहो निन्दा करत आर भगवान् सेहो राजी नहि हेता। तऽ कहू जे कि फायदा भेल?

धनवान् भऽ गेनाय, स्वस्थ भऽ गेनाय, मान-प्रतिष्ठा प्राप्त कय लेनाय – ई अपना हाथक बात नहि छी। तखन फेर एहिे मे सुख-दुःख कियैक हुअय? आब एहि बात केँ आदर दी, महत्व दी, कीमत दी जे आब सुखी-दुःखी नहि होयब। एहि बात केँ सीखक नहि छैक। एकर अभ्यास नहि करक छैक। एकरा तऽ मानि लेबाक छैक। फेर बेर-बेर यादि करबाक आवश्यकता नहि छैक। जेना अहाँ अपना-आपकेँ ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्य मानि लेलहुँ। आब काज-धंधा करिते, खाना-पीना करिते ई याद नहि करय पड़ैत अछि। स्वतः याद रहैत अछि। जँ नहि याद रहय तैयो कोनो गलती नहि होयत। गलती कखन मानल जायत जे अहाँ ब्राह्मण छी, मुदा अपना-आपकेँ ब्राह्मण स्वीकार नहि कयकेँ शुद्र मानि लेलहुँ।

ताहि तरहें हम परमात्माक छी – ई मानि लियऽ फेर भले काज आदि करैत समय अहाँ बिसैरियो जायब, मुदा ई गलती नहि मानल जायत। गलती कखन मानल जायत? गलती ताहि समय मानल जायत, जाहि समय अहाँ मानि लेब जे हम परमात्माक नहि थिकहुँ। जँ अहाँ एना नहि मानितहुँ तऽ अखण्ड मान्यता भीतरे मे रहत। जेना अपन नाम, जाति, स्थान, देशक संग अखण्ड मान्यता भऽ जायत। ई नाम, जाति, स्थान, देश, शरीर आदि तँ अपन छी नहि, सिर्फ मानल गेल अछि। मुदा परमात्मा अपन थिकाह स्वयं भगवान्, सद्ग्रन्थ तथा सन्त एना कहैत छथि। अतएव आइये आ एखन-एखन ई बात मानि ली जे हम परमात्माक थिकहुँ आर परमात्मा हमर थिकाह।

नारायण! नारायण! नारायण! नारायण!!

हरिः हरः!!