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श्रीमद्भागवद्गीता एगारहम अध्याय

23 भ्यूज

ॐ श्री परमात्मने नमः !!

॥एकादशोऽध्यायः॥

अर्जुन उवाच ।

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ॥
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥११-१॥

अर्जुन कहलनि:

हे भगवन ! अपने हमरा उपर दया कयकेँ आत्मज्ञान केर बारे जे अत्यन्त गूढ़ (गहींर) शब्द कहलहुँ अछि, ताहि सँ हमर भ्रम दूर भ’ गेल अछि । 

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ॥
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥११-२॥

हे कमलनेत्र, हम अपनेक बारे मे, प्राणी (सृष्टि) केर उत्पत्ति आ विनाश केर बारे मे, आर अपनेक अक्षय महानता केर बारे मे सेहो विस्तार सँ सुनलहुँ अछि ।

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ॥
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥११-३॥

हे परम प्रभु! जेना अपने स्वयं कहलहुँ अछि, से सब किछु तहिना अछि । (तथापि) हे परमपुरुष, हम अपनेक ईश्वर-रूप केँ देखय चाहैत छी । 

ईश्वर-रूप: जाहि मे सबसँ अधिक ऊर्जा (ताकत), सबसँ अधिक उपस्थिति, अनन्त ज्ञान, शक्ति, गुण एवं शान अछि ।

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ॥
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥११-४॥

हे प्रभु, अगर अपने हमरा से देखबाक योग्य बुझैत छी, तँ हे योगी सभक स्वामी (योगेश्वर), हमरा अपन अटल रूप देखायल जाउ । 

हमर नोट: हम  सबअक्सर महानता सभक सम्बन्ध मे सुनैत छी, ई स्वाभाविक अछि, हम सब महान दृश्य देखहो चाहब । हमरा लगैत अछि जे अर्जुन केर यैह जिज्ञासा छन्हि । आउ प्रतीक्षा करी आ देखी जे श्री कृष्ण विराट स्वरूप केँ केना देखबैत छथि । (अर्थात् जे प्रश्न अर्जुनक मन-मस्तिष्क मे भगवानक दिव्य स्वरूप सभक सम्बन्ध जे पैछला अध्याय मे वर्णन कयल गेल अछि से सुनलाक बाद ओहेन विश्वरूप केर दर्शनक अभिलाषा जागब ओहिना अछि जेना हमहूँ-अहाँ सब भगवानक दर्शन लेल इच्छुक रहैत छी, हुनकर महान गुण आ रूप केर चर्चा सब सुनि-सुनिकय हुनका देखबाक उत्कंठा सेहो रहल करैत अछि । एहि अध्यायक आगामी श्लोक मे भगवान अपन विश्वरूप – विराट ब्रह्माण्डीय स्वरूप प्रस्तुत करथिन । त हम सब ध्यानपूर्वक एक-एक बात पर गौर करैत रहब । ध्यान भंग नहि हेबाक चाही । बस, प्रतीक्षा करैत रहब – बात सब बुझैत चलब । 

श्री भगवानुवाच ।

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ॥
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥११-५॥

भगवान कहलनि:

हे पृथापुत्र, सैकड़ों आर हजारों केर संख्या मे, हमर अलग-अलग दिव्य रूप, अलग-अलग रंग आर आकार केँ देखू ।

पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ॥
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥११-६॥

आदित्य लोकनि, वसु लोकनि, रुद्र लोकनि, जोड़ा (दुनू) अश्विन लोकनि आर मरुत लोकनि केँ देखू; हे भरत केर वंशज, पहिने कहियो नहि देखल गेल कतेको आश्चर्यजनक चीज (अस्तित्व) सब केँ देखू ।

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ॥
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥११-७॥

आब देखू, हे गुडाकेश, हमर एहि शरीर मे, पूरा ब्रह्माण्ड एक्कहि मे केन्द्रित (अबस्थित) अछि – जाहि मे चल (चलैत-फिरैत) आर अचल (स्थिर अवस्था मे) रहल सम्पूर्ण चीज शामिल अछि – आर बाकी सब किछु जे अहाँ देखय चाहैत छी ।

