“समाजक उत्थानमे साहित्यक योगदान”

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— दिलिप झा।             

एहि बात में रत्तीभरि अतिश्योक्ति नहि जे समय समय पर साहित्य समाज के यथार्थवादी चित्रणक संग समाज सुधार के सेहो चित्रण करैत आबि रहल अछि आ समाज के समसामयिक प्रसंग सभक जीवंत अभिव्यक्ति क’ क समाज के नवनिर्माण में अपन सहभागिता के सिद्ध करवा में सफल रहल अछि। साहित्यक पारदर्शिता समाज के उत्थान में सहायक होईछ जे समसामयिक सामाजिक कुरीति सभ के समय समय पर उजागर कय क’ समाधान के पथ प्रशस्त करैत अछि। अतः साहित्य समाज के उन्नति आ विकास के नींव राखैत अछि।
साहित्यक आविर्भाव सेहो समाजे स’ होईत छैक जकरा साहित्यकार अपन भाव फेंट क’ सम्मोहक बना अपन अभिव्यक्ति के रूप में समाजक सामने रखैत छैथ जे साहित्य के रूप में समाज के नवनिर्माण आ उत्थान में पथप्रदर्शक आ जन जन के लेल अनुसरणीय होईछ। कोनो साहित्यकार के अपन समाज स’ एक प्रकारक विशेष संबंध रहैत छैन्ह आ ओ बहुत पहिले स’ संचित वा संकलित अपन अनुभव के अभिव्यक्त करैत छैथ। साहित्य ओ सशक्त माध्यम थिक जाहि स’ समाज के जन जन व्यापक रूप स’ प्रभावित होइत छैथ आ समाज में प्रबोधन के प्रक्रियाक सूत्रपात होईत छैक। साहित्य लोक सभ के प्रेरित करैत अछि जत’ एक दिस इ सत्य के सुखद परिणाम सब के रेखांकित करैत अछि ओतहि दोसर दिस असत्यक दुखद अंत के सिख वा शिक्षा प्रदान करैत अछि। नीक साहित्य लोक के चरित्र निर्माण में सहायक होईछ। अतः हम कहि सकैत छी जे साहित्य के समाजक उत्थान में केंद्रीय भूमिका होईछ कारण समाज के एहि स’ दिशाबोध हाईत अछि आ संगहि समाज के उत्थान हाईत अछि। साहित्य समाज के संस्कारित त करिते अछि संगहि जन जन में जीवन मूल्यक शिक्षा के परोसैत अछि तथा कालखंड के विसंगति सभ आ विरोधाभास सभ के रेखांकित क’ क समाज में प्रेषित करैत अछि। जाहि स’ समाज में सुधार आ सामाजिक विकास द्रुतगामी होइछ।
साहित्य अतीत स’ प्रेरणा संकलित क’ क वर्तमान के चित्रित करैत भविष्यक मार्गदर्शन प्रेषित करैत अछि। ताहि हेतु साहित्य के समाज के दर्पण कहल जाइत छैक। हलाँकि जत’ दर्पण मानवीय बाह्य विकृति सभक आ विशेषता सभ के प्रतिविंबीत करैत अछि ओतहि साहित्य समाजक आंतरिक विकृति सब के आ खूबी सब के चिन्हित करैत अछि। सबस’ महत्वपूर्ण बात त’ इ थिक जे साहित्यकार समाज में व्याप्त विकृति सभक निवारण हेतु अपेक्षित परिवर्तन सभ के सेहो अपन साहित्य में स्थान दैत छैथ। साहित्यकार स जाहि वृहत्तर अथवा गंभीर उत्तरदायित्व सभक अपेक्षा रहैत अछि ओकर संबंध केवल व्यवस्था के स्थायित्व आ व्यवस्था परिवर्तनक नियोजन मात्र स’ नहि अपितु ओ सब आधारभूत मूल्य सभ स होईछ जाहि में हुनकर निर्णय निहित होइत अछि जे वांछित दिशा सभ की की थिक।
साहित्यकार अपन मन में उठ’ वाला भाव सभ के जखन लेखनीबद्ध क’ भाषाक माध्यम स’ प्रकट करैत छैथ त’ ओ रचनात्मक ज्ञानवर्धक अभिव्यक्ति के रूप में साहित्य कहबैत अछि। जीवन आ साहित्यक प्रेरणा सब समाने होइछ। तैं हेतु समाज आ साहित्य में अन्योन्याश्रय संबंध देखल जाईत अछि।
एहि संदर्भ में अमीर खुसरो स ल’ क’ तुलसी, कबीर, जायसी, रहीम, प्रेमचंद, भारतेन्दु, निराला, नागार्जुन तक के श्रृंखलाबद्ध रचनाकार सभ समाज के उत्थान में अभूतपूर्व योगदान देने छैथ। तुलसी, कबीर, रैदास आदि सब त’ अपन व्यक्तिगत अनुभव के समाजीकरण केने छलाह जे आगा चलिक’ अविकसित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में समाज में स्थान पेलैथ। मुंशी प्रेमचंद के एक कथन के एत उद्धृत केनाई उचित अछि ‘‘जो दलित है, पीड़ित है, संत्रस्त है, उसकी साहित्य के माध्यम से हिमायत करना साहित्यकार का नैतिक दायित्व है।’’
प्रेमचंदक किसान मज़दूर चित्रण ओहि पीड़ा व संवेदनाक प्रतिनिधित्व करैत अछि जाहि स’ आइओ अविकसित एवं शोषित वर्ग गुजरि रहल अछि। साहित्य में समाजक विविधता, जीवनदृष्टि आ लोककला सभक संरक्षण होईछ। साहित्य समाज के स्वस्थ कलात्मक ज्ञानवर्धक मनोरंजन प्रदान करैत अछि जाहि स’ सामाजिक संस्कार के परिष्कृत कैल जा सकैछ। रचना समाज के धार्मिक भावना, भक्ति, समाजसेवा के माध्यम स’ मूल्यक संदर्भ में मनुष्य हित के सर्वोच्चताक अनुसंधान करैत अछि।
साहित्यक सार्थकता एही में निहित अछि जे ओ कतेक सूक्ष्मता आ मानवीय संवेदनाक संग सामाजिक अवयव सभ के उद्घाटित करैत अछि। साहित्य संस्कृति के संरक्षक आ भविष्य के पथ-प्रदर्शक होईछ। संस्कृति द्वारा संकलित भ’ क’ साहित्य ‘लोकमंगल’ के भावना स’ समन्वित होईत अछि। सुमित्रानंदन पंतक पंक्ति एहि संदर्भ में अछि- “वही प्रज्ञा का सत्य स्वरूप
हृदय में प्रणय अपार
लोचनों में लावण्य अनूप
लोक सेवा में शिव अविकार।”
अंततः हमर अवधारणा अछि जे साहित्यक पारदर्शिता समाजक उत्थान कही वा नवनिर्माण में सहायक होईछ जे समाजक कुरीति सभ के उजागर करैत ओकर समाधान के प्रस्तुत करैत अछि। सामाजिक लोक के बीच जागरूकताक परोसि क’ क्रांतिदूत के भूमिका के निर्वाहन करैत अछि।
जय मैथिली जय मिथिली