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मिथिलाभाषा रामायणः अयोध्याकाण्ड – रामजीक भरतजी संग भेंट

1589 भ्यूज

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अयोध्याकाण्ड – नवम अध्याय

रामजीक भरतजी संग भेंट

।चौपाइ।

श्रीरघुनन्दन सुन्दर चरण । महि मे अङ्कित विधिगण-शरण ॥१॥
कुलिश कमल ध्वज धूलि मे रेख । अकलुष अदुख भरत से देख ॥२॥
आज धन्य भेल हमरो भाग । प्रभु-दर्शन-उतकण्ठा लाग ॥३॥
शञ्च शञ्च प्रभु आश्रम जाय । हरष नोर सौँ भरत नहाय ॥४॥
दूर्व्वादल-श्यामल वर अङ्ग । सौदामिनि-छवि जानकि सङ्ग ॥५॥
जटा किरीटी वल्कल चीर । तरुण-अरुण-मुख श्रीरघुवीर ॥६॥
नयन विशाल भाल भल भ्राज । लक्ष्मण-सेवित चरण समाज ॥७॥
वैदेही सौँ वचन-विनोद । सदनसँ शत गुण परम प्रमोद ॥८॥
देखल भरत खसल प्रभु-चरण । दीनबन्धु कहि संकट-हरण ॥९॥
रामक नयन नोर बढ़िआय । दुहु भुज सौँ लेल हृदय लगाय ॥१०॥
मिलिमिलि पुन मिल मन अति हर्ष । देखि मुनि नयन जेहन घनवर्ष ॥११॥
जननि न जानथि श्रम गिरि बाट । खसब पड़ब की गड़ पद काँट ॥१२॥
कत छथि कहि कहि दौड़लि जाय । सर-वर जेहनि पिआसलि गाय ॥१३॥
रघुनन्दन सभ जननी जानि । कयल प्रणाम बहुत सन्मानि ॥१४॥
गुरुपद कय साष्टाङ्ग प्रणाम । धन्य धन्य हम कहलनि राम ॥१५॥
लक्ष्मण क्रमक्रम कयल प्रणाम । यथायोग्य गुरुजन जे नाम ॥१६॥
शाशु पुतोहु अङ्क मे राखि । जिबइत मुह देखल ई भाखि ॥१७॥
लाजहि केकयि रहल सशंक । विधि देल हमरहि माँथ कलंक ॥१८॥
आगत जे पुरलोक छलाह । यथायोग्य सभ जन बैसलाह ॥१९॥
कहु गुरु पिता-कुशल की रीति । हमरा सभ पर पुरुब पिरीति ॥२०॥
राम-वचन शुनि कहल वसिष्ठ । कालक गति अछि बहुत बलिष्ठ ॥२१॥
कहयक विषय रहय के चूप । सुरपुर गेला दशरथ भूप ॥२२॥
राम राम कहि कहि सौमित्रि । अयि कत गेलहुँ विदेहक पुत्रि ॥२३॥
कनइत एहिगत गत नृप-प्राण । शुनल राम श्रुति-शूल समान ॥२४॥
मुइलहुँ ई कहि खसला कानि । लक्ष्मण राम करुण-रस सानि ॥२५॥
हम अनाथ के करत दुलार । रहि गेल मनक मनोरथ भार ॥२६॥
सीता सती होथि नहि चूप । कहि कहि गुणनिधि सकरुण भूप ॥२७॥
अहँ वियोग-वश त्यागल प्राण । हमर हृदय भेल कुलिश समान ॥२८॥
रामक कनइत सभ जन कान । तनि सौँ त्रिभुवन भिन्न न आन ॥२९॥
कानय केओ नहि कहथि वसिष्ठ । कालपुरुष अनिवार्य्य बलिष्ठ ॥३०॥
कनलय नृप नहि अओता घूरि । की हो कहू कपारे चूरि ॥३१॥
मन्दाकिनि जल कयल स्नान । क्रम क्रम देल तिलाञ्जलि दान ॥३२॥
फल इङ्गुदी तथा पिण्याक । पिण्डदानमे कहइत वाक ॥३३॥
हम जे अन्न पितर से अन्न । पितरदेव मन होउ प्रसन्न ॥३४॥
गेला कुटी पुन कयल स्नान । क्रन्दन करुण वधिर जनु कान ॥३५॥
तेहि दिन सभ कयलनि उपवास । गज-तुरगादि न खयलक घास ॥३६॥
भेल अशौचक काण्ड समाप्त । दोसर दिवस जखन सम्प्राप्त ॥३७॥
मन्दाकिनि जल सकल नहाय । बैसल राम सभाजन जाय ॥३८॥
भरत तहाँ उठि जोड़ल हाथ । हम किछु कहब देव रघुनाथ ॥३९॥
सभ जन अनुमति उचित विवेक । अपनौँक होय एतहि अभिषेक ॥४०॥
मुनिजन बहुत अपन गुरु सङ्ग । देखि पड़ितहि अछि पुरजन रङ्ग ॥४१॥
जेहन पिता तेहन जेठ भाय । क्षत्रिय-धर्म्म सनातन न्याय ॥४२॥
पिता-राज्य पालन करु देव । सकल प्रजा मे यश बड़ लेव ॥४३॥
वन-वासक नहि सम्प्रति बेरि । वन-विनोद-मन अयबे फेरि ॥४४॥
बहुत यज्ञ विधिवत गोदान । करि उत्पन्न पुत्र गुणवान ॥४५॥
ज्येष्ठ पुत्रकाँ दय लेब राज । पुन आयब वन वनी-समाज ॥४६॥
केकयि-कृत मन नहि किछु धरिय । पालन हमर नाथ प्रभु करिय ॥४७॥

