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एक परमात्माक अनेक रूपः शंकराचार्य चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वतीक शानदार विश्लेषण

1383 भ्यूज

एक्के भेला अनेक

एक्के टा परमात्मा विभिन्न देवताक रूप मे प्रकट होइत छथि । प्रत्येक भक्त ईश्वर केर कोनो विशेष रूप केर प्रति एकटा विशेष आसक्ति विकसित करैत अछि । प्रत्येक भक्त केर एहि आसक्ति केँ आर प्रबल बनेबाक लेल, परमात्मा कोनो समय कोनो विशेष गुण केँ दोसरक तुलना मे गौण कय दैत छथि तथा कोनो आर विशेष स्वरूप पर बल दैत छथि ।

पुरना जमाना मे, गली मे रोशनी लेल लालटेनक प्रयोग कयल जाइत छल (अर्थात्), शीशाक पिंजरा मे दीपक राखल जाइत छल । लालटेन चारि-तरफा होइत छलैक, गोटेक तीन-तरफा सेहो होइत छलैक । आउ, तीन-तरफा लालटेने केँ ली । प्रकाश तीनू दिश सँ पसरैत छल । कहियो‍-कहियो सजावटी रूप सँ तीनू शीशाक खिड़की सब केँ अलग-अलग रंग सँ रांगल जाइत छल । परिणामस्वरूप, प्रत्येक खिड़की सँ देखाय दयवला रोशनी खिड़कीक रंग के अनुरूप होइत छलैक । वैह परमात्मा सृष्टि करैत छथि, पालन करैत छथि आर संहार करैत छथि । मूल कारण वैह चैतन्य (ज्ञानक प्रकाश) अछि । ओ चैतन्य मानू तीन-तरफा लालटेनक भीतर अछि ।

तीन रंग मे सँ एकटा लाल अछि । यैह सृजन थिक । स्पेक्ट्रोस्कोप मे, यदि लाल रंग केँ निर्मल प्रकाश सँ अलग कय देल जाइक, त शेष छह रंग सेहो अलग भ’ जायत । यैह सृजन छी जेतय एक अनेक भ’ जाइत अछि । यैह चलते सृष्टिकर्ता ब्रह्मा केँ लाल रंगक कहल गेल छन्हि । लालटेन मे एक आर रंग नीला अछि । ई स्पेक्ट्रमक अंतिम छोर पर स्थित बैंगनी रंग थिक । शुरुआत लाल (इन्फ्रा-रेड) सँ होइछ, आर अन्त बैंगनी (अल्ट्रा-वायलेट) सँ । जखन निर्मित जगतक पालन-पोषण भ’ रहल रहैछ, तखन महाविष्णु ‘ज्ञान’ केर माध्यम सँ संकेत दैत छथि जे ‘ई जगत केर वास्तव मे कोनो अस्तित्व नहि छैक, नहिये एकरा समग्र आर निरपेक्ष अस्तित्व संग भ्रमित कयल जेबाक चाही । ई एकटा भ्रम छी आर परमात्माक लीला छी ।’ ओहि ज्ञान केर तेज मे, सम्पूर्ण भौतिक जगत छाउर मे बदलि जाएत अछि । ई ओ अबस्था छी जखन कोनो वस्तु जरि जाइछ, मुदा छाउर आ छाउरक अवशेष एखनहुँ धरि अपन मूल आकार केँ बनौने रखैछ, जाहि सँ मूल वस्तुक अस्तित्वक भ्रम होइत रहैछ । अस्तित्वक आभास बनल रहैछ आ मूल मूल रंग हेरा जाइछ । संसारक अस्तित्व त अछि, लेकिन एकर विशेष गुण, यानि वास्तविकताक आभास, जरिकय छाउर भ’ गेल अछि आर ई छाउर केर बाकी हिस्सा जेकाँ कारी भ’ गेल अछि । “सर्वं विष्णुमयं जगत्”, – सब किछु विष्णुए छथि जिनका श्यामल या नीला-मेघ-श्यामल बतायल गेल छन्हि । नीला, काला, बैंगनी ई सब रंग एक-दोसरक निकट अछि । एहि तीन महत्वपूर्ण कार्य केँ करबाक वास्ते परमात्मा तीन तरफा लालटेन जेकाँ रूप धारण कयलनि अछि । जखन नीला रंग सँ रांगल भाग सँ प्रकाश निकलैछ, त हम सब ओकरा ‘विष्णु’ कहैत छी ।

