Buddhism And Other Schools of Thought
– Shri Chandrashekharendra Saraswati (in his book ‘The Vedas’)
बौद्ध धर्म एवं अन्य विचारधारा
शंकराचार्य एवं बौद्ध धर्म
बहुतो लोक एहेन छथि जे कहैत छथि कि एहि देश सँ बुद्ध धर्म केँ भगेबाक काज आदि शंकराचार्य द्वारा कयल गेल छल – कारण ओहि आस्थाक निन्दा छल । ई गलत अछि । हुनका साँख्य आ मीमांसा मे जे त्रुटि सब छल तेकरा ठीक करबाक बेसी चिन्ता छलनि जे मूलतः वैदिक सिद्धांतक समर्थक रहितो ईश्वरक महत्व केँ नकारैत छल । शंकर केर तर्क रहनि जे वैदिक ग्रन्थ आर ब्रह्मसूत्र केर शब्दावली व अर्थ दुनूक मुताबिक ईश्वर पद केर परिभाषाक अनदेखी करैत ई कहनाय गलत छै जे ओ सृष्टिकर्ता या फल दाता नहि छथि । वेद मे सत्य कहल जेबाक तर्क दैत ओ ई बात बतौलनि अछि जे बिना ईश्वर केँ संसारक निर्माण नहि भ’ सकैत अछि । आ न ई स्थापित कयल जा सकैत अछि जे कर्म अपने आप कर्ता केँ प्रतिफल दय सकैत अछि । ईश्वर परिणाम केर दाता हेबाक संगहि नियामक सेहो छथि । हुनकर चेतना, हुनकर इच्छा (संकल्प) मात्र संसारक निर्माण केलक आ कर्मक नियम स्थापित केलक जेकर अनुसार मात्र कर्मक फलक नीक भोग प्राप्त कयल जाइछ वा खराब भोग प्राप्त कयल जाइछ, जे कोनो स्थिति हो ।
शंकराचार्य साँख्य एवं मीमांसा स्कूलक अनुयायी लोकनिक तर्क केँ प्रभावी ढंग सँ प्रतिकार कयलनि अछि । ओहि ठाम सेहो जेतय बौद्ध धर्म कड़ा आलोचना वास्ते आबि गेल छल, ओ ताहि ठाम सेहो मूल सूत्र मे निहित बातक सही वर्णन करबाक अलावे बौद्ध धर्म द्वारा भगवानक अस्तित्व केँ अस्वीकार करबाक विषय केर निन्दा मात्र कयलनि अछि । आचार्यक लेखन कोनो तरहेँ ई नहि दर्शाबैत अछि जे, मात्र हुनक निन्दाक उग्रता आ तर्कक कारणेँ बौद्ध धर्म केँ एहि भूमि सँ निर्वासित कयल गेल । मुदा तखन, बौद्ध धर्म एहि देश सँ किएक विलुप्त भ’ गेल ? एकर पकड़ ढीला पड़बाक जिम्मेदारी ककरो उपर तँ पड़ले हेतैक । उत्तर अछि, मीमांसक व तार्किक (तर्कशास्त्री) लोकनिक व्याख्या । तर्क शास्त्र (तर्क) मे प्रवीण लोकनि केँ ‘तार्किक’ कहल जाइत छनि । तर्क न्याय शास्त्रक हिस्सा थिक, जे चौदह विद्याक बीच मीमांसाक बाद क्रमिक रूप सँ अबैत अछि । न्याय शास्त्र मे प्रवीण लोक केँ ‘नैययिक’ कहल जाइत छन्हि । उदयनाचार्य जे तार्किक छलाह आ कुमारिल भट्ट जे मीमांसक छलाह, बौद्ध धर्म पर प्रबल आक्रमण केने छथि आ से अपना-अपना कारण मात्र सँ – अर्थात् तर्क एवं मीमांसा मात्र सँ ओ दुनू गोटे बौद्ध धर्म पर आक्रमण कयलनि । उदयनाचार्य बौद्ध धर्मक निन्दा एहि लेल केलनि जे एहि मे ईश्वर वा भगवान नहि होयबाक उपदेश देल गेल अछि । जखन कि मीमांसक लोकनि सब कहैत छलाह जे ईश्वर नहि स्वयं कर्म फलदाता थिक, तथापि ओ लोकनि ई स्वीकार करैत छलाह जे सभ कर्म सँ फल निर्माण (परिणाम) होइत छैक आ वैदिक संस्कार केँ उत्साहपूर्वक आ सही ढंग सँ करबाक चाही । अतः मीमांसक लोकनि बौद्ध धर्मक निन्दा एहि लेल कयलनि जे ई वेद मे निर्धारित कोनो संस्कारात्मक कर्म केर आवश्यकता केँ नकारैत छल । कुमारिल भट्ट बौद्ध आस्थाक एहि पक्ष पर व्यापक रूप सँ निपटारा कयने छथि तथा एकर निन्दा सेहो कएने छथि । एहि तरहें बौद्ध धर्मक नास्तिक पक्ष पर उदयनाचार्यक आक्रमण आ बौद्ध धर्म द्वारा वैदिक संस्कार सब नकारबाक सन्दर्भ पर कुमारिल द्वारा निन्दा कयल गेल अछि । बाद मे आयल शंकर केँ तेँ बौद्ध धर्मक नकारात्मक पक्ष सँ बेसी गहींर सँ निपटबाक आवश्यकता नहि भेल छलन्हि । ओ अपना केँ ओहि दोष केँ उजागर करबा धरि सीमित राखि लेलनि जे कि बौद्ध लोकनि द्वारा प्रचारित मान्यता सब मे भेटैत छल ।
आचार्य दृढ़तापूर्वक स्थापित कयलनि जे एकटा भगवान वा ईश्वर छथि जे कि एहि विलक्षण ब्रह्माण्ड केर निर्माता छथि तथा वैह एकमात्र शक्ति छथि जे लोक केँ अपन कर्मक फल सँ पुरस्कृत करैत छथि आ सभक कयल कर्मक परिणाम केर नियमन सेहो वैह करैत छथि ।
हम ई सारा बात मात्र ओहि गलत जानकारी केँ सुधारय लेल कहने छी जे कि शंकराचार्य बौद्ध धर्मक दुश्मन छलाह ।
बौद्ध धर्म और हिंदू समाज
हमरा लेल ई साफ अछि जे भारत मे कहियो लोक पूरापूरी बौद्ध धर्म केँ नहि मानलक, हालाँकि लोक गौतम बुद्ध केँ एकटा महान व्यक्ति मानैत छल । आइ, बहुते रास लोक “थियोसोफिकल मूवमेंट” नाम केर एक आंदोलन मे शामिल भ’ गेल अछि । तथापि, ओहि मे सँ कतेको लोक हिन्दुए जेकाँ पाबनि-तिहार मनबैत रहैछ । ओकरा घर मे विवाह आ एहि प्रकारक दोसर रीति-रिवाज वैदिक नियम अनुसार कयल जाइत छैक । ओ सब हिन्दू धर्म नहि छोड़ने अछि । जखन किछु महान लोक जन्म लैत छथि त बहुते रास लोक हुनकर इंसानियत, समझदारी आ सच्चरित्र जेहेन महान गुण सब सँ आकर्षित होइत अछि । तैयो, हुनकर नाम पर वैदिक रीति-रिवाज सब मे कोनो बदलाव या ओहि सँ हंटिकय बनायल गेल मिशन अथवा संस्था सब मे, आमतौर पर से सब रीति-रिवाज मानयवलाक बात अपना घर मे नहि मानैछ । ओ सब पुरने परम्परा सब सँ जुड़ल रहैत अछि । महात्मा गांधी आर गांधीवाद एहने नाम अछि जे स्मरण मे अबैत अछि । लोक अपन उत्साह मे पहिने हुनका राम आ कृष्ण केर अवतारहु सँ उपर रखने छल । फेर, अपन निजी जिन्दगी मे गांधीजी अपन जे जरूरी शिक्षा सब, जेना विधवा विवाह, हरिजन सँ मेल-जोल वगैरह कहलनि से सब नहि मानलक । एहि हद तक कि ओ सब गांधीवाद केँ नहि मानलक, हालांकि समाज मे ओ गांधीक पक्का मानयवला मानल जाइत छल । लेकिन कियैक तँ गांधी मे एकटा इंसानक तौर पर बहुत रास निजी गुण सब रहनि, जेना त्याग, सच्चाई, भगवानक प्रति भक्ति, जनसेवा वगैरह, तेँ लोक हुनकर बहुत सम्मान करैत छल । एकर मतलब ई नहि निकालबाक चाही जे ओ सब हुनकर शिक्षा आ आरो बात सब केँ पूरापूरी मानि लेलक ।
बुद्धक संग सेहो एहिना भेलनि । हुनकर निजी जिन्दगी बहुते तारीफक काबिल छल । एकटा राजकुमारक रुप मे, ओ अपन जवानी मे अपन पत्नी आर छोट बेटा केँ सेहो छोड़ि देलनि, जाहि सँ कि आम आदमीक हालत सुधारबाक काज मे अपना अपना केँ लगा सकथि । एहि त्या आ नीक गुणक चलते लोक केँ अपना दिश आकर्षित कयलनि । एकर ई मतलब या परिणाम नहि भेल जे सब बौद्ध सिद्धान्त केँ मानि लेल गेल या ओकरे पालन कयल जाय लागल । मात्र एहि लेल जे बुद्ध रीति-रिवाजक विरोध (बुराइ) कयलनि, लोक सब तेकरा नहि छोड़ि देलक । लोक सब तखनहुँ जाति व्यवस्था आर अलग-अलग रीति-रिवाज केँ मानैत छल लेकिन बुद्धक निजी गुण सभक तारीफ करैत छल । नहिये लोक पैघ संख्या मे भिक्षुए (संन्यासिये) बनल । ओ सब विवाह कयलक तथा आरो परम्परा मुताबिक एहेन जीवनक लेल तय कयल गेल काज सब करैत गृहस्थ बनि गेल । (यानि बुद्धक उपदेशानुसार सब भिक्षु नहि बनल, बरु गृहस्थी धर्म अपनाकय गृहस्थ बनल ।) हालाँकि सम्राट अशोक बौद्ध रहथि आर ओ बौद्ध धर्मक लेल बहुते किछु कयलनि, मुदा ओ समाजक वैदिक जीवन जियबाक तरीका केँ नहि त बदललनि आ नहिये बदलि पेलाह । मशहूर अशोक स्तंभ आर अशोकक कतेको शिलालेख सब एहि बातक सबूत अछि जे ओ अपन प्रजाक धार्मिक आजादी केर रक्षा कयलनि । एना लगैत अछि जे बुद्ध भिक्षु (संन्यासी) सब केँ छोड़िकय, बेसी घरक लोक वैदिक जीवन जियबाक तरीका केँ मानैत रहल । हालाँकि बौद्ध लोक ईश्वर या भगवान या देवी-देवता सब केर विशेष जिकिर नहि करैछ, लेकिन ई जननाय रोचक भ’ सकैत अछि जे महान बौद्ध भिक्षु सभक लिखल किताब सब मे शुरुआत मे सरस्वती स्तोत्र अछि जाहि मे विद्या आ बुद्धिक देवी सरस्वतीक प्रशंसा कयल गेल छन्हि । तिब्बत आर ओकरहि आस-पासक क्षेत्र सँ हमरा सब केँ देवी-देवता सभक पूजाक तरीका बतबयवला कतेको तांत्रिक ग्रंथ भेटल अछि । श्री हर्ष आर बिल्हण केर संस्कृत मे लिखल रचना सभक जाँच कयला पर ई साफ भ’ जाइत अचि जे जखन बौद्ध धर्म फलि-फुलि रहल छल, तखन वैदिक रीति-रिवाज एवं वैदिक जीवनशैलीक पूरा लगन सँ पालन कयल जाइत छल ।