भावार्थः

भरत देखलनि जे धरती पर रामक सुन्दर चरणक निशान (छाप) पड़ल अछि, जे चरण ब्रह्मा-विष्णु-महेश केर अवलम्ब थिक । धूरा उपर वज्र, कमलक फुल आ ध्वजाक चिह्न अछि (जे चक्रवर्ती राजाक लक्षण थिक) । ई चरण-चिह्न पाप व कष्ट सब केँ दूर करयवला अछि । (देखिकय भरत कहलनि – ) “आइ हम बड़भागी भेलहुँ । आब रामजीक दर्शन लेल उत्कंठित छी ।” भरत शान्तिपूर्वक राम केर आश्रम पहुँचलाह । हर्ष सँ एतबे नोर बहलनि जे नहा गेलाह । भरत देखलनि, रामक सुन्दर शरीर दूभिक पातक समान श्यामल छन्हि । बिजलीक चमक जेहेन छविवाली जानकी हुनकर संग मे छथि । राम जटा, किरीट आ गाछक छाल केर परिधान लगौने छथि आ हुनकर मुँह उदयकाल केर लालिमा भरल सूर्यविम्ब समान चमकि रहल अछि । आँखि पैघ-पैघ छन्हि । ललाट चमकि रहल छन्हि । पैरक समीप बैसल लक्ष्मण सेवा करय मे लागल छथि । ओ सीताजीक संग मधुरालाप कय रहल छथि । राजभवनहुँ सँ सौ गुना बेसी प्रसन्न छथि । भरत देखिते देरी ‘हे दीनबन्धु, हे संकटहरण !’ कहिकय रामक पैर पर खसि पड़लाह । रामक आँखि मे नोरक बाढ़ि आबि गेलनि । ओ दुनू बाँहि सँ भरतजी केँ अपन गला सँ लगा लेलाह । अत्यन्त हर्षक संग भरत राम संग बेर-बेर गला-मिलन करैत छथि । ई मिलाप देखिकय मुनि वसिष्ठक आँखि मेघक समान बरखा करय लागल । कौशल्या आदि माता लोकनि पहाड़ी बाटक मेहनत बिसरि गेलिह । हुनका लोकनि केँ इहो होश नहि रहलनि जे खसि पड़तिह आ कि पैर मे काँटे गड़ि जेतनि । ओ सब ‘कतय छथि ? कतय छथि ?’ ई कहिते ओहिना दौड़ि गेलिह जेना प्यासल गाय सरोवर दिश दौड़ि पड़ैत अछि । राम माता सब केँ देखिते बहुते आदरक संग प्रणाम कयलनि । फेर गुरु वसिष्ठक पैर पर साष्टांग प्रणाम कय केँ कहलाह – “हम धन्य-धन्य भेलहुँ !” फेर क्रमानुसार लक्ष्मण यथोचित गुरुजन लोकनि केँ प्रणाम कयलनि । सासु सब पुतोहु केँ कोरा मे बैसाकय कहलिह – “जिबैत-जी फेरो मुँह देखि पेलहुँ !” लाज सँ कैकेयि एकदम सहमल अबस्था मे छलिह जे विधाता एकर कलंक हमरहि माथ पर लगेलनि । नगरक जे-जे लोक सब आयल रहथि, ओ सब अपन-अपन प्रतिष्ठाक मुताबिक बैसि गेलाह । फेर राम पुछलनि – “कहल जाउ गुरुजी, पिताजी कुशल सँ त छथि ? हमरा लोकनि पर हुनकर स्नेह पहिनहिं जेकाँ बनल त छन्हि ?” रामक बात सुनिकय वसिष्ठ बजलाह – “कालक गति बहुत बलवान होइत अछि । जे बात कहब जरूरी अछि ताहि बारे मे चुप कोना रहल जा सकैत अछि । राजा दशरथ स्वर्ग सिधारि गेलाह । ‘हा राम, हा राम ! हा सुमित्रानन्दन लक्ष्मण ! हा पुत्री वैदेही ! ई सब कतय चलि गेलाह !’ एहि तरहें विलाप करिते राजा दशरथक प्राण चलि गेलनि ।” रामक कान मे ई बात बरछी जेकाँ पड़लनि । ‘मरि गेलहुँ – मरि गेलहुँ’ बजैत करुणा-मग्न राम आ लक्ष्मण खसि पड़लाह आ बजलाह – ‘आब हम सब अनाथ भ’ गेलहुँ ! के दुलार करत ? मोनक सबटा सोचल सपना उपर पानि पड़ि गेल ।” सती सीताक कानब बन्दे नहि होइत छलन्हि, आ ओ बिलखिते बजलिह – “हे गुणनिधि दयालु राजा, अपने हमरा सभक बिछोह मे प्राण छोड़ि देलहुँ । मुदा हमर हृदय त वज्रक समान कठोर भ’ गेल जे आबो नहि फटैत अछि ।” राम केँ कनैत देखि सब कानय लगलाह, कियैक तँ तीनू लोक मे कियो राम सँ भिन्न नहि अछि । तखन वसिष्ठ कहलनि – “कियो गोटे जुनि कानू । काल-पुरुष (भवितब्यता) अटल और बलवान होइत अछि । कनला सँ राजा घुरिकय त नहि आबि जेता । फेर कहू त, माथे पटकला सँ कि होयत ।” सब गोटे गंगा नदी मे स्नान कयलनि । बेरा-बेरी सब गोटे तिलाँजलि देलनि । राम इंगुदी आ पिण्याक फल सँ ई कहैत पिंडदान कयलनि जे ‘हम जे खाइत छी, वैह पितर सब केँ दय रहल छी । हे पितर लोकनि, हमरा उपर प्रसन्न होउ ।” कुटी जाकय फेरो स्नान कयलनि । एतेक करुण क्रन्दन भेल जे सभक कान बहिर भ’ गेल । ओहि दिन सब कियो उपवास कयलनि । हाथी-घोड़ो तक घास खेनाय छोड़ि देलक । एहि प्रकारे अशौचक क्रम समाप्त भेल । जखन ऐगला दिन आयल तखन सब कियो गंगा नदी मे स्नान कयलनि आ राम सभा लगाकय बैसलाह । ओतय ठाढ़ भ’ हाथ जोड़िकय भरत बजलाह – “हे राजा राम, हम किछु कहय चाहैत छी । सब गोटेक अनुमति अछि आर न्यायतः उचित सेहो छैक जे एतय अपनेक अभिषेक कयल जाय । बहुते रास मुनि सब छथि । अपन कुलगुरु वसिष्ठजी सेहो संगहि छथि । नगरवासी लोक सब सेहो उल्लास मे छथि । क्षत्रिय केर धर्म मे सदा सँ यैह न्याय चलैत आयल अछि जे जेठ भाइ ओहिना छथि जेना पिता छथि । हे देव, अपने पिताक राज्यक पालन करू आ एहि तरहें प्रजा मे सुयश पाबू । एखन वनवासक अवसर नहि अछि । यदि वन मे विनोद करबाक इच्छा होयत तँ फेर चलि आयब । विधिपूर्वक बहुते रास यज्ञ आर गोदान करब आ ओकर फलस्वरूप गुणवान् पुत्र उत्पन्न करब । तखन पैघ पुत्र केँ राज्य सौंपिकय फेर वनवासी लोकनिक समाज मे आयब । कैकेयि जे किछु कयलनि ओकरा बिसरि जाउ । हे प्रभु, अपने हमरो पालन करू ॥१-४७॥

