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गीताक प्रथम अध्याय पर प्रवीण व्याख्या

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ॐ श्री परमात्मने नमः!!

श्री कृष्णचन्द्र भगवान् की जय !!

गीताक प्रथम अध्याय पर प्रवीण व्याख्या

(नोटः हम ततेक परिपक्व नहि छी जे दावी करी परफेक्शन के! मुदा पढ़िकय सामान्य लोक सेहो बुझय, ततबी लेल लिखि रहल छी । केवल मैथिली मे !)

गीता मे अमूल्य उपदेश देल गेल अछि । मुख्य पात्र अर्जुन छथि । अर्जुन अत्यन्त वीर धनुर्धर छलाह । पाण्डुपुत्र यानि पांडव भाइ लोकनि मे हिनक धनुर्विद्या संग शास्त्र, न्याय, दर्शन, धर्म आदि मे महारत छलन्हि ।

महाभारत मे गीताक उपदेश सँ पूर्वक कथा बहुते गोटे केँ बुझल होयत । कुरुवंश मे भाइ-भाइ बीच राज्यक बँटवारा मे एक पक्ष द्वारा दोसर पक्ष केँ छल-बल-कपट-मद-मत्सर-ईर्ष्याक कारण राज्यविहीन कय देल गेलैक, अनेक प्रताड़णा, सामुहिक हत्या, वनवास, अज्ञात वास, द्रौपदीक चिरहरण, जेहेन कतेको रास वीभत्स अत्याचार आ आततायीपनक बाद अन्तहु-अन्त धरि न्याय नहि देबाक जिद्द आ घमन्डक कारण आखिरकार दुनू (कौरव व पांडव पक्ष) युद्ध सँ न्याय प्राप्त करबाक प्रस्ताव पर सहमत भ’ ‘धर्मक्षेत्र’ रूप मे सुपरिचित कुरुक्षेत्र मे जुटल । दुनू पक्ष मे विभिन्न राज्यक शूरवीर राजा व सेनाबल – रथी-महारथी सब जुटल छलाह ।

आन्हर राजा धृतराष्ट्र पुत्रमोह मे अपन पुत्र दुर्योधनक जिद्द-अहंकारक आगाँ निरीह रहथि । धर्मक महान् ज्ञाता आ सद्मार्ग मात्र देखौनिहार विदुर समान मंत्रीक सलाह किनार कयल जाइत छल, लेकिन पुत्र दुर्योधनक अन्यायक आगाँ राजा नतमस्तक भ’ हुनकहि गलत बात मे सहमति दय देल करथि । भीष्म पितामह समान कुरुवंशक संरक्षक राजाक एहि दुर्मतिक विरोध करितो अपनहि प्रतिज्ञा आ पिता-माता केँ देल वचन सँ बान्हल एहि लेल विद्रोह नहि कय पबैत छलाह । एक सँ एक धर्मनिष्ठ सब एहि राजधर्मक गलत उपयोगक आगाँ मौन स्वीकार्यता प्रदान करय लेल बाध्य रहथि । अपन कर्तव्य पूरा करबाक लेल राजाक नूनक सैरियत देल करथि ।

निरपेक्ष-निष्पक्ष कृष्ण व बलरामक स्थिति सेहो बड़ा अजीब देखायल हमरा । बलराम अपन निरपेक्षताक रक्षा महाभारतक युद्ध सँ दूर रहिकय सिद्ध कयलनि, भाइ श्री कृष्णक रणनीति-कूटनीति केँ पर्यन्त ओ प्रतिकार करैत देखेलाह । समीक्षक सब नीक सँ लिखि सकैत छथि हुनकर चरित्र व भूमिका पर, मुदा हम ओहि सब मे बेसी किछु नहि कहय चाहब । श्री कृष्ण लेकिन धर्मक रक्षार्थ अन्यायी पक्षक कड़ा विरोधक पक्ष मे सहमति देलनि । हालांकि ओ स्वयं पक्षकार आ पांडवक दूत बनिकय न्याय लेल समझौता-सहमतिक कोशिश करय गेलाह कौरव राजाक दरबार मे, मुदा दुर्योधन नहि केवल हुनकर प्रस्तावक तिरस्कार कयलनि, बल्कि हुनको विरूद्ध षड्यन्त्र कय केँ स्वयं श्री कृष्ण केँ अपन अवतारपुरुषक रूप व शक्तिक प्रदर्शन करय लेल बाध्य कय देलनि ।