कतेको सुधारवादी, जे शायद हमर कहल गेल जीवन जियबाक तरीका केँ नहि मानथि, से सब हमरा लग अबैत छथि । हालाँकि ओ सब हमर मान्यता सब केँ नहि मानैत छथि, लेकिन हुनका सब केँ लगैत छन्हि जे हमरा मे किछु नीक बात (गुण) अछि आर ओ सब केवल अपना लेल अबैत छथि । अपन देश मे पहिनहिं सँ एहिना होइत आबि रहल अछि । नहि केवल ओ सब आम व लोकप्रिय विश्वास सँ अलग रहथि, बल्कि ओ सब सेहो अपन अलग-अलग सुधारवाद केँ जोर-शोर सँ मानथि आ तेकर प्रचारो करथि, हुनका लोकनि केँ हुनकर विचारक कारण सँ नहि, बल्कि हुनकर निजी गुण सब आ तारीफक काबिल जीवन जिबय केर तरीकाक वजह सँ बहुत सम्मान देल जाइत रहनि । आइयो, ओहेन समय नहि आबि गेल अछि जे हमरा लोकनिक पारम्परिक मान्यता व रीति-रिवाज सब पूरे खत्म भ’ गेल हो । आखिर, सालों सँ परखल गेल लकड़ी जेकाँ, जे सैकड़ों वर्ष सँ लोकक दिल-दिमाग मे गहिराइ सँ बसल जे छैक । आसान शब्द मे कही तँ, लोक अपन पुरखा सभक नक्शाकदम पर चलैत रहल अछि आर पीढ़ी-दर-पीढ़ी ओकर परम्परा चलैत आबि रहल अछि । बौद्ध धर्मक सुधार केर संग सेहो एहिना भेल । तेँ, जखन उदयन आर कुमारिल भट्ट बौद्ध धर्मक आलोचना कयलनि, त लोक सब केँ बौद्ध धर्मक नया धर्म केँ छोड़िकय पारम्परिक धर्म पर लौटय मे कोनो मुश्किल नहि भेलैक ।
शंकर तथा अन्य सिद्धान्त
आदि शंकर केर सिद्धान्तक आखिरी पड़ाव रहनि रीति-रिवाज सब केँ छोड़नाय आ मोन केँ अनन्त (भगवान्) मे लगेनाय । लेकिन, बुद्ध केर उलट, ओ ई सलाह नहि देलनि जे शुरुआती अबस्था मे सेहो वैदिक कर्म सब केँ नजरन्दाज कय देबाक चाही, बल्कि आचार्य ई करबाक नतीजा मानसिक पवित्रता प्राप्तिक बादे आत्मनिरीक्षा आ स्वयं केर जाँच-पड़ताल (खोज) करबाक चाही से कहलनि । सब सँ पहिने, मीमांसा मे बतायल गेल कर्म सभक पालन करय पड़त आर आखिरी मे ओकरा सब केँ छोड़िकय बौद्ध पन्थ केर चरण मे जाय पड़त ।
हमरा सभक आचार्य बौद्ध धर्म, मीमांसा, सांख्य आ न्याय केर सिद्धान्त सब केँ एक हद धरि आ एकटा निश्चित स्तर धरि मानलनि अछि, लेकिन ताहू सँ आगूक स्तर पर एकरा सभक विरोध कयलनि अछि । कहल जा सकैछ जे ई सब धर्म पूरा सिद्धान्तक एकटा पहलू टा केँ अपन अन्तिम निष्कर्ष मानिकय चलल, जखन कि हमरा सभक आचार्य एहि सबटा केँ मिलाकय एक टा बनौलनि ।
सांख्य
सांख्य कहैछ जे आत्मा, जे कोनो आर चीज सँ जुड़ल नहि अछि, बल्कि सभक कारण थिक, ओ “पुरुष” अछि तथा माया, ओ शक्ति जे दुनिया केँ चलायमान बनबैत अछि, ओ “प्रकृति” थिक । आगू कहल गेल अछि जे दुनिया मे प्रकृति समेत २४ टा तत्त्व (या प्रथम सिद्धांत) होइछ । प्रकृति पहिल तत्व छी । एकरा सँ दोसर तत्व बनल अछि जेकरा “अहंकार” कहल जाइछ, यानी ‘ईगो’ या एकटा अनुभूति ‘अहं’ (सेल्फ -स्वत्वक अनुभव) नामक किछु चीज अछि । ई अपना केँ दुइ भाग मे बाँटि लैत अछि । एक तरफ ई चैतन्य (चेतन जीव एवं ज्ञान) यानि जीव बनि जाइछ जेकर मन आ पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा पाँच कर्मेन्द्रिय (हाथ-पैर या काज करयवला अंग) होइत छैक । दोसर दिश, ई जड़ या (भौतिक) वस्तु होइत अछि जेकर पाँच टा तन्मात्रा या तत्व तथा पाँच टा महाभूत यानि पैघ सिद्धान्त होइत छैक । जीव (जानवर) केर पाँच ज्ञानेन्द्रिय ओ पाँच अंग थिक जे ओकरा बाहरी चीज सभक बारे मे बतबैत छैक । ई आँखि जे देखैत अछि, नाक जे सूँघैत अछि, मूँह जे स्वाद लैत अछि, कान जे सुनैत अछि, त्वचा जे स्पर्श महसूस करैत अछि, ई सबटा ज्ञानेन्द्रिय थिक । ई जे जीव केँ सीधा कार्य करय मे या सीधा कार्रबाई करय मे शामिल होय मे सक्षम बनबैत अछि, से कर्मेन्द्रिय या काज करयवला अंग थिक । मुँह सेहो एहि मे अबैत अछि । एकटा ज्ञानेन्द्रिय केर रूप मे, ई वाचन (वाणी बजबाक) कार्य मे शामिल होइछ । हाथ जे सबटा काज करैत अछि, एक आर काज करयवला अंग थिक । ज्ञानेन्द्रिय केर कार्यात्मक पूर्वाग्रह, यानी, ध्वनि (कान), स्पर्श (त्वचा), छवि या दृष्टि (आँखि), रस या स्वाद (मुँह), गन्ध (नाक) जे सूक्ष्म अछि, तन्मात्रा सब थिक । अपन जड़ या निर्जीव अस्तित्व मे ई सिद्धान्त पाँच महाभूत छी, यानी, आकाश (ध्वनि), वायु (स्पर्श), अग्नि (रूप या छवि), जल (रस या स्वाद), पृथ्वी (पृथ्वी) (गन्ध) । एहि प्रकार सँ, कुल चौबीस तत्व अछि जाहि मे प्रकृति, महत्, अहंकार, मन, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच तन्मात्रा आर पाँच महाभूत शामिल अछि ।
एहि २४ केँ वेदान्तक अद्वैतवादी सिद्धान्त द्वारा सेहो स्वीकार कयल जाइत छैक । लेकिन अद्वैत कहैत अछि जे ईश्वर या सगुण ब्रह्म (गुणवला ब्रह्म) कहायवला सत्ता आत्मा (निर्गुण ब्रह्म) आर प्रकृति (माया) केर मिलन करबैत अछि – जखन कि सांख्य मे ईश्वरक कोनो चर्चा (उल्लेख) नहि अछि ।
सांख्य तीन गुण, यानी सत्व, रजस आर तमस केँ सेहो बतबैत अछि, जेकरा वेदान्तिक दर्शन (फिलॉसफी) केर सब स्कूल मानैत अछि । सत्व साफ, शांत, स्थिर एवं ऊंच हालत थिक । रजोगुण पूरे तरह सँ गतिशील (स्पीड)आ संचार (विस्थापन, मूवमेंट) थिक । तमोगुण आलस्य, नीन्द आर निष्क्रियता थिक । भगवद गीता मे, एकरा सब बारे मे “गुण त्रय-विभाग योग” मे विस्तारपूर्वक बतायल गेल अछि । भगवान अर्जुन सँ कहैत छथि जे निस्त्रैगुण्य बनू, जेकर मतलब भेल जे लोक केँ ओहि शुद्ध आत्माक स्तर (लेवल) पर रहबाक कोशिश करबाक चाही जे तीनू गुण सँ परे अछि । सांख्य ईहो कहैछ जे सबटा झगड़ा आ असन्तोष एहि गुण सभक टकरावक परिणाम छी आर ओकर असरि केँ खत्म कय देबाक चाही । भी कहता है कि सभी झगड़े और असंतोष इन गुणों के टकराव का नतीजा हैं और उनके असर को खत्म कर देना चाहिए । लेकिन, भगवद गीता आर दोसर वैदिक शास्त्र सभक उलट, ई (सांख्य दर्शन) ईश्वरक पूजा, शरणागति (सरेंडर) तथा आत्मनिरीक्षण केँ एहेन समता आ ऊंच हालत (इक्वैनिमिटी एवं एक्जाल्टेड स्टेट) पाबय केर तरीकाक तौर पर नहि बतबैत अछि ।