एक्कहि मे केन्द्रित (अबस्थित): हमर शरीरक हिस्साक रूप मे ।

बाकी सब किछु: जेना, ओहि युद्ध मे अहाँ केँ सफलता अथवा हारि जाहि केर सम्बन्ध मे अहाँक मन मे सन्देह अछि । (२-६) । (सेहो सब किछु एहि विराट रूप मे देख लियह – से भाव छन्हि ई कहयकाल – अहाँ जे देखय चाहैत छी सब किछु देखू ।)

न तु मां शक्यसे द्रुष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ॥
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥११-८॥

मुदा अहाँ हमरा अपन एहि आँखि सँ नहि देखि सकैत छी; हम अहाँ केँ इन्द्रियातीत दृष्टि (दिव्य दृष्टि) दैत छी; हमर सर्वोच्च योग शक्ति केँ देखू । 

हमरा: हमर ब्रह्माण्डीय रूप मे ।

इंद्रियातीत दृष्टिः हमरा सभक इंद्रिय प्रदत्त आँखिक दृष्टि सँ उपर धरि देखयवला दृष्टि । 

सञ्जय उवाच ।

एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ॥
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥११-९॥

संजय कहलनि:

हे राजन, एना कहिकय योग केर महान भगवान (योगेश्वर) हरि पृथाक पुत्र (अर्जुन) केँ अपन सर्वोच्च ईश्वर रूप देखौलनि:

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ॥
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥११-१०॥

अनेकों मुख आ नेत्र सँ युक्त, अनेकों अद्भुत दृश्य सँ युक्त, अनेकों दिव्य आभूषण सँ युक्त, अनेकों दिव्य आयुध केँ उठौने;

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ॥
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥११-११॥

दिव्य माला आ वस्त्र सब पहिरने, दिव्य-सुगंधित उबटन सँ अभिषेक कएने, सर्व-अद्भुत तेजस्वी (सर्वथा आश्चर्यजनक तेजस्विता-ओज सँ भरल), असीम (अनन्त) तथा सर्व-रूप (समस्त रूप) वला छथि ।

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ॥
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥११-१२॥

यदि आसमान मे एक्कहि संग हजार टा सूर्य उगय, ताहि सँ जे सौर्य देखायत (प्रकाश आ ताप चमकत-पसरत), वैह ओहि सर्वशक्तिमान भगवान् (विराट् रूप श्री कृष्ण) केर चमक (शक्ति) जेकाँ होयत ।

सर्वशक्तिमान भगवान: विराट रूप ।

विराट रूप केर शान-सौकत (शक्ति) सबसँ बढ़िकय अछि; ई सच मे तुलना सँ परे (दूर) अछि । (यानि अतुलनीय अछि ।)

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ॥
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥११-१३॥

ओतय देवहु केर देवक शरीर मे, पांडुक पुत्र (अर्जुन) पूरे ब्रह्मांड केँ ओकर कतेको हिस्सा (भाग) आदिक संग ओहि एक (विराट रूप भगवान) मे अबस्थित (केन्द्रित) देखलनि ।

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ॥
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥११-१४॥

धनंजय विस्मय (आश्चर्य) सँ भरि गेलाह, हुनकर देहक रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेलनि, ओ देवताक पूजा लेल अपन सिर झुकौलनि आ हाथ जोड़िकय बजलाह ।

देवता: भगवान, अपन ब्रह्माण्डीय रूप मे ।

अर्जुन उवाच ।

पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ॥
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरागश्च दिव्यान् ॥११-१५॥

अर्जुन कहलनि:

हे देव, हम अपनेक शरीर मे समस्त देवता लोकनि आ सब तरहक प्राणी सब केँ देखैत छी; ब्रह्माजी, भगवान, कमल पर बैसल छथि, आर सब ऋषि एवं दिव्य नाग सब सेहो अछि ।

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ॥
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥११-१६॥

हम अपने केँ हर तरफ असीमिति (सीमाहीन) रूप मे देखैत छी, अपनेक कतेको रास हाथ, पेट, मुंह आर आँखि सब अछि; हे ब्रह्माण्ड केर स्वामी, हे ब्रह्माण्डीय (सार्वभौमिक) रूप, हम अपनेक नहि त अन्त देखैत छी, न मध्य, आ नहिये आरम्भ देखैत छी ।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ॥
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥११-१७॥