बहुत रोचक कथा-गाथा सब अछि महाभारत मे । हम सी. राजजोपालाचारीक लिखल एकटा सारगत महाभारतक अध्ययन मात्र कएने छी । उपरे-उपर बात सब बुझलियैक । हमर बुझाइ मे त्रुटि सेहो सम्भव अछि । परञ्च हमर उद्देश्य ई अछि जे “गीता” केर पृष्ठभूमि पर संछिप्त चर्चा कय पुनः गीता मात्र पर केंद्रित होइ । एहि क्रम मे युद्धक कारण स्पष्ट करैत सीधे चलैत छी ‘धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र’ मे ।

गोटेक प्राविधिक बात सब सेहो बुझनाय आवश्यक अछि । गीता मात्र आ मात्र कृष्ण द्वारा अर्जुन केँ सम्बोधन करैत धर्म, अधर्म, न्याय, दर्शन, मीमांसा, शास्त्र, गुण, प्रकृति, कर्म सिद्धान्त, सांख्य जेहेन अत्यन्त गूढ़ सिद्धान्त आ समग्र विज्ञान ओ ज्ञानक विशद् चर्चा कएने छथि । लेकिन गीता केँ सहजता सँ बुझबाक लेल एहि मे धृतराष्ट्र केँ सेहो पात्र बनायल गेल छन्हि, हिनकहि ‘उक्ति’ (कथन) सँ गीताक शुभारम्भ होइछ । पुनः हिनक सहायक सञ्जय जिनका व्यासदेव द्वारा दिव्य दृष्टिक शक्ति देल गेल छल, जे कुरुक्षेत्रक घटनाक्रम, युद्धक स्थिति-अबस्थाक सीधा प्रसारण (कमेन्ट्री) राजा धृतराष्ट्र केँ कहथि । जन्मान्ध राजा धृतराष्ट्र अपन अन्तर्दृष्टि सँ सञ्जय केँ सुनिकय अपन पुत्र व दोसर पक्ष अपन भातीज सभक किरदानी सब सुनथि-बुझथि, आ राजधर्मक मूल नेता हेबाक कारण कोनो क्षण मे राजाक भूमिका करथि, से व्यासदेवक इच्छा रहल हेतनि विद्वान् लोकनि एना कहैत छथि ।

खैर, हमर अभिप्राय ई अछि जे उपरोक्त उहापोहक स्थिति – अर्थात् कौरव-पांडवक युद्धक निर्णय आ ताहि मे गोलबन्दी हेबाक अबस्था – एकरा हम प्रत्येक व्यक्ति अपन-अपन जीवनक ‘नीक-बेजा’, ‘धर्म-अधर्म’, ‘न्याय-अन्याय’, ‘सही-गलत’, आदिक द्वन्द्व समान तुलना करैत परमात्मा रूप मे श्री कृष्ण केँ बुझैत, अपना केँ अर्जुनक स्थान पर राखिकय ‘गीता’ जेहेन परमोपदेश केँ ग्रहण करबाक कोशिश करी ।

आरम्भ करैत छी गीताक व्याख्या, तेकर पहिल चरण ‘प्रथम अध्याय’

(प्रवीण व्याख्या कहबाक तात्पर्य जे अपन नामहि धरि सीमित हम मानव अपन मानवीय सीमितता मात्र केँ मानैत अपनहि वर्तमान नामक अर्थानुसार काज करबाक ध्येय सँ राखल अछि, एकरा अन्यथा मानि सकैत छी, हमरो स्वार्थी आ छद्मनामी बुझि सकैत छी । परञ्च उद्देश्य पैघ अछि । गीताक ज्ञान केँ सुलभ-सहज बनेबाक आ सेहो अपनहि लेल प्रथमतया, लाट मे आरो लोक बुझि जाइथ त हमर सौभाग्य ।)