“सिर्फ़ पुरुषहि टा मे (जीव-चैतन्य) अछि । प्रकृति जड़ थिक । तेँ, प्रकृति अपने आप काज नहि कय सकैछ । हालाँकि, ई केवल पुरुषक आवेग सँ चौबीस गोट बुनियादी सिद्धान्त या तत्व सभक रूप मे स्वयं केँ प्रकट करैत अछि, लेकिन पुरुष प्रकृति सँ पूरा अलग आ असंबद्ध अछि तथा मात्र ज्ञान केर विषय अछि,” सांख्य साफतौर पर एकर उल्टा कहने अछि ।
“केवल” (केवलम्) शब्दक मतलब अछि बिना कोनो दोसर चीजक मिलने-जुलने अकेले रहनाय – अपना आप मे आर अपनहिं मर्जी पर रहनाय । एकर विशेषण (एडजेक्टिव) कैवल्य अछि । सांख्य मे, कैवल्य मोक्ष केर देल गेल नाम अछि । जीव या आत्मा चौबीस टा बुनियादी सिद्धान्त सँ आगाँ निकलि जाइछ, जड़ता या जड़ सँ आज़ाद भ’ जाइछ आ पुरुषक स्तर (लेवल) पर अकेले रहैत अछि । यैह कैवल्य थिक ।
अद्वैत केर लक्ष्य आत्मा मे मिलि गेनाय छैक, जे पुरुषहि केर दोसर नाम छी, आर बाकी सब केँ माया या भ्रम मानिकय छोड़ि देबाक अछि । लेकिन एहि लक्ष्य केँ पेबाक तरीका जेना कर्म, उपासना (भक्ति) आर बाद मे ज्ञानविचार या आत्मनिरीक्षण, जे आचार्य बतौलनि अछि, सांख्य मे नहि भेटैछ । एकर अधिकतर हिस्सा चौबीस तत्वक एकटा थीसिस धरि सीमित अछि ।
सांख्य मे एकटा आरो कमी अछि । “पुरुष (आत्मा) केवल ज्ञान छी, जाहि मे कोनो काम नहि अछि । प्रकृति केवल काम छी, लेकिन एहि मे कोनो ज्ञान या जीवन आ सजीवता (जीव चैतन्य) नहि अछि । ई साफ फर्क अछि जे बिना ई बतेने कि जड़ (बेजान चीज) केर वास्ते स्वयं केँ दोसर तत्व सब मे बदलनाय केना सम्भव अछि । मात्र यैह वजह देल गेल अछि जे जड़ केर एहेन बदलाव सभक लेल पुरुष (जीव चैतन्य) केर उपस्थिति टा ज़िम्मेदार अछि । पुरुष केँ बिना कोनो काम केर कहल जाइछ, लेकिन प्रकृति केँ पुरुषहि केर मदति सँ सक्रिय कहल जाइछ । एकरा ठीक केना कयल जाय ? सांख्य एकर जवाब एहि तरहें दैत अछि: जेना चुम्बक केर उपस्थिति लोहाक कण सब केँ बिना कोनो साफ धारणे केँ सक्रिय कय दैत अछि, तहिना प्रकृति सेहो मात्र पुरुषहि केर उपस्थितिक कारण सक्रिय अछि । ई दुनू एहि तरहें काज करैत अछि जेना एकटा आन्हर आदमी अपन कन्धा पर एकटा नाँगड़ आदमी केँ उठेने हो । आन्हर आदमी देखि नहि सकैछ आ नाँगड़ आदमी चलि नहि सकैछ, लेकिन आन्हर आदमी नाँगड़ आदमीक कहला पर घूमि सकैत अछि । एहिना, प्रकृति जाहि मे कोनो चेतना नहि छैक, लेकिन सक्रिय अछि, पुरुष केँ लयकय चलैत अछि जे चेतनाक अलावा आर किछु नहि थिक तथा दुनियाक काज एहि तरहें होइत अछि । ई एकटा सही तुलनाक रूप मे नीक तँ लगैत अछि, लेकिन शायदे तार्किक (लॉजिकल) हो । दोसर दिश, अद्वैत कहैत अछि जे बिना कर्मवला, बिना गुणवला “निर्गुण ब्रह्म” टा सक्रिय भ’ ‘गुण वाले ईश्वर’ (सगुण ब्रह्म) केर रूप मे उपस्थित लगैत छथि आर मायाक जरिया दुनियाक काज करैत छथि ।
सांख्य आर अद्वैत मे एकटा आर पैघ फर्क छैक । हालाँकि ई पुरुष केँ शुद्ध चेतनाक रूप मे बतबैत अछि, लेकिन सब जीवात्मा केँ एक्हे टा आत्मा होयबाक बदला मे ई कहैत अछि जे जीवात्मा कतेको रास आ अलग-अलग अछि ।
एहि तरहें, हालाँकि एहि मे गोटेक कमी सब छैक, ई आधारभूत सिद्धान्त (तत्व) सभक पहिचान करय मे आर सूचीबद्ध (लिस्टिंग) करय मे वेदान्तिक परिकल्पना (कॉन्सेप्ट) केर वास्ते एकटा अधिकृत (अथॉरिटी) केर काज करैत अछि । ‘सांख्य’ शब्द संख्या सँ लेल गेल छैक जेकर मतलब होइछ अंक (नम्बर) मे गिनती कयनाय ।
ऋषि कपिल द्वारा सांख्य सिद्धांत पर एकटा सूत्र लिखल गेल अछि । एहि विषय पर महत्वपूर्ण ग्रन्थ ईश्वर कृष्ण केर “सांख्य कारिका” तथा विज्ञान भिक्षु केर “भाष्य सूत्र” अछि ।
भगवद गीता मे, भगवान कृष्ण स्वयं कतेको रास सांख्य सिद्धान्त सब बतेलनि-बुझेलनि अछि । लेकिन, जखन ओ सांख्य आ सांख्य योग केँ आत्मसाक्षात्कार केर दुइ अलग-अलग रास्ताक रूप मे बतबैत छथि, त हुनकर मतलब ज्ञान या ज्ञानक रास्ता सँ होइत अछि ।
सांख्य कहैत अछि जे पुरुष केँ प्रकृति सँ अलग अनुभव करय पड़त आर एतहि बात खत्म करैत अछि । दोसर दिश, राज योग ओतहि सँ शुरू होइछ जेतय सांख्य छोड़ने छल आर हमरा सब केँ बतबैत अछि जे एहेन अलगाव केना आ कोन तरीका सँ कयल जेबाक अछि आर कोन साधना या अनुशासन कयल जेबाक चाही । लेकिन, योग मे, ईश्वर केर होयबाक बात मानल जाइत अछि आर हुनकर पूजा केँ मोन केँ नियंत्रण (कंट्रोल) करबाक तरीका बतायल गेल अछि । पतंजलिक “राज योग” आम तौर पर योग केँ मोनक अलग-अलग तरहक आदति सब केँ नियंत्रित (कंट्रोल) करबाक तरीका या उपाय बतबैत अछि ।
हालांकि सांख्य आर योग हमरा लोकनिक शास्त्र सभक १४ या १८ विद्या सभक हिस्सा नहि थिक, तैयो ई दुइ गोट जरूरी विषय अछि आ तेँ हम एकर जिकिर कयलहुँ अछि ।
याद दिया दि जे हम पहिनहिं सेहो एकर जिकिर कएने रही । हम कहने रही जे हालांकि मीमांसा भगवानक भक्ति केँ जरूरी नहि मानैछ, तैयो ओ वेदक सच्चाइ केँ ओहिना मानैछ जेना सांख्य, जे वैदिक सच्चाइ केँ मानितहु ईश्वरविहीनताक प्रचार करैत अछि । (निरीश्वर वाद) । आदि शंकराचार्य अलग-अलग सोच सँ जे सही अछि ओकरा लेलनि आ जे नामंजूर अछि तेकरा ओ खारिज कय देलनि । एहि तरहें आधारभूत वेदान्तिक विश्वास (आस्था) केर स्थापना कयलनि, जे एहि दोसर सिद्धान्त (थ्योरीज़) सभक कारण अछि तथा जे वेदान्त मे सेहो शामिल अछि । आदि शंकराचार्य बौद्ध धर्मक नतीजा केँ शुद्ध चेतनाक स्तर पर मानलनि, सांख्य दर्शनक बिना मिलावट वला ज्ञान केँ निर्गुण ब्रह्म केर स्थान पर – एकर प्रकृति जे कि माया सँ मेल खाइत अछि, आर एहि मे कहल गेल चौबीस मूलभूत सिद्धान्त, मीमांसा केर कर्मकांड, न्याय केर ईश्वर आर एकर अलग-अलग सबूत सब केँ सेहो ओ मानलनि । हुनकर मानब छन्हि जे हरेक सिद्धान्त मात्र एकटा पहलू पर जोर दैत अछि तथा ओकरा मनुष्यक जीवन केर मकसद (उद्देश्य) बनबैत अछि, जखन कि ओकरा एक्केटा चीज मे मिलेबाक अछि, जे कि तर्क आ बुद्धि दुनू केँ मंजूर होइक ।
हरिः हरः!!
Buddhism And Other Schools of Thought
Shankara and Buddhism
There are many who say that Buddhism was driven out of this country because of the condemnation of that faith by Adi Shankaracharya. This is wrong. He was more concerned with setting right the errors in Saankhya and Meemaamsa which denied the importance of Isvara though basically subscribing to the Vedic tenets. Shankara has argued that, both according to the wording and meaning of Vedic texts and the Brahmasutra, it is incorrect to ignore the very definition of the term Isvara and to say that He is not the creator or Phala Daataa. Arguing that truth is what is stated in the Vedas, he has pointed out that the world cannot be created without Isvara. Nor can it be established that actions by themselves would recompense the doer. Isvara is the bestower as well as regulator of the results. His consciousness, His will (Sankalpa) alone created the world and established the law of Karma according to which alone