।दोहा।

श्रीरघुनन्दन-चरण पर, भरत धयल निज माँथ ॥४८॥
कयल दण्डवत भक्तिसौँ, त्राहि त्राहि रघुनाथ ॥४९॥

भावार्थः

एतेक कहिकय भरत अपन माथ रघुनन्दन रामक पैर पर राखि देलनि आर “त्राहि-त्राहि” कहिकय भक्तिपूर्वक दण्डवत् प्रणाम कयलनि ॥४८-४९॥

।चौपाइ।

स्नेह-सजल-लोचन श्रीराम । शुनु शुनु भरत कहल गुणधाम ॥५०॥
त्वरित उठाय लगाओल अङ्क । भक्ति-भाव अहँकाँ निश्शङ्क ॥५१॥
भरत अहाँक वचन निर्व्याज । वनि बनलहुँ पितृ-वचनक काज ॥५२॥
माय बाप आज्ञा अनुसार । पिता-वचन-प्रतिपाल विचार ॥५३॥
चौदह वर्ष वनहि मे रहब । भ्रमहुँ भरत मिथ्या नहि कहब ॥५४॥
अहँकाँ राज्य देलेँ छथि बाप । थोड़बहि दिनमे की सन्ताप ॥५५॥
दण्डक-वन हमरा देल राज । जनितहि छथि गुरु सकल समाज ॥५६॥
पिता-वचन हम माँथा धयल । अहँ की भरत अनादर कयल ॥५७॥
मान न पिता वचन अज्ञान । से जिबितहि छथि मृतक समान ॥५८॥
तनिका अन्त नरकमे वास । बापक जनिकाँ नहि मन त्रास ॥५९॥
भेंट भेल से भल भेल काज । अहँ छी विदित बनल महराज ॥६०॥
करु गय राज्य वृथा निर्व्वेद । अहँइक चिन्ता सभकाँ खेद ॥६१॥

भावार्थः

भरतजीक सब बात सुनिकय स्नेहवश रामक आँखि मे नोर आबि गेलनि आ भरत केँ तुरत उठाकय गला सँ लगा लेलनि आ कहलखिन – “हे भरत, सुनू ! एहि मे कोनो सन्देह नहि जे अहाँक हमरा पर भक्तिभाव अछि । हे भरत, अहाँ जे कहलहुँ अछि ओ शुद्ध भाव सँ कहलहुँ अछि । हम त पिताक वचनक पालन करबाक लेल टा वनवासी भेलहुँ अछि । माता आ पिताक आज्ञा सदिखन मनबाक चाही । अतः हम पिताक वचनक पालनक लेल चौदह साल वनहि मे रहब । हे भरत, बिसरियोकय हम गलत नहि कहब । पिता अहाँ केँ राज्य देलनि अछि । कनिके दिनक त बात अछि । एहि मे दुःखक कोन बात छैक ? हमरा दण्डक वन केर राज देलनि अछि । ई बात गुरुजी जनैत छथि । आर सारा समाजो जनैत अछि । पिताक वचन केँ हम माथ पर रखलहुँ । कि भरत, अहाँ कहियो हुनकर वचन केर अनादर कयलहुँ ? जे मूढ़ लोक पिताक आज्ञाक पालन नहि करैत अछि ओ जिन्दा रहितो मुर्दाक समान अछि । जेकर मोन मे पिताक भय नहि हो ओकरा अन्त मे नरक जाय पड़ैत छैक । भेंट भेल से त नीक भेल । सब जनैत अछि जे अहाँ महाराज बनायल गेल छी । अहाँ राज्य करू । नाहक दुःख जुनि करू । यदि चिन्ता करब त ओहि सँ सब केँ दुःख हेतैक ।” ॥५०-६१॥