हम अपने केँ मुकुट, गदा आर चक्र केर संग देखैत छी; हरेक जगह चमकैत किरणवला चमक केर भंडार, जेकरा देखनाय अत्यन्त कठिन अछि, चारू दिश जरैत आगि जे सूरज जेकाँ धधैक रहल अछि, आर जेकरा नापल नहि जा सकैत अछि । 

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ॥
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥११-१८॥

अपने अविनाशी छी, सर्वोच्च छी, जनबाक लायक एकमात्र चीज छी । अपने एहि ब्रह्माण्ड केर महान आश्रय (शरण दयवला) छी; अपने शाश्वत (सनातन) धर्म केर अमर रक्षक (अभिभावक) छी, अपने प्राचीन पुरुष (आदिपुरुष) छी, हम एना मानैत (बुझैत) छी ।

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ॥
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥११-१९॥

हम अपने केँ बिना आरम्भ, मध्य या अन्त केँ, अनन्त शक्तिवाला, कतेको भुजावाला देखैत छी; सूर्य आ चन्द्रमा अपनेक आँखि थिक, जरैत आगि अपनेक मुंह थिक; अपनेक चमक सँ ओतप्रोत किरण सँ पूरा ब्रह्माण्ड तप्त (तपित, गरम) भ’ रहल अछि । 

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ॥
दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥११-२०॥

स्वर्ग आर पृथ्वीक बीच केर एहि स्थान तथा चारू दिशा सब केवल अपनहिं टा सँ भरल अछि; अपनेक एहि अद्भुत (आश्चर्यजनक) एवं भयानक रूप केँ देखिकय तीनू लोक भय सँ काँपि रहल अछि, हे महात्मा !

अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ॥
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥११-२१॥

सचमुच, ई देवता लोकनिक टोली अपनहि टा मे अबैत छथि; किछु लोक डरक मारे हाथ जोड़िकय अपनेक स्तुति करैत छथि; “सब ठीक हो!” एना कहिकय, बड़का-बड़का ऋषि लोकनि आ सिद्ध सभक टोली (समूह) शानदार भजन सब सँ अपनेक स्तुति करैत छथि ।

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ॥
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते विस्मिताश्चैव सर्वे ॥११-२२॥

रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्व-देव, दुनू अश्विनकुमार, मरुत, उष्माप, आर गंधर्वक समूह, यक्ष, असुर आर सिद्ध लोकनिक समूह – ई सब अपने केँ देखि रहल छथि, आर सब विस्मित (हैरान) छथि ।

उष्मापः पितर । 

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ॥
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥११-२३॥

हे महाबाहु, अपनेक अनगिनत रूप केँ देखिकय – जाहि मे कतेको मुंह आर आंखि अछि, कतेको हाथ, जांघ आर पैर अछि, कतेको पेट अछि, आर कतेको दाँत सब डराओन अछि – सम्पूर्ण संसार डरा गेल अछि, आर हमहूँ डरा गेल छी । 

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ॥
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥११-२४॥

हे विष्णु, अपने केँ आकाश केँ छुबैत, अनेकों रंग मे चमकैत, अत्यन्त विस्तृत खुजल मुंहवाला, बड़का-बड़का उग्र आंखिवाला देखिकय, हम हृदय सँ भयभीत भ’ गेल छी आर हमरा नहि त साहस भेटि रहल अछि आ न शान्ति ।

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ॥
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥११-२५॥

अपनेक डराओन दाँतवला, प्रलय केर आगि जेकाँ जरैत मुंह केँ देखिकय, हमरा चारू दिशा सभक पता नहि चलैत अछि, आ न शान्ति भेटैत अछि; हे देवता लोकनिक स्वामी, हे ब्रह्माण्डक धाम, अपने दया करी । 

प्रलय अग्नि: ओ अग्नि जे ब्रह्माण्ड केर अन्तिम प्रलय केर समय दुनिया केँ भस्म कय दैत अछि ।

हमरा चारू दिशा सभक पता नहि चलैत अछि: हम पूरब केँ पश्चिम सँ, आ न उत्तर केँ दक्षिण सँ अलग कय सकैत छी ।

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ॥
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥११-२६॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ॥
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥११-२७॥