the fruits of actions are enjoyed or suffered as the case may be. He has effectively countered the arguments of the followers of the Saankhya and Meemaamsa schools. Even in those places where Buddhism had come up for severe criticism he has gone no further than what was covered by the original sutra and to condemn only the denial of the existence of God by Buddhism. The Acharya’s writings do not in any way show that, because of the vehemence and logic of his condemnation alone, Buddhism was deported from this land. But then, why did Buddhism disappear from this country? Someone must have been responsible for loosening its hold. The answer is the Meemaamsakas and the Taarkikas (Logicians). Those proficient in Tarka Saashtra (logic) are called ‘Taarkikas’. Tarka belongs to Nyaaya Shaastra, which comes serially after Meemaamsa among the fourteen Vidyas. Those proficient in Nyaaya Shaastra are called ‘Naiyaayikas’. Udayanacharya who was a Taarkika and Kumarila Bhatta who was a Meemaamsaka have strongly attacked Buddhism, each for his own reason. Udayanacharya condemned Buddhism because it preached that there was no Isvara or God. The Meemaamsakas, although they said that the karmas themselves and not Isvara was the Phaladaataa, they nevertheless accepted that all actions yielded results and that the Vedic rituals must be performed zealously and correctly. The Meemaamsakas, therefore, condemned Buddhism which preached that there was no need for any ritualistic karmas as prescribed in the Vedas. Kumarila Bhatta has dealt extensively with this aspect of the Buddhist faith and has condemned the same. Thus, Udayanacharya’s attack on the atheistic aspect of Buddhism and Kumarila’s condemnation of the negation of Vedic rituals by Buddhism in making any headway. Shankara who came later had therefore no need to deal with the negative aspects of Buddhism in great depth. He confined himself to exposing the faults which were also found in the beliefs the Buddhists propagated.
The Acharya firmly established that there is a God or Isvara who is the creator of the phenomenal universe and He alone is the one who awards the fruits of one’s actions and regulates the results of one’s karmas.
I have said all this only to correct the wrong information being propagated that Shankaracharya was the enemy of Buddhism.
Buddhism and Hindu Society
To me it is clear that at no time in India did people practice Buddhism in toto though they respected Gautam Buddha as a great personage. Today, there are many who have joined a movement called the “Theosophical Movement”. Nevertheless, many of them continue to celebrate the festivals just like Hindus. Their marriages and similar other rites are performed as per Vedic injunctions. They have not given up the Hindu religion. When some great men are born, many are attracted by their great qualities like humanity, wisdom and character. Nevertheless, the missions or institutions established in their names with some modifications of or departures from the Vedic practices, are not generally followed by their votaries in their homes. They continue to stick to the old traditions. Mahatma Gandhi and Gandhism are names to conjure with. People in their enthusiasm at first placed him even above the incarnations of Rama and Krishna. Nevertheless, in their private lives they did not practice his essential teachings, viz., widow remarriage, physical contact with the Harijans, etc. To this extent, they have not practiced Gandhism, although in society they passed for ardent followers of Gandhi. But since Gandhi as a person had outstanding personal qualities, such as self-sacrifice, truth, devotion to God, public services, etc., people highly respected him. This should not be taken to imply that they implicitly accepted all his preachings and sayings in toto.
Same was the case with the Buddha. His private life was highly laudable. A prince, in his youth, he even abandoned his wife and infant son, so as to dedicate himself to the task of improving the lot of the common man. These sacrifices and good qualities attracted the masses. This did not mean or result in all the Buddhist tenets from being accepted or followed in practice. Simply because Buddha condemned ritualistic practices, people did not abandon them. They still followed the caste system and the various rituals but admired Buddha for his personal qualities. Neither did people become Bhikshus (mendicants) in large numbers. They married and became householders performing the duties prescribed for such life as per tradition. Although Emperor Ashoka was a Buddhist and did so much for Buddhism, he did not change nor was he able to change the Vedic way of life of the society in general. The famous Ashoka pillar and many of Ashoka’s edicts bear testimony to the fact that he safeguarded the religious freedom of his subjects. It would appear that, except for the Buddha Bhikshus (mendicants), the bulk of the householders continued to follow the Vedic way of life. Although the Buddhists do not make specific mention of Isvara or God or the divinities, it may be interesting to note that even the books written by great Buddhist Bhikshus have a Saraswati Stotra in the beginning praising Saraswati, the Goddess of Learning and Wisdom. It is from Tibet and its surroundings that we have obtained many Taantric texts specifying the method of worship of divinities. An examination of the works of Shri Harsha and Bilhana, which are written in Sanskrit, makes it clear that, even during the time when Buddhism was flourishing, the Vedic rituals and the Vedic way of life were followed assiduously.