।दोहा।

भरत कहल स्त्री-जित पिता, कामुक बुद्धि-विहीन ॥६२॥
मृत्यु-निकट उन्मत्त-मति, मन नहि अपन अधीन ॥६३॥

भावार्थः

भरत कहलनि – “पिताजी स्त्रीक वश मे भ’ गेल रहथि, काम केर वश मे भ’ गेल रहथि, हुनकर बुद्धि समाप्त भ’ गेल रहनि, मृत्यु हुनका लग आबि गेल छलन्हि आर हुनकर अपनहुँ मोन हुनकर अपन वश मे नहि रहनि ॥६२-६३॥

।चौपाइ।

तेहन न पिता जेहन अहँ कहल । सत्य-सन्ध नृप सभ किछु सहल ॥६४॥
हृदय अधर्मक अतिशय त्रास । बरु मानथि वर नरक-निवास ॥६५॥
कहल देल वर सत्य विचारि । केकयि शकल न नृपव्रत टारि ॥६६॥
सत्य-वचन नृप त्यागल प्राण । रहि गेल धर्म्माधार प्रमाण ॥६७॥
तनिक वचन काँ कय देब त्याग । रामचन्द्र काँ अनुचित लाग ॥६८॥
कि करति केकयि कहत की लोक । कर्म्म शुभाशुभ रह की रोक ॥६९॥
कहलनि भरत देव रघुनाथ । सभ कृति प्रभुवर अपनैँक हाथ ॥७०॥
हमहिँ रहब वन चौदह वर्ष । अपनैँ राज्य करू मन हर्ष ॥७१॥
शुनु शुनु भरत कहल पुन राम । मन बड़ गड़बड़ करु थिर ठाम ॥७२॥

रामजी कहलखिन – “पिताजी ओहेन नहि छलथि जेना अहाँ कहलहुँ अछि । राजा सत्यव्रती रहथि तेँ हुनका सब किछु सहय पड़लन्हि । हुनकर हृदय अधर्म सँ बहुत डराइत छलन्हि । धर्मक रक्षाक खातिर नरक भोगनाय नीक बुझैत रहथि । जे वर स्वीकार कएने रहथि, से सत्यक रक्षाक खातिर दय देलाह । एहेन वर माँगियोकय कैकेयि राजा केँ अपन सत्यनिष्ठता सँ विचलित नहि कय सकलथि । वचनक सच्चाई केँ निम्हेबाक लेल राजा प्राण गमा देलाह । सत्यवादिताक प्रमाण छोड़ि गेलाह । एहेन राजाक वचन केँ तोड़ि देनाय रामचन्द्र केँ उचित नहि प्रतीत होइत छन्हि । माता कैकेयि कि कहती ? लोक कि कहत ? नीक या बेजा कर्म-फल सब केँ के रोकि सकैत अछि ?” ॥६४-६९॥

ई सुनिकय भरतजी कहैत छथि – “हे प्रभु राम, सब किछु अपनहिक हाथ मे अछि । हमहीं चौदह वर्ष वन मे रहब । अपने प्रसन्न मन सँ राज करू ।” फेर राम कहलनि – “हे भरत, अहाँक मन बहुत घबरायल अछि । ओकरा स्थिर करू ।” ॥७०-७२॥

।षट्पद छन्दः।

सजल-नयन कह भरत नाथ हम नहि घुरि जायब ॥७३॥
लक्ष्मण सन वन रहब सङ्ग दुख दिवस गमायब ॥७४॥
नहि रखबे जौँ सङ्ग प्राण हम सत्वर त्यागब ॥७५॥
बड़ गोट अयश कपार राज झंझट नहि लागब ॥७६॥
धयल कुशासन रौदमे पद्मासन पूर्व्वाभिमुख ॥७७॥
हठ भरतक दृढ देखिकेँ इन्द्रादिक मन बहुत दुख ॥७८॥
रामचन्द्र मन बुझल भरत अविचल हठ ठानल ॥७९॥
कहलहु कथा बुझाय वचन एकगोट न मानल ॥८०॥
गुरु वसिष्ठ काँ देल वामनेत्रान्त इसारा ॥८१॥
ई नहि ककरो शक्य देल अपनहि काँ भारा ॥८२॥
कहलनि गुरु एकान्त मे भरत कठिन हठ परिहरिय ॥८३॥
हेतु कहैछी से शुनिय सत्य वचन श्रुति मे धरिय ॥८४॥