रंगीन लालटेनक तेसर भाग सादा, बिना रंगायल शीशा अछि । जखन ज्ञानक अग्नि मे सब किछु जरि जाइछ, त पहिने ओ कोयला या छाउर जेहेन कारी भ’ जाइत अछि । जँ ओकरा आर बेसी आइग मे राखल जाइक, तँ ओ छाउर मे बदलि जाइछ आ केवल कंकाले टा शेष रहि जाइछ । फेर कंकाल सेहो टूटिकय अपन आकार हेरा लैत अछि । एहि अबस्था मे, मूल कारी रंग पूरापूरी उज्जर भ’ जाइत अछि ।

उज्जर रंग स्पष्ट प्रकाशक निकट होइत अछि । प्रकाश सँ उत्पन्न सब रंग, अर्थात् परमात्मा सँ उत्पन्न समस्त दृश्य जगत्, अपन पहचान और वैयक्तिकता पूर्णतः हेराकय पुनः परमात्मा बनि गेल । पृथक् अस्तित्व, मायाजनित अस्तित्व, ई सबटा नष्ट भ’ गेल अछि आ यैह महाभस्म – परमेश्वर भेल । जखन संहार केर नाम पर सब किछु नष्ट भ’ जाइत अछि, यद्यपि ई एकटा क्रूर कृत्य प्रतीत भ’ सकैत अछि, शिव केवल विनाश पर टा नहि रुकैत छथि, अपितु जगत् केँ ओकर मूल सँ पुनः मिलेबाक परम दयालु कार्य करैत छथि । जखन विष्णु अपन लीला द्वारा (दृश्य जगत् पर) ज्ञानक प्रकाश कयलनि, त ‘सर्वम्’ (समस्त) ‘जगत’ (संसार) देखयवला केँ छाउरक समान प्रतीत भेलनि । एहि लेल ‘सर्वम् विष्णुमयं जगत्’ केर उक्ति अस्तित्व मे आयल । जखन सबटा लीला समाप्त भ’ जाइछ आ संहारक अवस्था आबि जाइत अछि, त परम ज्ञान केर फलस्वरूप, नहि त सर्वम् केर और नहिये जगत् केर कोनो अस्तित्व रहि जाइत अछि । एहि लेल हम सब ‘शिवमयं’ कहैत छी – केवल शिव ।

वैह दीपक – ‘ब्रह्म चैतन्यम्’ या ब्रह्मांडीय सत्ता, जखन लाल शीशा सँ देखल जाइछ, त हुनका ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) कहल जाइत अछि; नीला फलक सँ ओ विष्णु छथि आर रंगहीन पारदर्शी तेसर पक्ष सँ, वैह शिव छथि ।

ऋषि लोकनि परमात्माक स्तुति “तीन रूप मे प्रकट होयवला एक रूप” केर रूप मे कयलनि अछि । समस्त महान कवि, जे कोनो विशेष दर्शनशास्त्र केर प्रति प्रतिबद्ध नहि छलाह आर जिनकर मन खुला व व्यापक रहनि, एहि बात पर एकमत रहथि जे वैह सत्ता तीन मूर्ति बनि गेल छथि ।

अंग्रेज सब सेहो यहोवा, जौव या प्रभु केर उल्लेख एहि समझौताक भावना सँ करैत अछि । यहोवा ओहि हिब्रू आर सेमिटिक जनजाति सभक ईश्वर छलाह जे बाइबल केर जन्मक समय इज़राइल मे रहैत छलथि । जौव यूनानी धर्मक ईश्वर छलथि, जे यूनान आर ओकर आसपासक अन्य स्थान सब मे प्रचलित छल । प्रभु, ईश्वर केँ दर्शाबैक लेल सब धर्म द्वारा प्रयुक्त सामान्य नाम छी । ईसाई धर्मक ईश्वर-सेवक सब सेहो यैह कहलनि अछि जे यद्यपि नाम अनेक अछि, तैयो ओ एक्के व्यक्ति केँ संदर्भित करैत अछि ।