Many reformists, who may not accept the way of life I proclaim, also come to me. Although not subscribing to my belief, they think that there is something good in me and their visit is on account of personal regard. This has been the case in our country in the past also. Not only those who slightly differed from the accepted and popular faith but even those who violently upheld and propagated their widely divergent reformism, were held in high esteem not necessarily on account of their views but on account of their personal qualities and praiseworthy way of living. Even today, the stage has not been reached when our traditional beliefs and customs have been completely thrown overboard. After all, like seasoned wood tested through the years, these are deeply embedded in the people’s minds and hearts over the centuries. In short, people have been following in the footsteps of their forefathers and the traditions passed on from generation to generation. This was what happened to Buddhist religious reformism also. Therefore, when the Buddhist doctrine was brought under fire by Udayana and Kumarila Bhatta, people had no difficulty in abandoning the new faith of Buddhism and reverting to the traditional.
Sankara And The Other Doctrines
The ultimate stage in Adi Sankara’s doctrine was the giving up of rituals and concentrating the mind on the infinite. But, unlike Buddha, he did not recommend that, even at the initial stages, the Vedic Karmas should be ignored but only after attaining mental purity, as a result of the performance thereof, should one turn to introspection and enquiry into self. First, one has to abide by the karmas, as stipulated in the Meemaamsa and go ultimately to the stage of the Buddhist cult of giving them up.
Our Acharya accepted the tenets of Buddism, Meemaamsa, Saankhya and Nyaaya to a certain extent and upto a certain stage but was opposed to all of the these at stages beyond those. These faiths can be said to have held fast to one aspect of the total doctrine as their ultimate conclusion, whereas our Acharya synthesised and harmonsed them all.
Saankhya
Saankhya says that the Aatma, which is not involved with anything else but is the cause of all, is the “Purusha” and that Maaya, the Sakti which activates the world is “Prakriti”. It goes on to say that the world consists of 24 Tatvas (or first Principles) including the Prakriti. Prakriti is the first Tatva. From this has evolved the second Tatva called Ahankaara, i.e., ego or the feeling that there exists something called the self. This splits itself into two. On one side it becomes the Chaitanya (animate life and knowledge) or the Jiva with its mind and five sense organs and five limbs or work organs. On the other side, it is the inanimate, Jada or matter with its five Tanmaatras or elements and the five Mahabhootas or big principles. The five sense organs of the Jiva (animate being) are the five organs which communicate the external objects to him. They eyes which see, the nose which smells, the mouth which tastes, the ear which hears, the skin that feels the touch are the sense organs. These that enable the Jiva to function direct or indulge directly in action are the Karmendriyas or working organs. The mouth also figures here. As a sense organ, it indulges in the function of speech. The hand that does all the jobs is another working organ. The functional bias of the sens organs, viz., sount (ear), touch (skin), image or sight (eye), ras or taste (mouth), smell (nose) which are subtle, are the Tanmaatras. These principles in their Jada or inanimate existence are the five Mahabhootas as, viz., Sky (sound), Vayu (touch), Agni (form or image), Water (ras or taste), Prithvi (earth) (smell). Thus, there are in all twenty-four tatvas comprising Prakriti, Mahat, Ahamkaara, the mind, the five sense organs the five working organs, the five Tanmaatras and the five Mahabhootas.
These 24 are also accepted by the Advaitic doctrine of Vedanta. But Advaita says that the Being called Isvara or Saguna Brahman (Brahman with attributes) causes the union of the Aatma (the Brahman without attributes) and Prakriti (Maya) – whereas Saankhya makes no mention of Isvara at all.
Saankhya also propounds the three Gunas viz., Satva, Rajas and Tamas which are accepted by all schools on Vedantic philosophy. Satva is the clear, peaceful, calm and exalted state. Rajoguna is all speed and movement. Tamoguna is laziness, sleep and inaction. In the Bhagavad Gita, these are elaborately dealt with in the Gunatraya-Vibhaga Yoga. The Lord tells Arjuna to become Nistraigunya, meaning that one should try to remain at the level of the pure Aatma which transcends all the three gunas. Saankhya also urges that all the conflicts and dissatisfaction are the result of the clash of these gunas and their effect should be neutralised. But, unlike the Bhagavad Gita and other Vedic Saastras, it does not recommend the worship of Isvara, surrender and introspection as the means to attain such equanimity and exalted state.
“The Purusha alone has the animation of life (Jiva-Chaitanya). Prakriti is inanimate (Jada). Hence, by itself Prakriti cannot act. It, however, manifests itself as the twenty-four basic principles or Tatavas solely through the impulse of the Purusha but Purusha is totally disengaged from and uninvolved with Prakriti and is solely a matter of cognisance,” so says Saankhya in apparent contradiction.
The word “Kewala” (केवलम्) means to be alone without being mixed with any other thing – by itself and by its own volition. The adjective of this is Kaivalya. In Saankhya, Kaivalya is the name given to Moksha. The Jiva or the self transcends the twenty-four basic principles, gets free from the inanimate or Jada and stays by itself at the level of the Purusha. This is Kaivalya.
The goal of Advaita is also to merge with the Aatma which is synonymous with Purusha, rejecting all else as Maya or illusion. but methods to achieve this objective like karma, upaasana (Bhakti) and later jnaanavichaara or introspection which are recommended by the Acharya are not to be found in Saankhya. Most of it confines itself to a dissertation of the twenty-four Tatvas.
There is another shortcoming in Saankhya. “The Purusha (Aatma) is mere knowledge without any indulgence in activity. Prakriti is mere activity but without any knowledge (jnaana) or life and animation, (Jiva Chaitanya). Such is the clear cut differentiation, without explaining how it is possible for the Jada (inanimate matter) to transform itself into the other Tatvas. The only explanation offered is that the presence of the Purusha (Jiva Chaitanya) is responsible for such mutations of the Jada. The Purusha is said to be without any activity but Prakriti is said to be active through the agency of the Purusha. How is this reconciled? Saankhya replies to this as follows: Just as the presence of the magnet activates the iron particles without any overt intention to do so, so also Prakriti is active on account of the mere presence of the Purusha. They both act in a manner which can be likened to a blind man carrying a lame man on his shoulder. The blind man cannot see and the lame man cannot walk but the blind man can travel as per the directions of the lame man. Likewise, Prakriti which has no consciousness but is active carries Purusha which is nothing but consciousness and the worldly business is thus performed. This is no doubt appealing as an apt simile, but hardly logical. Advaita on the other hand says that the action-free, attributeless “Nirguna Brahman” alone appears to exist as the active attributeful Isvara and conducts the business of the world through Maya.
There is another big difference between Saankhya and Advaita. Although it talks of the Purusha as pure consciousness, instead of all the Jivaatmas being one and the same Aatma, it says that the Jivaatmas are many and separate.
Thus, although it contains some inconsistencies, it serves as an authority for the Vedantic concept in identifying and listing the basic principles (Tatvas). The word ‘Saankhya’ (सांख्य) is derived from Sankhya (संख्या) which means to count in terms of numbers.
Sage Kapila has written a Sutra on the Saankhya doctrine. The important treatises on this subject are the Saankhya Kaarika by Iswara Krishna and the Bhaashya Sutra by Bigyaana Bikshu.
In the Bhagavad Gita, Lord Krishna Himself has enunciated and explained many Saankhya principles. But, when he talks of Saankhya and Saankhya Yoga as two different paths to realisation, he means the path through knowledge or jnaana.
Saankhya says that the Purusha has to be realised as separate from the Prakriti and leaves it at that. Raaja Yoga on the other hand starts from where Saankhya left off and tells us how and through what method is such a separation to be effected and what discipline or Sadhana should be undertaken. But, in Yoga, the existence of the Isvara is accepted and his worship is given as the means to control the mind. Patanjali’s “Raaja Yoga” defines Yoga generally as the method or device to control the fissiparous tendencies of the mind.
Although Saankhya and Yoga do not form part of the 14 or 18 Vidyas of our Saastras, they nevertheless are two of the important disciplines and hence I have mentioned them.
It may be recalled that I made a reference to this earlier. I said that although Meemaamsa does not accept devotion to God as essential it nevertheless accepts the authority of the Vedas in the same way as Saankhya which, whilst accepting the Vedic authority, preaches Godlessness. (Nireeshwara Vaada). Adi Sankara has taken what is correct from the various schools of thought and rejected those that are unacceptable. He thus established the basic Vedantic faith, which is the cause of these other theories and which are also contained in Vedanta. Adi Sankara accepted the conclusion of Buddhism at the stage of pure consciousness, the unmixed jnaana of the Saankhya philosophy in the place of the Nirguna Brahman – the Prakriti of it which corresponds to Maya, and the twenty-four basic principles which it lists, the ritualism of Meemaamsa, the Isvara of Nyaaya and the various proofs which it offers thereon. His view is that each of these doctrines stresses one aspect only and make it the goal of human existence, whereas they are to be harmonised into a single entity, acceptable to both reason and intellect.