भावार्थः

तखन नोर-भरल नयन सँ भरत कहैत छथि – “हे प्रभु, हम नहि घुरब । जेना लक्ष्मण छथि तहिना अहाँक संग हमहुँ रहब आर कष्टक समय बितायब । यदि अहाँ हमरा अपना संगहि वन मे नहि राखब त हम तुरत प्राणत्याग कय देब । एतेक पैघ बदनामी माथ पर लय केँ राज्यक झंझटि मे नहि पड़ब ।” ॥७३-७६॥

एतेक कहिकय भरत रौदे मे कुशक आसन बिछाकय पूब दिश मुँह कय केँ पद्मासन लगा बैसि रहलाह । भरतक एहि जिद्द केँ देखिकय इन्द्र आदि देवता चिन्तित भ’ गेलाह । राम मोन मे सोचलनि जे भक्त तँ अटल हठ ठानि देलनि । बुझेलो-सुझेलो पर एकहु टा बात नहि सुनलनि । तखन बायाँ आँखि सँ गुरु वसिष्ठ केँ इशारा कयलनि जे हिनका आर कियो बुझा सकैत छथि, आब बुझेबाक-सुझेबाक भार अपनहिं पर अछि । गुरु वसिष्ठ फेर एकान्त मे भरत केँ बुझौलनि – ‘हे भरत, ई अटल हठ (जिद्द) केँ छोड़ू । हम जे तर्क कहैत छी, से सुनू । जे वास्तविक तथ्य अछि ताहि दिश ध्यान दियौक ॥७७-८४॥

।चौपाइ।

अज अव्यय नारायण जैह । रामचन्द्र काँ जानब सैह ॥८५॥
ब्रह्मा बहुत प्रार्थना कयल । दशरथ-भवन पुत्र बनि अयल ॥८६॥
रावण-वध कारण अवतार । पृथिविक हरण काज सभ भार ॥८७॥
प्रभुवर माया सीता-रूप । लक्ष्मण थिकथि अनन्त अनूप ॥८८॥
केकयि-कृत सौँ मन जे खेद । कहइतछी तकरो हम भेद ॥८९॥
रामचन्द्र जौँ करता राज । बुझल देवता हयत न काज ॥९०॥
विघ्न शारदा कयलनि जाय । केकयि रानिक कण्ठ समाय ॥९१॥
निर्दय-हृदय कहल निश्शङ्क । केकयि काँ छल लिखल कलङ्क ॥९२॥
ई तीनू जन दण्डक जयत । धर्म्म-विमुख दशमुख तत अयत ॥९३॥
निज अपराध पाबि सँहार । हयता रावण अवनिक भार ॥९४॥
सकुल सबल रावण केँ जीति । घुरि अओता करताह सुनीति ॥९५॥
आग्रह त्यागि भरत घुरि जाउ । अन्नपानि सुखसौँ अहँ खाउ ॥९६॥
एतय वृथा सभ जन मन दैन्य । जाउ अयोध्या लयकेँ सैन्य ॥९७॥

भावार्थः

अजन्मा, अविनाशी नारायणहि केँ रामचन्द्र बुझू । ब्रह्माजी बहुते प्रार्थना कयलनि । तखन नारायण दशरथक घर मे हुनक पुत्र बनिकय अयलाह । ईश्वरक माया मात्र सीताक रूप मे अवतीर्ण भेलिह । लक्ष्मण शेषनागक अनुपम अवतार थिकथि । कैकेयि केर करनी सँ जे अहाँक मोन मे आयल अछि, तेकरो रहस्य बतबैत छी । देवता लोकनि सोचलनि, यदि राम राज्य करता त काज नहि बनत । ताहि सँ देवी सरस्वती रानीक कंठ मे प्रविष्ट भ’ राज्याभिषेक मे विघ्न देलिह । कैकेयि केर माथ पर कलंक लिखल रहनि, ताहि लेल सरस्वती निष्ठुर आ निःशंक भ’ कय कहलिह । ई तीनू गोटे दंडक वन जेताह । ओतय अधर्माचारी रावण आओत । अपन कुकर्म सँ रावण धरतीक बोझ बनि जायत आ तदनुसार संहार पायत । रावणक कुल-परिवार आ सेना-समेत जीतिकय राम लौटि अओताह आ तखन न्यायपूर्वक राज्य करताह । हे भरत, अहाँ हठ छोड़िकय घुरि चलू । सुखपूर्वक खाउ-पिबू । एतय बिना कोनो कारणे सभक मोन मे विषाद अछि । सेना लय केँ अयोध्या जाउ ।” ॥८५-९७॥

।दोहा।

गुरुक वचन शुनलनि भरत, अति विस्मित मन भेल ॥९८॥
सजल-नयन आनन्द-घन, राम निकट पुनि गेल ॥९९॥

भावार्थः

गुरु वसिष्ठक बात सुनिकय भरत केँ बड़ा विस्मय भेलनि । आँखि मे नोर भरि गेलनि आ गहींर आनन्द मे लीन भ’ राम लग गेलथि ॥९८-९९॥