यदि पुराण सभक अध्ययन विनम्रता आर आदरक संग तथा ओहि सँ लाभ उठेबाक दृष्टि सँ कयल जाय, त कोनो भ्रम नहि होयत । हमरा लोकनि केँ ई विवेक रखबाक चाही जे ई केवल हमरा सभक कल्याण लेल रचल गेल अछि । हमरा सब केँ ई मानि लेबाक चाही जे परम सत्य सँ कनिकबो विचलन शुभ भावना मात्र सँ कयल गेल अछि ।

नोट – चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती अपनी पुस्तक ‘द वेदाज’ में यह लिखे हैं । मुझको पढ़कर काफी प्रेरणा मिली एवं त्रिमूर्ति की परिकल्पना को बेहतर ढंग से समझने का अवसर मिला ।

हरिः हरः!!

One as Many

The same Paramaatma manifests as different deities. Each devotee develops a particular attachment to a particular form of God. In order to strengthen such attachment of each devotee, the Paramaatma subordinates a particular quality at some time in preference to another and emphasises a particular aspect.

In olden days, lanterns were used for street lighting (i.e.) lamps were placed inside glass cages. The lanterns were four-sided, some were three sided also. Let us take the three-sided lantern. The light used to be dispersed from all the three sides. Sometimes decoratively the three glass windows used to be painted each in a different colour. As a result the light seen through each window would have the respective colour of the window. The same Paramaatma creates, sustains and annihilates. The root cause is the same Chaitanya (Light of knowledge). That Chaitanya is inside the three-sided lantern, as it were.

Of the three colours, one is red. That is creation. In a spectroscope, if red is separated from clear light, the remaining six colours will also get separated. This is creation where one becomes many. That is why Brahma, the creator, is said to be red in colour. Another colour in the lantern is blue. It is the colour at the end of the spectrum, violet. The beginning is red (infra-red), the end is violet (ultra-violet). When the created world is being sustained, Mahavishnu indicates through ‘Knowledge’ that ‘this world has no existence in reality, nor is it to be confused with the total and absolute Entity. It is an illusion and the sport of Paramaatma’. In the effulgence of that understanding, the whole of the phenomenal world is reduced to cinder. This is the stage when an object is burnt out but the residue of ash and cinder still retains the original shape, giving the illusion of the existence of the original object. The appearance of reality is burnt out and it has become black, like the rest of the cinder. “Sarvam Vishnu Mayam Jagat”, – all is Vishnu who is described as dark (Shyaamala) or bluish in colour – Neela-megha-shyaamala. Blue, black, violet are all colours which are close to each other. The Paramaatma has assumed a form like the three sided lantern in order to perform these three important functions. When the light comes out of the side painted blue, we call is ‘Vishnu’.

The third side of the coloured lantern, is plain unpainted glass. When everything is burnt out in the fire of knowledge, first it becomes coal, or cinder-black in colour. If it is further exposed to fire, it is reduced to ashes and the skeleton remains. Then the skeleton also crumbles and loses its form altogether. At the stage, the original black colour becomes all white.

White is close to clear light. All the colours that originated from light i.e., all phenomenal existence which sprung from the Paramaatma, had totally lost their identity and individuality and had become Paramaatma again. Separate existence, illusory existence, are all liquidated and it is this which is Mahaa-Bhasma – the Parameshwara. When everything is annihilated in the name of Samhaara, although it might appear to be a cruel deed, Shiva does not stop at destruction but is performing the very merciful act of reuniting the world with its origin. When Vishnu through his sport brought knowledge to bear (on the phenomenal world), the ‘Sarvam’ (all of) ‘Jagat’ (the world) appeared like a piece of cinder to the onlooker. That is why the expression Sarvam Vishnu Mayam Jagat came into being. When all the sport is over and the stage of Samhaara or annihilation is reached, as a result of Parama Jnaana or Supreme Knowledge, neither Sarvam nor Jagat has any existence. That is why we say ‘Shiva-Mayam’ – Nothing but Shiva.

The same lamp – ‘Brahma Chaitanyam’ or Cosmic Entity, when it is seen through red glass, it is called Brahma (the creator); through the blue panel it is Vishnu and, through the colourless transparent third side, the same thing is Shiva.

The seers have extolled Paramaatma as “one form appearing as three forms”. All great poets who were not committed to any particular philosophy of doctrine and who had an open mind and a broad outlook have been unanimous in saying that the same Entity has become the three Moortis.