Harih Harah!!
बौद्ध धर्म और दूसरी सोच
शंकर और बौद्ध धर्म
बहुत से लोग कहते हैं कि आदि शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म की बुराई की थी, इसलिए इसे इस देश से निकाल दिया गया । यह गलत है । वह सांख्य और मीमांसा की गलतियों को ठीक करने में ज़्यादा दिलचस्पी रखते थे, जो ईश्वर के महत्व को नकारते थे, हालांकि वे असल में वैदिक सिद्धांतों को मानते थे । शंकर ने तर्क दिया है कि, वैदिक ग्रंथों और ब्रह्मसूत्र के शब्दों और अर्थ दोनों के अनुसार, ईश्वर शब्द की परिभाषा को नज़रअंदाज़ करना और यह कहना कि वह बनाने वाला या फल दाता नहीं है, गलत है । यह तर्क देते हुए कि सत्य वही है जो वेदों में कहा गया है, उन्होंने बताया कि ईश्वर के बिना दुनिया नहीं बनाई जा सकती । न ही यह साबित किया जा सकता है कि कर्म अपने आप करने वाले को फल देंगे । ईश्वर ही फल देने वाला और रेगुलेटर दोनों है । सिर्फ़ उसकी चेतना, उसकी इच्छा (संकल्प) ने ही दुनिया बनाई और कर्म का नियम बनाया जिसके अनुसार ही कर्मों का फल भोगा या भोगा जाता है, जैसा भी मामला हो ।
उन्होंने सांख्य और मीमांसा विद्यालयों के अनुयायियों के तर्कों का प्रभावी ढंग से प्रतिवाद किया है । उन स्थानों पर भी जहाँ बौद्ध धर्म तीव्र आलोचना करने प्रस्तुत हुई थी, वे मूल सूत्र में शामिल बातों से आगे नहीं गए और केवल बौद्ध धर्म द्वारा ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की निंदा की । आचार्य के लेखन किसी भी तरह से यह नहीं दिखाते कि अकेले उनकी निंदा की तीव्रता और तर्क के कारण बौद्ध धर्म को इस देश से निर्वासित कर दिया गया । लेकिन फिर, बौद्ध धर्म इस देश से गायब क्यों हो गया ? इसकी पकड़ को ढीला करने के लिए कोई जिम्मेदार जरूर रहा होगा । इसका उत्तर है मीमांसक और तर्किक (तर्कशास्त्री) । तर्क शास्त्र (तर्क) में निपुण लोग ‘तार्किक’ कहलाते हैं । तर्क न्याय शास्त्र से संबंधित है, जो चौदह विद्याओं में मीमांसा के बाद क्रम से आता है । न्याय शास्त्र में निपुण लोग ‘नैयायिक’ कहलाते हैं । उदयनाचार्य जो एक तार्किक थे और कुमारिल भट्ट जो एक मीमांसक थे, दोनों ने अपने-अपने कारणों से बौद्ध धर्म की कड़ी आलोचना की है । उदयनाचार्य ने बौद्ध धर्म की बुराई की क्योंकि यह उपदेश देता था कि कोई ईश्वर या भगवान नहीं है । मीमांसकों ने, हालांकि कहा कि कर्म ही फलदाता हैं, ईश्वर नहीं, फिर भी उन्होंने यह माना कि सभी कर्मों का फल मिलता है और वैदिक रीति-रिवाजों को उत्साह के साथ और सही तरीके से किया जाना चाहिए । इसलिए, मीमांसकों ने बौद्ध धर्म की बुराई की, जो उपदेश देता था कि वेदों में बताए गए किसी भी कर्मकांड की ज़रूरत नहीं है । कुमारिल भट्ट ने बौद्ध धर्म के इस पहलू पर विस्तार से बात की है और इसकी बुराई की है । इस तरह, उदयनाचार्य का बौद्ध धर्म के नास्तिक पहलू पर हमला और कुमारिल का बौद्ध धर्म द्वारा वैदिक रीति-रिवाजों को नकारने की बुराई, कोई तरक्की नहीं कर पाई । इसलिए बाद में आए शंकर को बौद्ध धर्म के बुरे पहलुओं पर गहराई से बात करने की कोई ज़रूरत नहीं थी । उन्होंने सिर्फ़ उन गलतियों को सामने लाने तक ही खुद को सीमित रखा जो बौद्धों की मान्यताओं में भी पाई जाती थीं ।
आचार्य ने पक्के तौर पर यह साबित किया कि एक भगवान या ईश्वर है जो इस अनोखी दुनिया को बनाने वाला है और वही किसी के कामों का फल देता है और उसके कर्मों के नतीजों को कंट्रोल करता है ।
मैंने यह सब सिर्फ़ इस गलत जानकारी को सही करने के लिए कहा है कि शंकराचार्य बौद्ध धर्म के दुश्मन थे ।
बौद्ध धर्म और हिंदू समाज
मेरे लिए यह साफ़ है कि भारत में कभी भी लोगों ने पूरी तरह से बौद्ध धर्म को नहीं माना, हालाँकि वे गौतम बुद्ध को एक महान व्यक्ति मानते थे । आज, बहुत से लोग “थियोसोफिकल मूवमेंट” नाम के एक आंदोलन में शामिल हो गए हैं । फिर भी, उनमें से कई लोग हिंदुओं की तरह ही त्योहार मनाते रहते हैं । उनकी शादियाँ और इसी तरह के दूसरे रीति-रिवाज वैदिक नियमों के अनुसार किए जाते हैं । उन्होंने हिंदू धर्म नहीं छोड़ा है । जब कुछ महान लोग पैदा होते हैं, तो बहुत से लोग उनकी इंसानियत, समझदारी और चरित्र जैसे महान गुणों से आकर्षित होते हैं । फिर भी, उनके नाम पर वैदिक रीति-रिवाजों में कुछ बदलाव या उनसे हटकर बनाए गए मिशन या संस्थाएँ, आमतौर पर उनके मानने वाले अपने घरों में नहीं मानते । वे पुरानी परंपराओं से जुड़े रहते हैं । महात्मा गांधी और गांधीवाद ऐसे नाम हैं जिनकी याद आती है । लोगों ने अपने उत्साह में पहले उन्हें राम और कृष्ण के अवतारों से भी ऊपर रखा था । फिर भी, अपनी निजी ज़िंदगी में उन्होंने उनकी ज़रूरी शिक्षाओं, जैसे विधवा विवाह, हरिजनों से मिलना-जुलना वगैरह को नहीं माना । इस हद तक, उन्होंने गांधीवाद को नहीं माना, हालाँकि समाज में वे गांधी के पक्के मानने वाले माने जाते थे । लेकिन क्योंकि गांधी में एक इंसान के तौर पर बहुत अच्छे निजी गुण थे, जैसे त्याग, सच्चाई, भगवान के प्रति भक्ति, जनसेवा वगैरह, इसलिए लोग उनका बहुत सम्मान करते थे । इसका यह मतलब नहीं निकालना चाहिए कि उन्होंने उनकी सभी शिक्षाओं और बातों को पूरी तरह से मान लिया ।
बुद्ध के साथ भी यही हुआ । उनकी निजी ज़िंदगी बहुत तारीफ़ के काबिल थी । एक राजकुमार के तौर पर, उन्होंने अपनी जवानी में अपनी पत्नी और छोटे बेटे को भी छोड़ दिया, ताकि आम आदमी की हालत सुधारने के काम में खुद को लगा सकें । इन त्याग और अच्छे गुणों ने लोगों को अपनी ओर खींचा । इसका यह मतलब या नतीजा नहीं था कि सभी बौद्ध सिद्धांतों को मान लिया गया या उनका पालन किया जाने लगा । सिर्फ़ इसलिए कि बुद्ध ने रीति-रिवाजों की बुराई की, लोगों ने उन्हें नहीं छोड़ा । वे अब भी जाति व्यवस्था और अलग-अलग रीति-रिवाजों को मानते थे लेकिन बुद्ध के निजी गुणों की तारीफ़ करते थे । न ही लोग बड़ी संख्या में भिक्षु (संन्यासी) बने । उन्होंने शादी की और परंपरा के अनुसार ऐसे जीवन के लिए तय काम करते हुए गृहस्थ बन गए । हालाँकि सम्राट अशोक बौद्ध थे और उन्होंने बौद्ध धर्म के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन उन्होंने समाज के वैदिक जीवन जीने के तरीके को न तो बदला और न ही वे इसे बदल पाए । मशहूर अशोक स्तंभ और अशोक के कई शिलालेख इस बात के सबूत हैं कि उन्होंने अपनी प्रजा की धार्मिक आज़ादी की रक्षा की । ऐसा लगता है कि बुद्ध भिक्षुओं (संन्यासियों) को छोड़कर, ज़्यादातर घर के लोग वैदिक जीवन जीने के तरीके को मानते रहे । हालाँकि बौद्ध लोग ईश्वर या भगवान या देवी-देवताओं का खास ज़िक्र नहीं करते हैं, लेकिन यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि महान बौद्ध भिक्षुओं की लिखी किताबों में भी शुरुआत में सरस्वती स्तोत्र है जिसमें विद्या और बुद्धि की देवी सरस्वती की तारीफ़ की गई है । तिब्बत और उसके आस-पास से ही हमें देवी-देवताओं की पूजा का तरीका बताने वाले कई तांत्रिक ग्रंथ मिले हैं । श्री हर्ष और बिल्हण की संस्कृत में लिखी रचनाओं की जांच करने पर यह साफ हो जाता है कि जब बौद्ध धर्म फल-फूल रहा था, तब भी वैदिक रीति-रिवाजों और वैदिक जीवनशैली का पूरी लगन से पालन किया जाता था ।