।चौपाइ।

चरणक खरओँ देव देल जाय । सेवा करब धरब मन लाय ॥१००॥
दुहुटा खरओँ राम दय देल । भरत भक्ति माँया धय लेल ॥१०१॥
जगमग जोति विभूषित-रत्न । देव-समान धयल बड़ यत्न ॥१०२॥
करथि प्रदक्षिण करथि प्रणाम । कहथि अवधि दिन आयब गाम ॥१०३॥
आयब अवधिक दिवस गमाय । भस्म होयब हम अनल समाय ॥१०४॥
नीक नीक कहलनि श्रीराम । डङ्का पड़ल चलल जन धाम ॥१०५॥
कनइत केकयि प्रभुसौँ कहल । किछु कर्त्तव्य शिष्ट की रहल ॥१०६॥
रामचन्द्र बेटा मन आश । हमरे भेल विश्व उपहास ॥१०७॥
अहँक भरोश बहुत मन धयल । सभ जन-रव हम कहबे कयल ॥१०८॥
केहन पिशाची देल लगाय । हमहूँ थिकहुँ मान्य सतमाय ॥१०९॥
अपनहि कयल सकल रघुनाथ । तदपि कहिय हम जोड़िय हाथ ॥११०॥
करब क्षमा प्रभु सब अपराध । लोक-विदित सुख कयलहुँ वाध ॥१११॥
अहँ परमेश्वर विश्व-स्वतन्त्र । हम की मानी वानी मन्त्र ॥११२॥

भावार्थः

राम सँ कहलनि – “हे प्रभु, अपन पैरक खड़ाउं हमरा देल जाउ । हम ओकरहि सेवा करब आ ओकरा यत्नपूर्वक राखब ।” राम दुनू खड़ाउं आनिकय दय देलनि आ भरत भक्तिपूर्वक ओकरा माथ पर राखि लेलनि । ताहि (खड़ाउं) सँ चमकैत ज्योति निकलि रहल छल, कियैक तँ ओहि मे रत्नजटित छल । एहेन खड़ाउं केँ भरत देवताक मूर्ति समान बड़ा यत्न सँ रखलन्हि । ओकर प्रदक्षिणा करैत, प्रणाम करैत कहैत छथि – “कि अवधि पूरा भेलापर राम घुरि अओताह ? यदि ओ अवधिक दिन केँ बिताकय नहि अओता तँ हम विरह केर अग्नि मे जरिकय भस्म भ’ गेल रहब ।” ॥१००-१०४॥

राम हुनका नीक-नीक उपदेश देलनि । नगाड़ा बाजि उठल । सब लोक अपन नगर अयोध्या दिश विदाह भेलाह । लौटैत समय कैकेयि राम सँ कहलनि – “हमर कर्तव्य मे कि किछु बाकी रहि गेल अछि ? मोन मे आशा लागल छल जे रामचन्द्र हमर पुत्र छथि (मुदा हम विफल भेलहुँ) । सम्पूर्ण दुनिया मे हमर बदनामी भेल । मोन मे अहाँक भरोसा छल । प्रजा-जन जे बजैत छथि ओ त हम सबटा सुनइये देलहुँ । अहाँ हमरा कोना पिशाचिन लगा देलहुँ । हम सेहो अहाँक आदरणीया सतमाय छी । हे राम ! लीला तँ अहीँक कयल अछि । तैयो हम हाथ जोड़िकय कहैत छी । हे प्रभु, अहाँ हमर सब अपराध क्षमा कय देल जाउ । सब जनैत अछि जे हम अहाँक सुख मे बाधा देलहुँ अछि । अहाँ परम ईश्वर छी, संसार मे जे चाही सब कय सकैत छी । हम केना ई मानि ली जे शारदा हमरा एहेन मंत्र देने छलिह ।” ॥१०५-११२॥

।दोहा।

हँसि कहलनि रघुनाथ, देवि सत्य अपनैँ कहल ॥११३॥
वर-नृप-आज्ञा लाथ, देव-कार्य्य कर्त्तव्य छल ॥११४॥

भावार्थः

राम हँसिकय कहलनि – “हे माता ! अपने ठीके कहैत छी । वरदान आ राजाक आज्ञा त निमित्त (बहाना) मात्र अछि । असल मे देवता लोकनिक काज करब छल ॥११३-११४॥

।सोरठा।

त्यागु देवि सन्ताप, होएब कर्म्म सौँ लिप्त नहि ॥११५॥
विगत त्रिविध तन-ताप, रहब हर्षिता निज भवन ॥११६॥
से शयबार प्रणाम, कयल धयल प्रभु-ध्यान मन ॥११७॥
धन्य धन्य श्रीराम, कहि चलली केकयि पुरी ॥११८॥

भावार्थः

हे महारानी, अहाँ पछतावा जुनि करू । एहि कर्म मे अहाँ लिप्त नहि होयब । तीनू प्रकारक दुःख सँ रहित भ’ अहाँ सुखपूर्वक अपन रनिवास मे रही ।” कैकेयि सौ बेर राम केँ प्रणाम कय केँ, हुनकर ध्यान हृदय मे धारण कय केँ, आर ‘राम धन्य छी, धन्य छी’ कहिकय अपन नगर अयोध्या केँ चललिह ॥११५-११८॥