The English men also refer to Jehovah, Jove or Lord in the same spirit of compromise. Jehovah was the God of the Hebrew and semitic tribes which lived in Israel when the Bible was born. Jove was the God of the Hellenic faith, prevailing in Greece and other places around it. Lord is the general name used by all faiths to denote God. Servants of God of the Christian faith have also averred that although the names may be many they refer to the same person.

If the Puraanas are studied with humility and respect and with a view to benefit from them, no confusion will arise. Let us have the wisdom to regard themas having been solely made to bring good to us. Let us take it that even the slight deviation from the absolute truth has been made with good intentions.

एक ही अनेक

एक ही परमात्मा विभिन्न देवताओं के रूप में प्रकट होते हैं । प्रत्येक भक्त ईश्वर के किसी विशेष रूप के प्रति एक विशेष आसक्ति विकसित करता है । प्रत्येक भक्त की इस आसक्ति को और प्रबल करने के लिए, परमात्मा किसी समय किसी विशेष गुण को दूसरे की तुलना में गौण कर देते हैं तथा किसी और विशेष पहलू पर बल देते हैं ।

पुराने ज़माने में, गली में रोशनी के लिए लालटेन का इस्तेमाल किया जाता था (अर्थात्), काँच के पिंजरों में दीपक रखे जाते थे । लालटेन चार-तरफा होती थीं, कुछ तीन-तरफा भी होती थीं । आइए, तीन-तरफा लालटेन को ही लें । प्रकाश तीनों ओर से फैलता था । कभी-कभी सजावटी रूप से तीनों काँच की खिड़कियों को अलग-अलग रंग से रंगा जाता था । परिणामस्वरूप, प्रत्येक खिड़की से दिखाई देने वाला प्रकाश खिड़की के रंग के अनुरूप होता था । वही परमात्मा सृष्टि करता है, पालन करता है और संहार करता है । मूल कारण वही चैतन्य (ज्ञान का प्रकाश) है । वह चैतन्य मानो तीन-तरफा लालटेन के भीतर है ।

तीन रंगों में से एक लाल है । यही सृजन है । स्पेक्ट्रोस्कोप में, यदि लाल रंग को निर्मल प्रकाश से अलग कर दिया जाए, तो शेष छह रंग भी अलग हो जाएँगे । यही सृजन है जहाँ एक अनेक हो जाता है । इसीलिए सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को लाल रंग का कहा गया है । लालटेन में एक और रंग नीला है । यह स्पेक्ट्रम के अंतिम छोर पर स्थित बैंगनी रंग है । शुरुआत लाल (इन्फ्रा-रेड) से होती है, और अंत बैंगनी (अल्ट्रा-वायलेट) से । जब निर्मित जगत का पालन-पोषण हो रहा होता है, तब महाविष्णु ‘ज्ञान’ के माध्यम से संकेत देते हैं कि ‘इस जगत का वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है, न ही इसे समग्र और निरपेक्ष सत्ता के साथ भ्रमित किया जाना चाहिए । यह एक भ्रम है और परमात्मा का खेल है ।’ उस ज्ञान के तेज में, संपूर्ण भौतिक जगत राख में बदल जाता है । यह वह अवस्था है जब कोई वस्तु जल जाती है, लेकिन राख और राख का अवशेष अभी भी अपने मूल आकार को बनाए रखता है, जिससे मूल वस्तु के अस्तित्व का भ्रम होता है । अस्तित्व का आभास बना रहता है और मूल रंग खो जाता है । संसार का अस्तित्व तो है, लेकिन इसका विशेष गुण, अर्थात् वास्तविकता का आभास, जलकर राख हो गया है और यह राख के बाकी हिस्सों की तरह काला हो गया है । “सर्वं विष्णुमयं जगत्”, – सब कुछ विष्णु ही हैं जिन्हें श्यामल या नीला-मेघ-श्यामल बताया गया है । नीला, काला, बैंगनी ये सभी रंग एक-दूसरे के निकट हैं । इन तीन महत्वपूर्ण कार्यों को करने के लिए परमात्मा ने तीन तरफा लालटेन जैसा रूप धारण किया है । जब नीले रंग से रंगे भाग से प्रकाश निकलता है, तो हम उसे ‘विष्णु’ कहते हैं ।