कई सुधारवादी, जो शायद मेरे बताए जीवन जीने के तरीके को न मानें, वे भी मेरे पास आते हैं । हालांकि वे मेरी मान्यताओं को नहीं मानते, लेकिन उन्हें लगता है कि मुझमें कुछ अच्छाई है और वे सिर्फ अपने लिए आते हैं । हमारे देश में पहले भी ऐसा होता रहा है । न सिर्फ वे लोग जो आम और लोकप्रिय विश्वास से थोड़े अलग थे, बल्कि वे लोग भी जो अपने अलग-अलग सुधारवाद को ज़ोर-शोर से मानते और फैलाते थे, उन्हें उनके विचारों की वजह से नहीं, बल्कि उनके निजी गुणों और तारीफ के काबिल जीवन जीने के तरीके की वजह से बहुत सम्मान दिया जाता था । आज भी, वह दौर नहीं आया है जब हमारी पारंपरिक मान्यताएं और रीति-रिवाज पूरी तरह से खत्म हो गए हों । आखिर, सालों से परखी हुई लकड़ी की तरह, ये सदियों से लोगों के दिलो-दिमाग में गहराई से बसे हुए हैं । आसान शब्दों में कहें तो, लोग अपने पुरखों के नक्शेकदम पर चलते रहे हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनकी परंपराएँ चली आ रही हैं । बौद्ध धर्म के सुधार के साथ भी यही हुआ । इसलिए, जब उदयन और कुमारिल भट्ट ने बौद्ध धर्म की आलोचना की, तो लोगों को बौद्ध धर्म के नए धर्म को छोड़कर पारंपरिक धर्म पर लौटने में कोई मुश्किल नहीं हुई ।
शंकर और अन्य सिद्धांत
आदि शंकर के सिद्धांत का आखिरी पड़ाव था रीति-रिवाजों को छोड़ना और मन को अनंत पर लगाना । लेकिन, बुद्ध के उलट, उन्होंने यह सलाह नहीं दी कि शुरुआती स्टेज में भी वैदिक कर्मों को नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए, बल्कि उन्हें करने के नतीजे में मानसिक पवित्रता पाने के बाद ही आत्मनिरीक्षण और खुद की जांच-पड़ताल करनी चाहिए । सबसे पहले, मीमांसा में बताए गए कर्मों का पालन करना होगा और आखिर में उन्हें छोड़ने के बौद्ध पंथ के स्टेज तक जाना होगा ।
हमारे आचार्य ने बौद्ध धर्म, मीमांसा, सांख्य और न्याय के सिद्धांतों को एक हद तक और एक स्टेज तक माना है, लेकिन उनसे आगे के स्टेज पर इन सभी का विरोध किया है । कहा जा सकता है कि इन धर्मों ने पूरे सिद्धांत के एक पहलू को ही अपना आखिरी नतीजा माना, जबकि हमारे आचार्य ने उन सभी को मिलाकर एक जैसा बनाया ।
सांख्य
सांख्य कहता है कि आत्मा, जो किसी और चीज़ से जुड़ी नहीं है, बल्कि सबका कारण है, वह “पुरुष” है और माया, वह शक्ति जो दुनिया को एक्टिवेट करती है, वह “प्रकृति” है । आगे कहा गया है कि दुनिया में प्रकृति समेत २४ तत्व (या प्रथम सिद्धांत) हैं । प्रकृति पहला तत्व है । इससे दूसरा तत्व बना है जिसे अहंकार कहते हैं, यानी ईगो या यह एहसास कि ‘अहं’ (सेल्फ -स्वत्व) नाम की कोई चीज़ है । यह खुद को दो हिस्सों में बांट लेता है । एक तरफ यह चैतन्य (चेतन जीव एवं ज्ञान) यानि जीव बन जाता है जिसके मन और पांच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पांच कर्मेन्द्रियाँ (हाथ-पैर या काम करने वाले अंग) होते हैं । दूसरी तरफ, यह जड़ या (भौतिक) पदार्थ होता है जिसके पांच तन्मात्राएं या तत्व और पांच महाभूत या बड़े सिद्धांत होते हैं । जीव (जानवर) के पांच सेंस ऑर्गन वे पांच अंग हैं जो उसे बाहरी चीज़ों के बारे में बताते हैं । वे आंखें जो देखती हैं, नाक जो सूंघती है, मुंह जो स्वाद लेता है, कान जो सुनते हैं, त्वचा जो स्पर्श महसूस करती है, वे ज्ञानेंद्रियां हैं । ये जो जीव को सीधे कार्य करने या सीधे कार्रवाई में शामिल होने में सक्षम बनाती हैं, वे कर्मेंद्रियां या काम करने वाली अंग हैं । मुंह भी यहां आता है । एक ज्ञानेंद्रिय के रूप में, यह वाचन (वाणी बोलने) के कार्य में शामिल होता है । हाथ जो सभी काम करता है, एक और काम करने वाला अंग है । ज्ञानेंद्रियों के कार्यात्मक पूर्वाग्रह, यानी, ध्वनि (कान), स्पर्श (त्वचा), छवि या दृष्टि (आंख), रस या स्वाद (मुंह), गंध (नाक) जो सूक्ष्म हैं, तन्मात्राएं हैं । अपने जड़ या निर्जीव अस्तित्व में ये सिद्धांत पांच महाभूत हैं, यानी, आकाश (ध्वनि), वायु (स्पर्श), अग्नि (रूप या छवि), जल (रस या स्वाद), पृथ्वी (पृथ्वी) (गंध) । इस प्रकार, कुल चौबीस तत्व हैं जिनमें प्रकृति, महत्, अहंकार, मन, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच तन्मात्राएँ और पाँच महाभूत शामिल हैं ।
इन २४ को वेदान्त के अद्वैतवादी सिद्धांत द्वारा भी स्वीकार किया जाता है । लेकिन अद्वैत कहता है कि ईश्वर या सगुण ब्रह्म (गुणों वाला ब्रह्म) कहलाने वाला सत्ता आत्मा (निर्गुण ब्रह्म) और प्रकृति (माया) का मिलन कराता है – जबकि सांख्य में ईश्वर का कोई उल्लेख नहीं है ।
सांख्य तीन गुणों, यानी सत्व, रजस और तमस को भी बताता है, जिन्हें वेदांतिक दर्शन (फिलॉसफी) के सभी स्कूल मानते हैं । सत्व साफ, शांत, स्थिर और ऊंची हालत है । रजोगुण पूरी तरह से गति (स्पीड) और संचार (मूवमेंट) है । तमोगुण आलस्य, नींद और निष्क्रियता है । भगवद गीता में, इनके बारे में गुण त्रय-विभाग योग में विस्तारपूर्वक बताया गया है । भगवान अर्जुन से कहते हैं कि निस्त्रैगुण्य बनो, जिसका मतलब है कि व्यक्ति को उस शुद्ध आत्मा के स्तर (लेवल) पर रहने की कोशिश करनी चाहिए जो तीनों गुणों से परे है । सांख्य यह भी कहता है कि सभी झगड़े और असंतोष इन गुणों के टकराव का नतीजा हैं और उनके असर को खत्म कर देना चाहिए । लेकिन, भगवद गीता और दूसरे वैदिक शास्त्रों के उलट, यह (सांख्य दर्शन) ईश्वर की पूजा, शरणागति (सरेंडर) और आत्मनिरीक्षण को ऐसी समता और ऊंची हालत (इक्वैनिमिटी एवं एक्जाल्टेड स्टेट) पाने के तरीके के तौर पर नहीं बताता है ।