धृतराष्ट्र केर ओ समस्त पुत्र, राजा लोकनिक सेनाक संग, भीष्म, द्रोण आर सूतपुत्र, हमरा सभक योद्धा सेनापति लोकनिक संग, तेजी सँ अपनेक मुंह मे पैसल जाइत छथि, जेकर दाँत अत्यन्त भयानक अछि आर देखय मे काफी भयाओन (डराओन) लगैत अछि । किछु गोटे त अपनेक दाँतक बीच मे फँसल पाओल जाइत छथि, जिनकर सिर (माथ) चूर्ण भ’ गेल छन्हि । 

सूतपुत्र: सारथी (अधिरथ) केर पुत्र कर्ण ।

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ॥
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥११-२८॥

सचमुच, जेना नदी सभक कतेको धारा सब समुद्र दिश बहैत अछि, तेनाही मनुष्य केर दुनियाक ओ वीर सब अपनेक भयंकर जरैत मुँह मे प्रवेश करैत छथि ।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ॥
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥११-२९॥

जेना फतिंगा सब जरैत आगि मे भागैत अछि आ मरि जाइत अछि, तेनाही ई जीव सब सेहो अपनेक मुंह मे भागैत अछि आ मरि जाइत अछि । 

२८ आ २९ – ई दुइ गोट उदाहरण साफ देखबैत अछि जे केना एकत्रित भेल योद्धा सब अपन अनियंत्रित प्रकृति (स्वभाव) केर कारण, चाहे ओ भेदभाव (पक्ष या विपक्ष केर विवेकपूर्ण समझ) करथि या नहि करथि, विनाश दिश भागैत छथि ।

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ॥
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥११-३०॥

अपन ज्वलन्त मुंह सँ सब दिशक लोक केँ संहारैत (निगलैत), अपने अपन ठोर केँ चाटि रहल छी । हे विष्णु, समस्त जगत केँ तेजपुंज (चमकैत प्रकाश) सँ भरिकय (ओकर) प्रचंड किरण सब जरा रहल अछि ।

अपने अपन ठोर केँ चाटि रहल छी: पूरे तरह सँ उपभोग कयनाय (चाटिपोछि खा गेनाय, पूर्णतया निगलि गेनाय) आर फेर ओकर आनन्द लैत, जेना कि एहि लेल (आनन्द लेबाके लेल) ओ सब बनल हो ।

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ॥
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥११-३१॥

हमरा बताउ जे अपने, एहि तरहक भयंकर रूपवाला, के थिकहुँ ? अपने केँ नमस्कार अछि, हे परम देव ! दया करू । हम अहाँ केँ जानय चाहैत छी, हे आदिदेव ! हम सच मे अपनेक उद्देश्य नहि जनैत छी । 

श्रीभगवानुवाच ।

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ॥
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥११-३२॥

भगवान कहलनि:

हम दुनिया केँ खत्म करयवाला ताकतवर काल (समय) छी, जे दुनिया केँ अपना मे समेटबाक लेल एतय प्रकट भेलहुँ अछि । अहाँक बिना सेहो, दुश्मन सेना मे ठाढ़ योद्धा लोकनि मे सँ कियो जिन्दा नहि रहत । 

अहाँक बिना सेहो, आदि: अहाँक बिना सेहो, अर्थात्, जँ अहाँ, हे अर्जुन, लड़इयो नहि चाहब, तैयो ई सब योद्धा लोकनिक अन्त होयब तय अछि, कियैक तँ हम, सब किछु खत्म करयवला समय केर रूप मे, हुनका सब केँ पहिनहिं मारि चुकल छी; तेँ ओहि काज मे अहाँक हाथ बहुत कम अछि । 

तस्मात्त्वुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् मुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ॥
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥११-३३॥

तेँ अहाँ उठू आ नाम कमाउ । दुश्मन सब केँ हराउ, आर अद्वितीय (अतुलनीय, बेजोड़) राज केर आनन्द लिय’ । सच मे, ओ सब हमरा हाथ सँ मारल जा चुकल अछि; हे सव्यसाचिन (अर्जुन), अहाँ सिर्फ एकटा वजह (कारण) बनू ।