रंगीन लालटेन का तीसरा भाग सादा, बिना रंगा हुआ काँच है । जब ज्ञान की अग्नि में सब कुछ जल जाता है, तो पहले वह कोयला या राख जैसा काला हो जाता है । यदि उसे और अधिक अग्नि में रखा जाए, तो वह राख में बदल जाता है और केवल कंकाल ही शेष रह जाता है । फिर कंकाल भी टूटकर अपना आकार पूरी तरह खो देता है । इस अवस्था में, मूल काला रंग पूरी तरह से सफेद हो जाता है ।

सफेद रंग स्पष्ट प्रकाश के निकट होता है । प्रकाश से उत्पन्न सभी रंग, अर्थात् परमात्मा से उत्पन्न सभी दृश्य जगत्, अपनी पहचान और वैयक्तिकता पूर्णतः खोकर पुनः परमात्मा बन गए । पृथक् अस्तित्व, मायाजनित अस्तित्व, ये सब नष्ट हो गए हैं और यही महाभस्म – परमेश्वर है । जब संहार के नाम पर सब कुछ नष्ट हो जाता है, यद्यपि यह एक क्रूर कृत्य प्रतीत हो सकता है, शिव केवल विनाश पर ही नहीं रुकते, अपितु जगत् को उसके मूल से पुनः मिलाने का परम दयालु कार्य करते हैं । जब विष्णु ने अपनी लीला द्वारा (दृश्य जगत् पर) ज्ञान का प्रकाश किया, तो ‘सर्वम्’ (समस्त) ‘जगत’ (संसार) देखने वाले को राख के समान प्रतीत हुआ । इसीलिए ‘सर्वम् विष्णुमयं जगत्’ की उक्ति अस्तित्व में आई । जब सारी लीला समाप्त हो जाती है और संहार की अवस्था आ जाती है, तो परम ज्ञान के फलस्वरूप, न तो सर्वम् का और न ही जगत का कोई अस्तित्व रह जाता है । इसीलिए हम ‘शिवमयं’ कहते हैं – केवल शिव ।

वही दीपक – ‘ब्रह्म चैतन्यम्’ या ब्रह्मांडीय सत्ता, जब लाल शीशे से देखा जाता है, तो उसे ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) कहा जाता है; नीले फलक से वह विष्णु है और रंगहीन पारदर्शी तीसरे पक्ष से, वही शिव है ।

ऋषियों ने परमात्मा की स्तुति “तीन रूपों में प्रकट होने वाला एक रूप” के रूप में की है । सभी महान कवि, जो किसी विशेष दर्शनशास्त्र के प्रति प्रतिबद्ध नहीं थे और जिनका मन खुला और व्यापक था, इस बात पर एकमत थे कि वही सत्ता तीन मूर्तियाँ बन गई हैं ।

अंग्रेज लोग भी यहोवा, जौव या प्रभु का उल्लेख इसी समझौते की भावना से करते हैं । यहोवा उन हिब्रू और सेमिटिक जनजातियों के ईश्वर थे जो बाइबल के जन्म के समय इज़राइल में रहते थे । जौव यूनानी धर्म के ईश्वर थे, जो यूनान और उसके आसपास के अन्य स्थानों में प्रचलित था । प्रभु, ईश्वर को दर्शाने के लिए सभी धर्मों द्वारा प्रयुक्त सामान्य नाम है । ईसाई धर्म के ईश्वर-सेवकों ने भी यह कहा है कि यद्यपि नाम अनेक हैं, फिर भी वे एक ही व्यक्ति को संदर्भित करते हैं ।

यदि पुराणों का अध्ययन विनम्रता और आदर के साथ तथा उनसे लाभ उठाने की दृष्टि से किया जाए, तो कोई भ्रम नहीं होगा । हमें यह विवेक रखना चाहिए कि ये केवल हमारे कल्याण के लिए ही रचे गए हैं । हमें यह मान लेना चाहिए कि परम सत्य से थोड़ा-सा भी विचलन शुभ भावना से ही किया गया है ।

नोट – चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती अपनी पुस्तक ‘द वेदाज’ में यह लिखे हैं । मुझको पढ़कर काफी प्रेरणा मिली एवं त्रिमूर्ति की परिकल्पना को बेहतर ढंग से समझने का अवसर मिला ।

हरिः हरः!!

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