गीताक आरम्भ होइछ राजा धृतराष्ट्रक एहि कथन सँ जे हे सञ्जय, धर्मक्षेत्र रूप मे सुपरिचित कुरुक्षेत्र मे हमर आ पांडू केर पुत्र लोकनि कि कय रहल छथि । आर तदनुसार सञ्जय अपन दिव्यदृष्टि सँ कुरुक्षेत्रक तत्कालीन अबस्था पर कहनाय आरम्भ करैत कहैत छथि, “मुदा तखन… ई भेल, एना भेल” । स्वामी स्वरूपानन्द जी अपन टिप्पणी सहितक अंग्रेजी अनुवाद मे एहि उक्ति केँ ‘मुदा तखन’ सँ आरम्भ करैत एहि पर टिप्पणी लिखने छथि जे ‘मुदा….’ शब्द पूर्वहि सँ मन मे बैसल कोनो आशंका जे एहि युद्ध मे सत्यक जीत होयत, असत्य-अन्यायी पक्ष हारबे टा करत; आदिक कारण आ दुर्योधनक क्रियाकलाप जे ओ गुरु द्रोणाचार्य लग जा कय दुनू सेनाक युद्ध-तत्परताक बयान करैत हुनका सँ ई कहैछ जे देखू अहाँक सिखायल शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न पांडवक पर्याप्त सैन्यबल केँ कोना अहींक विरूद्ध व्यूढ़ाकार (पंक्तिवद्ध, सजाकय) ठाढ़ कएने अछि । आर अन्तिम वाक्य मे ई कहैछ जे अहाँ सँ आर बेसी अपेक्षा नहि करैत छी, धरि अहाँ हमर सेनाक सेनापति भीष्म केर रक्षार्थ सजग टा रहब ।

टिप्पणीकार लोकनि काफी विस्तार सँ एहि सब बातक अर्थ निकालने छथि । द्रोण ब्राह्मण छलाह, क्षत्रिय जेकाँ उग्र-अग्र भूमिका युद्ध मे नहि निबाहि सकता । दोसर, सोझाँ पक्ष मे अर्जुन जेकरा प्रति हुनका मे विशेष आसक्ति (सर्वश्रेष्ठ शिष्य हेबाक कराण) छलन्हि, ताहि सब आशय केँ बुझैत दुर्योधन अपन हारि हेबाक दुविधा मे डराकय सेनापति भीष्म सँ कोनो बात करबाक बदला गुरु द्रोण लग जा कय ई सब बात रखलन्हि ।

गीता मे दुर्योधनक गुरु द्रोण सँ कहल गेल उक्तिक विवरण लेखक व्यासदेव एतेक विलक्षण ढंग सँ कएने छथि जे मात्र एहि दुइ-चारि श्लोक पर कतेको ग्रन्थ लिखा जाय । अपन सेनाक वर्णन करैत चाटुकारिताक पराकाष्ठा अनुरूप भीष्म जेहेन अजेय धुरन्धर वीर केर नाम सँ पहिने गुरु द्रोणहि केर नाम कहलनि जे हमर सेना मे अहाँ, भीष्म…. आदि छथि । अर्थात् मुंह देखि मुंगबा, गुरु कोहुना प्रसन्न रहथि आ हमर पक्ष केँ मजबूत बनेने रहथि ।

