Search

गोपाल मोहन मिश्र केर दू टा कविता :: “गति-मति” आ “फर्क”

374 भ्यूज

गोपाल मोहन मिश्र केर दू टा कविता :: “गति-मति” आ “फर्क”

गति-मति


एतेक वयस बीतला
के बाद मति प्राप्त भेल हमरा,
कियेक बन्हैत छी
अहाँ अपना के….
निरर्थक अप्पन(?) लोक सभ सँ ।
जीवन में बेसी अप्पन होअय
ई आवश्यक नहि,
कम्मे सही, मुदा सार्थक अप्पन होअय
जे अहाँके हर अवसर पर सहयोगी रहय ।
बंधन केर तीन कारण होइत छैक
भाव, स्वभाव आ अभाव,
आ दू विकल्प होइत छैक ,
मन आ नश्वर काया।
मनक गति तs अद्भुत छै.…
जखन अप्पन नहि बन्हि सकल ,
तs पराया  पर जोर केहन ?
बंधन – बन्हनाई छोड़ू—दृष्टा बनू ….
की कहलौं ?
बान्हब नश्वर काया के….
अरे ओकर गति तs
मन सँ बेसी द्रुत छैक,
कुर्बान भ जायब
आ पता तक नहि चलत।

फर्क

आदर्श भेनाई बहुत ठीक छै,
बस शर्त ईश्वर रहय,
प्रस्तुत कैल जा रहल आदर्श
शीशो वा देवदार के जेकाँ होअय,
भीतर आ बाहर सँ एक जेकाँ,
ठोस रुप लेने,
जे आदर्श बाँस के जेकाँ
खोखला आ लचर होअय,
ओकर नियति में
ठठरी के जेकाँ बन्हनाई लिखल छै ।

पुरुषोत्तम होबs में किछु ख़राबी नहि
मर्यादाक ख्याल रखबा में किछु ग़लत नहि,
ख़राबी छै, ग़लत छै,
बस ई फर्क पता रहय,
कोन जगह पर गाल बढ़ाबs के छै
कोन जगह पर हाथ उठाबs के छै
क्रोध सेहो जीवनक सृष्टा भs सकैत छै
आ शाँत मन सेहो
एक कदम के दूरी पर कायर ।

Related Articles