“समाज आ साहित्य”

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— पीताम्बरी देवी।       

 

साहित्यक योगदान सब ठाम अछि। साहित्य एहेन अछि जे समाज के बदलि दैत आछि ।देखु ने कतेको बीर रस कविता बनल जाहि से नव युवक सब में जोस भरि गेल आर ओ सब सड़क पर उतरला।अपन देश के आजाद करय में साहित्य के बहुत हाथ अछि।जेना बंकिम चन्द्र के आनन्द मठ एहेन साहित्य छल जे महिला पूरूष सब अपन अपन घर परिवार के त्यागि के आंदोलन में शामिल भय गेला।एकटा बंन्देमातरम् अंग्रेज के हिला देने छल।माहे रंगदे बसंती चोला गीत एहेन गीत छल जे आंन्दोन में हजारों नव युवक सब आन्दोलनि भय गेला।एहेन एहेन अनेकों वीर रस के कविता लिखल गेल छल आर सामाज में सब मरै मारैं लेल तैयिर भय गेल छल।समाज आर साहित्य के अन्योनाश्रित सम्बन्ध अछि ।समाज में अखनो हरिमोहन झा के किताव ओतबे नव लगैत अछि जतबे जहिया विखल गेल छल।अमर जी ,यात्री जी ,मधुप जी किरण जी के लिखल साहित्य समाज में विद्दमान अछि।मधुप जी के घसल अठ्ठनी बाजि उठल हम कतय जाउ हम कतय जाउ समाजक एकटा वर्ग के निर्दयता के दर्शाबैत अछि। साहित्य समाज के एकटा कर्तव्य बोध करबैत अछि।समाज में साहित्य के बहुत योगदान छैक। साहित्यकार सब मंच से भाषण दैत छथि आर समाज में हलचल हुअ लगैत अछि।विर रस के कविता सुनाई से विरंगना बनैत छथि आर अहिंसक भासण सुनै से कोमल हृदया भय जाईत छथि।समाज में कुरिति के दूर करै लेल साहित्य एकटा बहुत निक अस्त्र अछि सोति में किछु दिन दहेज आबि गेल छल लेकिन किछु साहित्यकार कविता वना वना के पोस्टकार्ड में लिख लिख के सब के पठवय लगला । तहिया मिडिया ते नै छल।
स्वयं विकौआ फल्ला अपने तीलक गना लय लेल।
कहु कि हम झूठ कहै छि कहुं कि हम फूसि बजै छि।
किछु गोटा जे सब तीलक लेने रहथि हुनकर सब के नाम लय लय के लिखल छल कविता पोस्टकार्ड पर लिख लिख के विना अपन पता देने गामे गाम जाय लागल आर बच्चा बच्चा गीत गावय लागल।
आर दहेज लेनाई एकदम बन्द भय गेल ।आर अखनि तक किनको साहस नै होई छनि जे बेटा के विवाह में तीलक लेता। साहित्य से समाज के बहुत कुरिती सब हटल अछि। साहित्य के प्रत्यक्ष प्रमाण ते महिला सब मे देखु जे कनिया सासुओं से नै बजै छलि ओ आब झोरा लय के स्कुटी चला के बजार जाई छथि ।रेल बस जतय ततय असकर चल जाईत छथि ।ई सब साहित्य के प्रमाण अछि पढ़लनि लिखलनि आर अपन जीवन में उतारलनि।एकर अंत नहि अछि साहित्य आर समाज एक दोसर के पूरक अछि।