अहाँ सिर्फ एकटा कारण बनू: लोक अहाँ केँ अपन दुश्मन सब केँ हरबयवला बुझत, जिनका देवतहु नहि मारि सकैत छथि, आर एहि तरहें अहाँ केँ नाम (यश) भेटत, मुदा अहाँ केवल हमर हाथ केर एकटा औजार (हथियार) टा छी । 

सव्यसाचिन: ​​ओ जे अपन बायाँ हाथ सँ तीर चला सकय ।

द्रोणञ्च भीष्मञ्च जयद्रथञ्च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ॥
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥११-३४॥

द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा अन्य वीर योद्धा – ई सब हमरा द्वारा पहिनहिं मारल जा चुकल छथि, अहाँ हुनका (युद्ध मे) मारू । भय सँ व्याकुल नहि होउ; आर लड़ू, अहाँ युद्ध मे अपन शत्रु सब पर विजय प्राप्त करब ।

हमरा द्वारा पहिनहिं मारल जा चुकल छथिः तेँ द्रोण, भीष्म आर अन्य लोक सब केँ मारय सँ पाप लागय सँ जुनि डराउ, चूँकि ओ सब अहाँक गुरु, पितामह आदिक रूप मे अहाँक लेल पूजनीय थिकाह । 

भय सँ व्यथित: सफलता केर सम्बन्ध मे चूँकि ई महान योद्धा सब केँ अजेय अजेय मानल जाइत छथि ।

सञ्जय उवाच ।

एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ॥
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥११-३५॥

संजय कहलनि:

केशव केर ई बात सुनिकय, मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़िकय, कँपिते, दण्डवत् प्रणाम कयलनि, आर फेरो दबल (सहमल) आवाज मे, भय सँ आतुर (घबराहट सँ भरिकय), झुकिकय (नमनभाव मे) कृष्ण सँ सम्बोधित भेला (बात कयलनि) ।

अर्जुन उवाच ।

स्थाने हृषीकेशे तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ॥
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥११-३६॥

अर्जुन कहलनि:

हे हृषीकेश, यैह सही छैक जे दुनिया अपनेक प्रशंसा सँ प्रसन्न अछि आ आनन्दित अछि, राक्षस सब डरक मारे चारू तरफ भागि जाइछ आर सिद्ध लोकनिक सम्पूर्ण दल अपनेक पूजा (आराधना) मे झुकैत छथि (नमन भाव मे रहैत छथि) ।

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ॥
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥११-३७॥

आर हे महान आत्मा, ओ सब अपने केँ कियैक नहि प्रणाम करथि, जे ब्रह्मा सँ पर्यन्त पैघ आर हुनकर मूल कारण थिकहुँ, हे अनन्त सत्, हे देवता लोकनिक स्वामी, हे ब्रह्माण्ड केर धाम ! अपने अविनाशी थिकहुँ, सत् (अस्तित्व) आर असत् (अनस्तित्व) थिकहुँ, (संगहि) ओ जे (ताहू सँ) परे (उपर) थिकहुँ ।

ब्रह्मा: हिरण्यगर्भ ।

सत् आर असत्, आदि: सत् (देखाय दयवला) आर असत् (बिनु देखायवला), जे अक्षर (अविनाशी) केर उपाधि सब (सहायक) बनैत अछि; एहि तरहें ओकरा सत् आर असत् कहल जाइत छैक । असल मे, अविनाशी सत् आर असत् सँ परे छथि ।

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ॥
वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूपम् ॥११-३८॥

अपने आदि देव थिकहुँ, प्राचीन पुरुष थिकहुँ; अपने एहि ब्रह्माण्ड केर सर्वोच्च आश्रय (शरण, आधार) थिकहुँ, अपने सब किछु जानयवाला थिकहुँ, आर जानय योग्य एकमात्र चीज थिकहुँ; अपने सर्वोच्च लक्ष्य थिकहुँ । हे असीम रूप, ई ब्रह्माड अपने सँ व्याप्त अछि ।

वायुर्यमोऽग्निवरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ॥
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥११-३९॥

अपने वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजापति आर प्रपितामह थिकहुँ । अपने केँ हजार बेर नमस्कार, नमस्कार, आर बेर-बेर नमस्कार, नमस्कार अछि ।