।चौपाइ।
यथायोग्य मिलि मिलि सभ लोक । गेल अयोध्या परिहरि शोक ॥११९॥
भरत मिलन सौँ मन सन्तोष । मन मन केकयि पर बड़ रोष ॥१२०॥
गुरु मन्त्री परिजन गण आन । भरतक सङ्गहि कयल प्रयाण ॥१२१॥
जय सीतापति जय रघुनाथ । कनइत कनइत कर गुण-गाथ ॥१२२॥
मिथिलेशक कन्या बुधिआरि । छल भल सङ्ग भाग्य दिन चारि ॥१२३॥
सकल पूर्व्ववत ठामहि ठाम । विरत भरत गेल नन्दिग्राम ॥१२४॥
राखल खरओँ सिंहासन थापि । पूजा-विधि नहि छूट कदापि ॥१२५॥
नित पूजन षोड़श उपचार । राज-भोग बन बहुत प्रकार ॥१२६॥
राज-काज जत जे जे आब । राम-समर्प्पण सिद्ध स्वभाव ॥१२७॥
अवधिक दिन गणयित दिन जाय । मुनि-व्रत कन्द-मूल-फल खाय ॥१२८॥
भूमि शयन सानुज नित करथि । अनुज राम-चरण मन धरथि ॥१२९॥
राज-काज किछु रहय न बन्न । व्रती भरत सभ कर सम्पन्न ॥१३०॥
चित्रकूट गिरि पर श्रीराम । बुझलक लोक घराघरि गाम ॥१३१॥
एक घुरि आबथि एक पुन जाथि । रामचन्द्र मन मन अगुताथि ॥१३२॥
ग्राम-जनक आगमने तोड़ि । दण्डक-वन गेला गिरि छोड़ि ॥१३३॥
जाय अत्रि काँ कयल प्रणाम । हम छी धन्य कहल श्रीराम ॥१३४॥
वनवासक छल अयलहुँ एतय । दुःखक लेश देश नहि जतय ॥१३५॥
रामक वचन मधुरतर शूनि । विधिवत पूजा कयलनि मूनि ॥१३६॥
बैसला राम मुनिक व्यवहार । भल फल वन्य आनि सत्कार ॥१३७॥
सीता लक्ष्मण बैसल जानि । मुनि कहलनि परमात्मा मानि ॥१३८॥
भावार्थः
फेर सब गोटे औचित्यानुसार विदाइ केर समय मिलि-जुलिकय आ दुःख सब बिसराकय अयोध्या लेल विदाह भेलाह । भरत केर भेंट सँ सभक मोन मे सन्तोष भेलनि । मुदा भीतरे-भीतर कैकेयि प्रति बहुते रोष छलन्हि । गुरु वसिष्ठ, मंत्री आ अन्यान्य परिजन भरत संग विदाह भेलाह । ‘सीतापति की जय’, ‘रामचन्द्र की जय’ बजैत, कानि-कानिकय सब गोटे रामक गुण गाबय लगलाह । ‘बड भाग्य सँ मिथिलाक राजा जनकक बुद्धिमती कन्या सीताक चारि दिनक संग रहल ।” सब गोटे जहिना के तहिना पड़ल रहलाह, मुदा भरत सब सँ विरक्त भ’ नन्दिग्राम चलि गेलाह । ओतय सिंहासन स्थापित कय ताहि उपर खड़ाउं केँ बैसा देलनि । ओहि खड़ाउं केर नियमित रूप सँ पूजा करय लगलाह । नित्य सोलहो उपचार द्वारा ओकर पूजा करैत छलाह । तरह-तरह के राजभोग बनायल जाइत छल आ पूजा मे चढ़ायल जाइत छल । राज-काजक सिलसिला मे जेतय कतहु जेहो किछु अबैत छल से राम केँ समर्पित कय दैत छलथि, स्वयं सिद्धयोगी समान रहैत छलथि । अवधिक दिन गनैते-गनैते समय बितबथि । कन्द-मूल-फल मात्र खाइथ आ मुनि लोकनिक समान व्रत मे लीन रहैत छलथि । छोट भाइ शत्रुघ्न-सहित सदिखन जमीनहि पर सुतथि । प्रेमपूर्वक  रामक चरण केर सदा ध्यान करैत रहथि । कोनो राजकाज बन्द नहि रहैत छल । व्रतनिष्ठ भरत सब काज सम्पन्न करथि ॥११९-१३०॥
रामक चित्रकूट सँ दंडक वन गेनाय आ अत्रि संग भेंट 
लोक सब केँ घरे-घर पता चलि गेलैक जे राम चित्रकूट पर्वत पर रहैत छथि । एकटा घुरिकय जाय कि दोसर आबि जाय । राम मने-मन आजिज होइत गेलथि । एहि तरहें गामक लोक सभक पाँति लागल रहैत छल, तखन राम ओहि पर्वत केँ छोड़िकय दण्डकवन चलि गेलाह । एतय जा कय राम अत्रि मुनि केँ प्रणाम कयलनि आ कहलनि – “अपनेक दर्शन पाबि हम धन्य भेलहुँ । वनवासक बहाने हम एतय आयल छी, जाहि स्थान पर दुःखक नामो मात्र नहि अछि ।” मुनि अत्रि रामक परम मधुर वचन सुनिकय हुनकर विधिवत् पूजा कयलनि । राम हुनकर आश्रम मे बैसलाह आ अत्रिजी मुनि सभक परिपाटी मुताबिक वनक सुन्दर-सुन्दर फल आनिकय हुनक आतिथ्य कयलनि । सीता आ लक्ष्मण केँ बैसल देखि मुनि अत्रि हुनका ईश्वर बुझैत कहलनि – ॥१३१-१३८॥
।अनुष्टुप् छन्दः।