“सिर्फ़ पुरुष में ही जीवन (जीव-चैतन्य) है । प्रकृति जड़ है । इसलिए, प्रकृति अपने आप काम नहीं कर सकती । हालाँकि, यह सिर्फ़ पुरुष के आवेग से चौबीस बुनियादी सिद्धांतों या तत्वों के रूप में खुद को प्रकट करती है, लेकिन पुरुष प्रकृति से पूरी तरह अलग और असंबद्ध है और सिर्फ़ ज्ञान का विषय है,” सांख्य ने साफ़ तौर पर इसके उलट कहा है ।
“केवल” (केवलम्) शब्द का मतलब है बिना किसी दूसरी चीज़ के मिले-जुले अकेले रहना – अपने आप में और अपनी मर्ज़ी से रहना । इसका विशेषण (एडजेक्टिव) कैवल्य है । सांख्य में, कैवल्य मोक्ष को दिया गया नाम है । जीव या आत्मा चौबीस बुनियादी सिद्धांतों से आगे निकल जाता है, जड़ता या जड़ से आज़ाद हो जाता है और पुरुष के स्तर (लेवल) पर अकेला रहता है । यही कैवल्य है ।
अद्वैत का लक्ष्य आत्मा में मिल जाना भी है, जो पुरुष का ही दूसरा नाम है, और बाकी सब को माया या भ्रम मानकर छोड़ देना है । लेकिन इस लक्ष्य को पाने के तरीके जैसे कर्म, उपासना (भक्ति) और बाद में ज्ञानविचार या आत्मनिरीक्षण, जो आचार्य ने बताए हैं, सांख्य में नहीं मिलते । इसका ज़्यादातर हिस्सा चौबीस तत्वों की एक थीसिस तक ही सीमित है ।
सांख्य में एक और कमी है । “पुरुष (आत्मा) सिर्फ़ ज्ञान है, जिसमें कोई काम नहीं है । प्रकृति सिर्फ़ काम है, लेकिन उसमें कोई ज्ञान (ज्ञान) या जीवन और सजीवता (जीव चैतन्य) नहीं है । यह साफ़ फ़र्क है, बिना यह बताए कि जड़ (बेजान चीज़) के लिए खुद को दूसरे तत्वों में बदलना कैसे मुमकिन है । सिर्फ़ यही वजह दी गई है कि जड़ के ऐसे बदलावों के लिए पुरुष (जीव चैतन्य) की मौजूदगी ही ज़िम्मेदार है । पुरुष को बिना किसी काम के कहा जाता है, लेकिन प्रकृति को पुरुष की मदद से एक्टिव कहा जाता है । इसे कैसे ठीक किया जाए ? सांख्य इसका जवाब इस तरह देते हैं: जैसे चुंबक की मौजूदगी लोहे के कणों को बिना किसी साफ़ इरादे के एक्टिव कर देती है, वैसे ही प्रकृति भी सिर्फ़ पुरुष की मौजूदगी की वजह से एक्टिव है । वे दोनों इस तरह काम करते हैं जैसे एक अंधा आदमी अपने कंधे पर एक लंगड़े आदमी को उठाए हुए हो । अंधा आदमी देख नहीं सकता और लंगड़ा आदमी चल नहीं सकता, लेकिन अंधा आदमी लंगड़े आदमी के कहने पर घूम सकता है । इसी तरह, प्रकृति जिसमें कोई चेतना नहीं है, लेकिन एक्टिव है, पुरुष को लेकर चलती है जो चेतना के अलावा कुछ नहीं है और दुनिया का काम इस तरह होता है । यह एक सही तुलना के तौर पर तो अच्छा लगता है, लेकिन शायद ही तार्किक (लॉजिकल) हो । दूसरी ओर, अद्वैत कहता है कि बिना कर्म वाला, बिना गुण वाला “निर्गुण ब्रह्म” ही एक्टिव ‘गुण वाले ईश्वर’ (सगुण ब्रह्म) के रूप में मौजूद लगता है और माया के ज़रिए दुनिया का काम करता है ।
सांख्य और अद्वैत में एक और बड़ा फ़र्क है । हालाँकि यह पुरुष को शुद्ध चेतना के रूप में बताता है, लेकिन सभी जीवात्माओं के एक ही आत्मा होने के बजाय, यह कहता है कि जीवात्माएँ कई और अलग-अलग हैं ।
इस तरह, हालाँकि इसमें कुछ कमियाँ हैं, यह बुनियादी सिद्धांतों (तत्वों) को पहचानने और उन्हें सूचीबद्ध (लिस्टिंग) करने में वेदांतिक परिकल्पना (कॉन्सेप्ट) के लिए एक अधिकृत (अथॉरिटी) का काम करता है । ‘सांख्य’ शब्द संख्या से लिया गया है जिसका मतलब है अंकों (नंबरों) में गिनना ।
ऋषि कपिल ने सांख्य सिद्धांत पर एक सूत्र लिखे हैं । इस विषय पर महत्वपूर्ण ग्रंथ ईश्वर कृष्ण की “सांख्य कारिका” और विज्ञान भिक्षु का “भाष्य सूत्र” हैं ।
भगवद गीता में, भगवान कृष्ण ने खुद कई सांख्य सिद्धांतों को बताया और समझाया है । लेकिन, जब वे सांख्य और सांख्य योग को आत्मसाक्षात्कार के दो अलग-अलग रास्तों के रूप में बताते हैं, तो उनका मतलब ज्ञान या ज्ञान के रास्ते से होता है ।
सांख्य कहते हैं कि पुरुष को प्रकृति से अलग महसूस करना होगा और यहीं पर बात खत्म करते हैं । दूसरी ओर, राज योग वहीं से शुरू होता है जहाँ सांख्य ने छोड़ा था और हमें बताता है कि ऐसा अलगाव कैसे और किस तरीके से किया जाना है और कौन सी साधना या अनुशासन करना चाहिए । लेकिन, योग में, ईश्वर के होने को माना जाता है और उनकी पूजा को मन को नियंत्रण (कंट्रोल) करने का तरीका बताया गया है । पतंजलि का “राज योग” आम तौर पर योग को मन की अलग-अलग तरह की आदतों को नियंत्रित (कंट्रोल) करने का तरीका या तरीका बताता है ।
हालांकि सांख्य और योग हमारे शास्त्रों की १४ या १८ विद्याओं का हिस्सा नहीं हैं, फिर भी वे दो ज़रूरी विषय हैं और इसलिए मैंने उनका ज़िक्र किया है ।
याद दिला दूं कि मैंने पहले भी इसका ज़िक्र किया था । मैंने कहा था कि हालांकि मीमांसा भगवान की भक्ति को ज़रूरी नहीं मानता, फिर भी वह वेदों की सच्चाई को उसी तरह मानता है जैसे सांख्य, जो वैदिक सच्चाई को मानते हुए भी ईश्वरविहीनता का प्रचार करता है । (निरीश्वर वाद) । आदि शंकराचार्य ने अलग-अलग सोच से जो सही है उसे लिया और जो नामंज़ूर हैं उन्हें खारिज कर दिया । इस तरह उन्होंने बुनियादी वेदांतिक विश्वास की स्थापना की, जो इन दूसरी सिद्धान्तों (थ्योरीज़) का कारण है और जो वेदांत में भी शामिल हैं । आदि शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म के नतीजे को शुद्ध चेतना के स्तर पर माना, सांख्य दर्शन के बिना मिलावट वाले ज्ञान को निर्गुण ब्रह्म की जगह पर – इसकी प्रकृति जो माया से मेल खाती है, और इसमें बताए गए चौबीस मूलभूत सिद्धांत, मीमांसा का कर्मकांड, न्याय का ईश्वर और इसके अलग-अलग सबूत से । उनका मानना है कि इनमें से हर सिद्धांत सिर्फ़ एक पहलू पर ज़ोर देता है और उसे इंसानी ज़िंदगी का मकसद बनाता है, जबकि उन्हें एक ही चीज़ में मिलाना है, जो तर्क और बुद्धि दोनों को मंज़ूर हो ।
हरिः हरः!!

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Eh lekh paidh k badd neek lagal ki baudh dharma aa aan dharma m farak k karan aa ohi san alag baat. Budhh k vichar aa hindu samaj riti rivaj, Baudh dharma aa dosar soch. Shankar aa Baudh Dharma ki chhi aa ohi k attar k karan ki chhi se sab sange baguto kichhu sab bujhayal gel aichh.
सांख्य दर्शनक बिना मिलावट वला ज्ञान केँ निर्गुण ब्रह्म केर स्थान पर – एकर प्रकृति जे कि माया सँ मेल खाइत अछि, आर एहि मे कहल गेल चौबीस मूलभूत सिद्धान्त, मीमांसा केर कर्मकांड, न्याय केर ईश्वर आर एकर अलग-अलग सबूत सब केँ सेहो ओ मानलनि । हुनकर मानब छन्हि जे हरेक सिद्धान्त मात्र एकटा पहलू पर जोर दैत अछि तथा ओकरा मनुष्यक जीवन केर मकसद (उद्देश्य) बनबैत अछि, जखन कि ओकरा एक्केटा चीज मे मिलेबाक अछि, जे कि तर्क आ बुद्धि दुनू केँ मंजूर होइक ।