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्वं ॥
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥११-४०॥

आगू आर पाछू अपने केँ नमस्कार अछि, हर तरफ अपने केँ नमस्कार अछि, हे सर्वेसर्वा ! अपने शक्ति मे अनन्त आर पराक्रम मे अनन्त थिकहुँ, सर्वव्यापी (सब मे व्याप्त) थिकहुँ; तेँ अपने टा सर्वस्व (सब किछु) थिकहुँ ।

हर तरफ: जेना अपने हरेक स्थान मे उपस्थित छी । 

सर्वव्यापी: सिर्फ अपनेक एक स्वत्व सँ (सब किछु व्याप्त अछि) ।

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे माधव हे सखेति ॥
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥११-४१॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ॥
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥११-४२॥

हम दुराशापूर्वक जे किछुओ कहने होइ (पूर्व केर समय मे अपने केँ एना नहि जनैत) बेपरवाही या स्नेहवश, अपने केँ “हे कृष्ण, हे यादव, हे मित्र” कहिकय (सम्बोधित करैत), अपने केँ केवल एकटा मित्र बुझिकय, अपनेक एहि महानता सँ अनजान – कोनो भी तरह सँ हम मजाक मे, चलैत समय, आराम करैत समय, बैसबाक समय, या भोजन करैत समय, अकेले में(अपनेक संग), हे अच्युत, या आन लोक सभक संग अपनेक निरादर (अपमान, अश्रद्धाक भाव मे) कएने होइ – हम अपने, एक असीमित (परब्रह्म) सँ, ई सबटा क्षमा कय देबाक लेल प्रार्थना करैत छी ।

स्नेह: प्रेम सँ उत्पन्न भेल भरोसा ।

संग मे: दोसरा लोकनिक उपस्थिति मे ।

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ॥
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥११-४३॥

अपने एहि चल आर अचल संसार केर पिता थिकहुँ, एकरा सभक पूजाक पात्र थिकहुँ; महानो सँ पैघ महान थिकहुँ । तीनू लोक मे अपनेक बराबर कियो नहि अछि; फेर अपने सँ बढ़िकय के भ’ सकैत अछि, हे अतुलनीय शक्तिवाला (परमेश्वर) ?

तीनू लोक मे… कियो नहि: दुइ या ओहि सँ बेसी ईश्वर नहि भ’ सकैत छथि, अगर हेबो करितथि, तँ दुनिया ओना नहि चलैत जेना चलैत अछि । जखन एकटा ईश्वर बनाबय चाहता, तँ दोसर मेटाबय चाहता । के जनैत अछि जे सब अलग-अलग ईश्वर एक्के सोच केँ हेताह, कियैक तँ ओ सब एक-दोसर सँ अलग हेता ? 

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ॥
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसहि देव सोढुम् ॥११-४४॥

तेँ अपना शरीर केँ (अपनेक) पूजा (प्रशंसा) मे दण्डवत् (झुकाकय) प्रणाम करैत, हम अपने सँ क्षमा चाहैत छी, हे अतिप्रिय भगवान ! जेना एकटा पिता अपन पुत्र केँ, मित्र अपन मित्र केँ, आर एकटा प्रिय अपन प्रियतम केँ क्षमा कय दैत छथि, तहिना अपने केँ हमरा क्षमा करबाक चाही, हे देव !

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ॥
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥११-४५॥

हम बहुते प्रसन्न छी कि हम ओ देखलहुँ जे हम पहिने कहियो नहि देखने रही; तथापि हमर मन भय सँ भटकि रहल अछि । हे देव, हमरा मात्र अपन ओ रूप देखाउ । हे देवता सभक स्वामी, हे ब्रह्माण्ड केर धाम, दया करू । 

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ॥
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥११-४६॥

मुकुट पहिरने, गदा आ चक्र लेने, हम अपने केँ पहिनहिं जेकाँ देखय चाहैत छी । हे हजार हाथवाला, विश्वरूपवाला, वैह चारि भुजावाला (चतुर्भुज) रूप धारण करी ।

श्री भगवानुवाच ।

मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ॥
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥११-४७॥

