“पतिक दीर्घजीवनक मंगलकामना करवाक सभसँ विशिष्‍ट पर्व थिक मधुश्रावणी।”

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— कीर्ति नारायण झा।   

मधुश्रावणी पावनि विधिवत रूप सँ श्रावण कृष्ण पंचमी सँ प्रारंभ होइत अछि मुदा एकर विधि चतुर्थीएँ सँ प्रारंभ भऽ जाइत छैक। एहि दिन सँ नवविवाहिता लोकनि अरबा-अरबानि खाइत छैथि। साँझ मे सजि-धजिकऽ सखी-बहिनपाक संग विभिन्न फूलबाड़ी सँ फल, फूल पात, जकरा ‘जूही-जाही’ कहल जाइत अछि, लोढ़ि कए अपन डाली मे सजा कऽ गीत गबैत अपन घर अबैत छथि। ई क्रम पूजा समाप्ति सँ एक दिन पहिने धरि चलैत अछि। पंचमी दिन सँ सासुर सँ पठाओल साड़ी-लहठी, गहना आदि पहिर व्रती पूजाक तैयारी करैत छथि। एहि पावनि मे मुख्य रूप सँ गौड़ (गौरी) एवं नागक पूजा होइत अछि।
एहि पूजाक लेल सबसँ पहिने एकटा कोहबर बनाओल जाइत अछि अथवा घर मे विवाह मे कोहबर रहैत ओतय पूजाक हेतु कलश पर अहिवातक वाती प्रज्वलित कएल जाइछ। सासुर सँ पठाओल हरैदक गौर आ एकगोट नैहरक सुपारी, लग मे मैनाक पात पर धानक लावा राखि ओहि पर दूध चढ़ाओल जाइत अछि। बिसहारा जो गौरीक अतिरिक्त उज्जर फूलसँ चन्द्रमाक पमजा सेहो कएल जाइत अछि, मुदा गौरीक पूजा सिन्दुर ओ लाल रंगक फूल सँ होइछ।
‘मधुश्रावणीक’ अरिपन मुख्यरूपें मैनाक दूटा पात पर लिखल जाइत अछि। जतय व्रती बैसिकऽ पूजा करैत छैथि आ एहिक दूनू कात जमीन पर सेहो अरिपन बनाओल जाइत अछि। जमीन परहक अरिपन के उपर मैनाक पात राखल जाइत अछि। बायाँ कातक पात पर सिन्दूर आ काजर सँ एक आंगुरक सहारा लय एक सौ एक सर्पिणीक चित्र बनाओल जाइत अछि, जे ‘एक सौ एकन्त बहिन’ कहाबैत छथि। एहि मे ‘कुसुमावती’ नामक नागिनक पूजाक प्रधानता अछि। दायाँ कातक पात पिठार सँ एक सौ एक सर्पक चित्र सेहो एक्के आुगंर सँ बनाओल जाइत अछि, जकरा ‘एक सौ एकन्त भाई’ कहल जाइत अछि, एहि मे ‘वौरस’ नामक नागक पूजा मुख्य होइत अछि। एहि पावनि मे मैना पातक उपयोग एहि दुआरे कएल जाइत अछि, जे पुराण सब मे कहल गेल अछि कि हिनक पालन पोषण एहि मैनाक पातक बीच होइत छन्हि। संगहि मैना पातक रासायनिक गुणक कारणें एकटा वशीकरण शक्तिक स्रोत सेहो मानल जाइत अछि। तें मिथिला मे कतेको अवसर पर मैना पातक व्यवहार होइत अछि आ सुहागिन काजर आ सिंदूर धारण करैत छथि।
पूजाक अवधि मे शिव -पार्वतीक विभिन्न कथा सेहो कहल जाइत अछि। जाहि मे पुमुख अछि – ‘विहुला मनसा’, ‘मंगला गौरी ’, ‘विषहारा’, ‘पृथ्वी जन्म’, ‘सीता पतिव्रता’, ‘उमा पार्वती’, ‘गंगा-गौड़ी जन्म’, ‘कामदहन’, ‘लीली जन्म’, ‘बाल बसंत’ आओर ‘राजा श्री करक क कथा एहि तरहे सबदिन भोर मे पूजा होइछ, कथा होइत आओर साँझ कए जूही-जाही लोढ़वा मिथिला मे जतेक पर्वत संग लोक गीतक प्रमुख स्थान अछि तेंएहि पावनिक अवसर बिषहारा आ गौरी गीतक प्रचलन अछि।
श्रावण शुक्ल पक्ष तृतीया ताहि दिन मधुश्रावणी होइत अछि ओहि दिन वर पुनः नवविवाहिता के सिन्दूरदान करैत छथि, जकरा तेसर सिन्दूरदान कहल जाइत अछि। (एहिसं पहिने वियाहक राति पहिल बेर आ चार दिनक बाद चतुर्थीक भोर मे दोसर बेर सिन्दूरदान होइत छेक) तें ई तेसर सिन्दूरदानक पर्व मिथिलांचल नारी संस्कृतिक परिचालक थिक। पतिक दीर्घजीवनक मंगलकामना करवाक सब सँ विशिष्‍ट पर्व मधुश्रावणी मैथिल ललनाक समर्पण एवं सहिष्‍णुता क कामना तथा निष्‍ठा एवं संस्कृतिक परंपराक प्रति प्रेमक प्रतीक थिक।