समयक अभाव आ कर्त्तव्य केर सीमा बढ़ला सौं कुलदेवताक पूजा मे कमी

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लेख विचार
प्रेषित: पीतांबरी देवी
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय:- दैनिक पूजा सँ वंचित कुल देवी/ देवता। एकर उपाय आ दुष्परिणाम

वंचित होईत गाम के कुल देवता (घर के गोसौन)घर के कुल देवी मिथिला मे घर घर मे स्थापित छथि । मां भगवती के मिथिला में घर घर में आराधना पूजा पातरी होईत अछि ।पहिले हमरा मां काकी सब सब दिन गामे में रहली आर बहुत श्रद्धा भाव से भगवती कुल देवता के पूजा करैत छलि ।भोरे से भगवती के चिनवार निप के सराय बाटी मैज के फुल तोरी के भगवती चीनवार पर राखि देल जाईत छल ।फेर नहा सोना के मां काकी भगवती के पूजा करैत छलि।किछ भय जाईत छल जनमा असौज रहे वा मरना असौच रहे भगवती के पूजा होइते टा छल कुलदेवता अपूज नहि रहैत छलथि केकरो से ब्राम्हणि ,भगीनमान , वा कोनो गोटे जिनका असौच नहि रहैत छलनि हुनका से पूजा करा देल जाईत छल।समय पलटल आर मिथिला से सब पलायन करय लगला देश प्रदेश में जा जा के जीवन यापन के साधन जूटावय लगला ।गाम घर छुटि गेलनि मां काकी स्वर्गिय भय गेलि घर सुन भय गेल ते भगवती अपूज रहय लगलि ।एहेन नै छैक जे परदेशि सब के कुल देवता पर से स्था उठि गेल छनि खुब स्था छनि गाम मे जिनका पूजा केनहार भेटै छनि ओ पाई दय के पूजा करै लेल लोक रखने छथि । लेकिन आब ओहो लोक नै भेटैत छै ताहि से कुलदेवता अपूज रहय लगला आर घर मे ताला लटकि गेल। बहुत गोटा परदेशो मे जतै रहैत छथि ओहि ठाम उदिष्ट पूजा करैत छथि आर गामेजेका हुनका पूजा पातरी दैत छथिन। सब पावनी तिहार करैत छथि। हम ते कहब जे भगवती उठा के लय जाय वला बस्तु ते छथि नहि ओ ते स्थापित रहैत छथि आर कियो कियो ते बहुत जाग्गन्त आर उग्र सेहो रहैत छथि कुल देवता सब लेकिन ओहो देवता सब अपूज रहि जाईत छथि कारण कियो पाईयो दय के पूजा केनहार नहि भेटैत छथि आर घर के सब प्रदेश मे रहैत छथि।ओहो सब कि करता गाम घर मे ते कोनो जीविका के साधन छैक नहि तखनि ते लाचार भय के बाहर कमाय जाईये परैत छनि । गाम घर छोरै परैत छनि आर कुल देवता छुटबे करैत छथिन।जे गामो घर मे छथि आर नौकरी करैत छथि ओहो पूजा पाठ नहि कय पबैत छथि।अखनि के समय मे एहेन भय गेलै अछि जे पूरूष कि जनानियो सब नौकरी करय लगलि अछि आर पाचे बजे भोर बस पकैर के कार्यालय के स्थान पर जाईत छथि ओहेन मे कि कुल देवता के कोना पूजत। अधिरतिये से ओ पति बच्चा लेल नास्ता बनवय लगैत छथि आर देवता पितर के बिसरैत जैत छथि। बहुत कारण भय गेले जाहि से कुल देवता के पूजा नहि भय रहल अछि। तें कहल जाइ छै मन चंगा ते कठौतिए मे गंगा। जेकरा जतेक पार लागि सकै से तते निमाहु।