हे अर्जुन, हम कृपापूर्वक अपन योग शक्ति सँ, अपन ई देदीप्यमान, आदिम, अनन्त ब्रह्माण्डीय (सार्वभौमिक) रूप अहाँ केँ देखेलहुँ अछि, जे पहिने कियो नहि देखलक ।

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ॥
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥११-४८॥

हे कौरव लोकनिक महानायक, नहि तँ वेद केर अध्ययन सँ आ नहिये यज्ञ सँ, न दान सँ, न अनुष्ठान सब सँ, न कठोर तपस्या सँ, मनुष्य लोकनिक संसार मे अहाँक अतिरिक्त कियो आर केँ हम एहि रूप मे देखाय दैत छी । 

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ॥
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥११-४९॥

हमर एहि भयानक रूप केँ देखिकय डराउ जुनि आ नहिये विस्मित होउ । अपन डर (भय) केँ दूर कयकेँ आर प्रसन्न हृदय (खुश दिल) सँ, आब हमर एहि पुरान रूप केँ फेर सँ देखू ।

सञ्जय उवाच ।

इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ॥
आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥११-५०॥

संजय कहलनि:

एहि तरहें वासुदेव अर्जुन सँ बात कयकेँ फेर सँ अपन रूप देखौलनि; आर महात्मा (कृष्ण) अपन सौम्य रूप धारण कयकेँ, डरा गेल अर्जुन केँ शान्त कयलनि (बुझा-सुझाकय सन्तुष्ट कयलनि) ।

अर्जुन उवाच ।

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्य जनार्दन ॥
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥११-५१॥

अर्जुन कहलनि:

हे जनार्दन, अपनेक एहि सौम्य मानव रूप केँ देखिकय हमर विचार आब शान्त भ’ गेल अछि, आर हम अपन प्रकृति मे वापस आबि गेलहुँ अछि ।

श्री भगवानुवाच ।

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ॥
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥११-५२॥

भगवान कहलनि:

हमर एहि रूप केँ देखनाय वास्तव मे बहुत मुश्किल अछि जेना अहाँ देखलहुँ अछि । देवतो लोकनि एहि रूप केँ देखबाक लेल हमेशा लालायित रहैत छथि । 

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ॥
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥११-५३॥

नहि त वेद सँ, नहि तपस्या सँ, नहि दान सँ, नहि यज्ञ सँ हमरा एना देखल जा सकैत अछि जेना अहाँ हमरा देखलहुँ अछि । 

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ॥
ज्ञातुं द्रष्टुञ्च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥११-५४॥

लेकिन एकनिष्ठ भक्ति सँ, हे अर्जुन, हमरा एहि रूप मे जानल जा सकैत अछि, असल मे देखल जा सकैत अछि, आर हे दुश्मन सब केँ जरेनिहार, ओहि मे प्रवेश सेहो कयल जा सकैत अछि । 

एकनिष्ठ भक्ति: ओहेन भक्ति जे कहियो मात्र भगवानक अलावे कोनो आर चीजक खोज नहि करैछ, आर ताहि द्वारे भगवानक अलावे कोनो आर चीज केँ नहि चिन्हैछ ।

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ॥
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥११-५५॥

जे अकेले हमरा लेल काज करैत अछि आर हमरहि टा अपन लक्ष्य मानैत अछि, हमरा प्रति समर्पित अछि, आसक्ति सँ मुक्त अछि आर कोनो प्राणीक प्रति शत्रुता नहि रखैत अछि – हे पांडव, ओ हमरा मे प्रवेश करैत अछि । 

अकेले हमरा लेल काज करैत अछि: अपन पूरा हृदय आ आत्मा सँ सब रूप आ तरीका सँ अकेले हमर सेवा करैत अछि, आर एहि तरहें ओहि सब मे आसक्त नहि होइत अछि ।

केवल वैह टा, जेकर भक्ति एहि श्लोक मे वर्णित रूप लैत हैअछि, हुनका जानि सकैत अछि तथा हुनका अनुभव कय सकैत अछि जेना ओ वास्तविकता मे छथि, आर बाद मे हुनका संग एक भ’ सकैत अछि ।

इति विश्वरूपदर्शनं नाम एकादशोऽध्यायः ॥

The end of eleventh chapter, designated, The Vision of the Universal Form.

हरिः हरः!!

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