ई सारा स्थिति पर गहींर नजरि रखनिहार कुल-संरक्षक प्रतिज्ञाबद्ध भीष्म अपन शंख निकालिकय तत् जोर सँ फूकलाह जे डरायल शिशु दुर्योधनक मनोबल युद्ध सँ पहिनहिं सँ जे कमजोर पड़ि रहल छलैक, तेकरा बल भेटौक । मुदा एकटा शंख फुकाइते महाभारतक युद्ध मे जुटल अनेकों महारथी लोकनि अपन-अपन शंख फूकय लगलाह । कौरवपक्षक शंख जखन शान्त भेल त पांडवपक्षक मनोबल बनेबाक लेल स्वयं श्री कृष्ण अपन पाञ्चजन्य नाम्ना शंख बजौलनि । फेर आनो-आनो पांडवपक्षक वीर योद्धा लोकनिक शंख बाजल । शंखघोषक वर्णन सेहो एना कयल गेल अछि जे एक दिश सँ ‘शब्दस्तुमुलोऽभवत्’ होइछ, दोसर दिश सँ ‘नभश्च पृथिवीञ्चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन्’ ।

मुदा ई की ? महारथी अर्जुन अपन रथक सारथि श्री कृष्ण सँ कहलनि जे हे कृष्ण, एक बेर दुनू सेनाक मध्य मे रथ केँ लय चलू । हम देखी जे के सब कोन-कोन पक्ष मे युद्ध लेल ठाढ़ छथि । आर तखन अचानक ओ कौरवपक्ष मे अपन गुरु, पितामह, भाइ, सखा, सम्बन्धी, बेटा, भतीजा, शाला, श्वसुर आदि केँ देखलनि आ हुनका लगलनि जे ई युद्ध मात्र राज्य प्राप्त करबाक लेल भ’ रहल अछि जाहि मे अपनहि भाइ-सम्बन्धी सब केँ मारिकय विजयी प्राप्त कय केँ राज्यक भोग करबाक अछि । एतय ओ पूर्णतया घबरा गेलाह, थरथर काँपय लगलाह, मुंह सुखा गेलनि, आवज भरभरा गेलनि । ओ गांडीव पटकि देलनि आ श्री कृष्ण सँ सम्बोधित भ’ युद्ध लड़बाक व्यर्थ निर्णय पर बात करय लगलाह । बहुते रास तर्क देलनि ।

जेना हम-अहाँ सेहो एना शोक आ दुःख-पीड़ाक अबस्था मे निरपेक्ष नहि रहि पबैत छी । अचानक तर्क आ विवेकक पूर्वाग्रही समझ मे ओझराकय अपन कल्याणक बदला अकल्याणक मार्ग सेहो चयन कय लेल करैत छी; ठीक तहिना अर्जुन केँ राज्यक भोग लेल युद्ध करब आ अपनहि सखा-सम्बन्धी केँ मारबाक दुरुह कार्य करब अत्यन्त बेजा लगलनि । ओ कहैत छथि जे भीख मांगिकय खा लेब, मुदा ई युद्धकार्य मे नहि पड़ब । ओ कहैत छथि जे धृतराष्ट्रक पुत्र सब केँ वध कय केँ पाप मात्र होयत । अपन स्वजनक हत्या सँ भला केहेन सुख भेटत हे माधव ? कुलक्षय भेला सँ कुलधर्मक नाश, कुलस्त्रीक प्रदूषित होयब, वर्णसंकरक उत्पत्ति होयब, ओकर कुलघ्न (कुलनाशक) पितर आ देवता प्रति ओकर श्रद्धा समाप्त होयब, जातिधर्म समाप्तिक उपरान्त कुलधर्मक नाश निश्चित अछि, तदोपरान्त नरकवासक सुनिश्चिति… आदि कतेको तर्क सब रखलनि । एहि सँ नीक हमरा निहत्था कय केँ धृतराष्ट्रक पुत्र सब अपन हाथ मे हथियार लेने हमर वध कय दियए । धरि एहेन राज्यक भोग हमरा नहि चाही ।

एतेक कहिकय गांडीव आ धनुष सब रथ मे पटकि शोकग्रस्त अर्जुन अपन स्थान पर अत्यन्त उदास भ’ कय बैसि रहलाह ।

प्रथम अध्याय एतहि समाप्त भेल ।

क्रमशः…. दोसर अध्याय ऐगला दिन !!

हरिः हरः!!

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