“स्त्री पुनर्विवाह केर औचित्य आ एहि पर वर्तमान समाजक दृष्टिकोण”

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— कीर्ति नारायण झा। 

स्त्री पुनर्विवाह केर औचित्य आ एहि पर वर्तमान समाजक दृष्टिकोण – पुनर्विवाह अर्थात सरल भाषामे फेर सँ विवाह जकरा अपना सभक ओहिठाम सम्बन्ध कहैत छैक। हुनका लोकनिक कथनानुसार जीवन में विवाह एक्के बेर होइत छैक, विवाह ओना एकहि बेर होयवाक चाही चाहे ओ पुरुष के होअय अथवा स्त्री के मुदा कखनहु काल कऽ परिस्थिति बिपरीत होयवाक कारणे दोसर विवाहक परिस्थिति बनि जाइत छैक जाहि में सभ सँ बेसी प्रभावित करैत छैक विवाहक बाद पति पत्नी केर मृत्यु। पुरूष प्रधान समाज होयवाक कारणे पुरूष के पुनर्विवाह के समाज स्वीकार करैत आयल अछि मुदा स्त्री विवाह के समाज सभ दिन सँ विरोध करैत आबि रहल अछि जे आइयो अपन सभक समाज मे स्त्री पुनर्विवाह केर स्वीकृति एकदम नहिं अछि। समाज केर अनुसार विवाह मुख्य रूप सँ स्त्री के होइत छैन्ह पुरूष तऽ मात्र एकटा पात्र होइत छैथि मुदा बहुत ठाम समाज इ अनुभव करैत अछि जे स्त्री के पुनर्विवाह नहिं कराओनाइ ओहि स्त्री के प्रति अत्याचार कयल जाइत अछि संगहि कतहु कतहु ओहि अत्याचार के दुष्परिणाम सेहो समाज में दुषित वातावरण के रूप में दृष्टिगोचर सेहो भेल अछि। स्त्री जाति के न्यायोचित अधिकार के अस्वीकार करैत अपन सभक समाज जाहि मे स्त्रीगण आओर अधिक सक्रिय रहैत छैथि जे एहि पीड़ा के सभ सँ बेसी अनुभव कऽ सकैत छैथि ओ सभ सँ आगू आबि स्त्री पुनर्विवाह के धुर विरोधी के रूप में ठाढ भऽ जाइत छैथि जखन कि हुनका पुनर्विवाह के समर्थन करवाक चाही। एहि परिस्थिति मे स्त्री पुनर्विवाह केर स्वीकृति समाज के अवश्य देवाक चाही विशेष रूप सँ विवाह के पश्चात स्त्री अथवा पुरूष के जँ एकहुटा धिया पूता नहिं भेलन्हि अछि। धिया पूता भेलाक बाद समान रूप सँ स्त्री अथवा पुरूषक विवाह पर स्वीकृति अथवा अस्वीकृति के नियम बनेबाक चाही। आजुक परिस्थिति मे पुनर्विवाहक एकटा तेसर समस्या सेहो उत्पन्न भऽ गेलैक अछि, समाजक तथाकथित एडवांस लोक के धिया पूता अपन माय बापक इच्छाक विरुद्ध विवाह करैत छैथि आ अपरिपक्वता के कारणे विवाहक किछु दिन के बाद पुनर्विवाह के लेल समाजक समक्ष उपस्थित होइत छैथि, एहि प्रकारक पुनर्विवाह केर मंजूरी नहिं भेटवाक चाही अथवा एहि मे सख्ती करवाक आवश्यकता अछि नहिं तऽ पारिवारिक सम्बन्ध में एकर बहुत पैघ दुष्प्रभाव पड़ैत छैक आ वर्तमान में इ मैथिल समाज में खूब भऽ रहल छैक। हमरा लोकनि अपन धिया पूता पर नियंत्रण दिनानुदिन कम केने जा रहल छी परिस्थिति चाहे कोनो होअय ओकर कोनो प्रकारक निर्णय पर आँखि नहिं मुनि कऽ ओकर सहयोगी के रूप में ओकरा निर्णय लेबा मे सहयोग करवाक चाही जाहि सँ निर्णय परिपक्व होअय। समाजक इ एकटा बहुत पैघ समस्या अछि स्त्री पुनर्विवाह के जे शिक्षा के संग संग एकर समाधान होयवाक चाहैत छल मुदा हमरा लोकनि शिक्षित तऽ भेलहुँ मुदा अपन संस्कृति के बिसरैत गेलहुँ आ तकर परिणाम हमरा सभक समक्ष एकटा विकराल रूप में उपस्थित भऽ गेल अछि। एहि सम्बन्धमे अपना सभके दृष्टिकोण के बदलऽ पड़त। समस्या के गम्भीरता के बूझय पड़त आ स्त्री पुनर्विवाह के लेल परिस्थिति पर ध्यान आकृष्ट करैत एकटा सुव्यवस्थित समाजक संरचना करय पड़त