अनसूया महावृद्धा गृहमध्य तपस्विनी ॥१३९॥
छथि राम ततै जाथु मैथिली श्रीयशस्विनी ॥१४०॥
गेली सीता ततै साध्वी राम आज्ञानुसार सौँ ॥१४१॥
प्रणाम तनिकाँ कैल मैथिली सद्विचार सौँ ॥१४२॥
भावार्थः
“हे राम, घर मे परम वृद्धा तपस्विनी अनसूया छथि, यशस्विनी सीता ओतय जाइथ ।” रामक आज्ञा पाबि सीता ओतय गेलिह आ जाय केँ सत्य भाव सँ हुनका प्रणाम कयलिह ॥१३९-१४२॥
।दोबय छन्दः।
कहलनि अनसूया हम वृद्धा पति सँग करी तपस्या ॥१४३॥
अहँ जानकि सभलोकक जननी शिव-विधि-प्रभृति-नमस्या ॥१४४॥
ई कहि अङ्क लगाओल तनिकाँ छवि देखल भरि आँखी ॥१४५॥
हर्षहि हृदय भरल अछि होइछ दुहू आँखि मे राखी ॥१४६॥
भावार्थः
अनसूया कहलिह – “हम बूढ़ भ’ गेल छी आ पतिक संग एतहि तपस्या करैत छी । हे जानकी, अहाँ सभक माता छी । ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सब देवता अहाँ केँ प्रणाम करैत छथि ।” एतेक कहिकय अनसूया सीता केँ गला सँ लगा लेलिह आ खुब अक्छाकय (इच्छा भरि) हुनकर शोभा देखलिह आ कहलिह – “हर्ष सँ हृदय भरि गेल अछि आ मन करैत अछि जे अहाँ केँ दुनू आँखि मे राखि ली ।” ॥१४३-१४६॥
।तोटक छन्दः।
तन हो न मलान कदापि कहूँ ॥१४७॥
अँगराग लगाओल अत्रि-बहू ॥१४८॥
पहिरावल से पट जे नितहू ॥१४९॥
नव भव्यद फाट न जे कतहू ॥१५०॥
भावार्थः
फेर अत्रि मुनिक पत्नी अनसूया सीताक शरीर मे एक एहेन अंगराग (उबटन) लगा देलनि जाहि सँ हुनकर शरीर कखनहुँ म्लान नहि होयत । आर एकटा एहेन वस्त्र पहिरा देलनि जे सदिखन सुन्दर आ नव रहयवला छल, जे कहियो नहि फाटत ॥१४७-१५०॥
।प्रझटिति छन्दः।
घर जाथु कुशलसौँ अहँक संग, वनमे आयल छथि अछि प्रसङ्ग ॥१५१॥
मुनि वन्य कन्द फल आनि देल, सानुज सीतापति तृप्त भेल ॥१५२॥
मुनि कहल भुवन अपनैँ बनाय, प्रतिपाल करै छी विभु कहाय ॥१५३॥
गुण-कृत न दोष अहँमे समाय, विभुसौँ माया मोहिनि डराय ॥१५४॥
भावार्थः
फेर कहलिह – “सीता, जे संयोगवश अहाँक संग वन मे आयल छथि, कुशलपूर्वक घर वापस होइथ, ई हमर आशीर्वाद अछि ।” मुनि अत्रि जंगल केर कन्द-मूल-फल आनि देलनि, जे पाबिकय लक्ष्मण सहित सीतापति राम तृप्त भेलाह । तखन मुनि स्तुति कयलनि – “अपने तीनू भुवन केर सृजन आ पालन करैत छी । अपने विभु (व्यापक ईश्वर) कहाइत छी । सत्त्व, रजस् आ तमस् ई तीन गुण सँ उत्पन्न होयवला विकार अपने मे नहि होइत अछि । अपनेक विभु रूप सँ मोहिनि माया सेहो डराइत अछि ॥१५१-१५४॥
।कवि-प्रार्थना।
।उक्तछन्द।
जयजय रघुनन्दन देवदेव, हृत-धरणि-भार कृत-विपिन-सेव ॥१५५॥
जय दलित-भवानीनाथ-चाप, दूरी-कृत-मिथिला-मनस्ताप ॥१५६॥
जयजय पुरुषोत्तम गुणातीत, श्रित-भूमि-तनय मुनि-गण-विनीत ॥१५७॥
जय दाशरथे नानावतीर, मां पालय पालय दयागार ॥१५८॥
भावार्थः
हे रघुनन्दन, देवतहु लोकनिक देवता, अपनेक जय हो, जय हो । अपने धरतीक भार दूर करबाक लेल वनवास लेलहुँ । अपने शिवजीक धनुष केँ तोड़लहुँ, जय हो । अपने पुरुषोत्तम थिकहुँ । अपने तीनू गुण सँ परे थिकहुँ । अपने धरतीक बेटी सीता केँ अपनेलहुँ । अपने मुनि लोकनिक प्रति नम्र थिकहुँ । हे दशरथ केर पुत्र राम, अपनेक जय हो । अपने भाँति-भाँति केर अवतार लैत छी । हे दयामय, अपने हमर पालन कयल जाउ ।”
॥इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा-रामायणे अयोध्याकाण्डे नवमोऽध्यायः॥
॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायणक अयोध्याकाण्ड मे नवम् अध्याय समाप्त भेल॥
॥इति अयोध्याकाण्ड॥
॥अयोध्याकाण्ड समाप्त भेल॥

हरिः हरः!!

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