“पितृपक्षमे अपन पितरकेँ जल देलासँ पितृ दोषसँ मुक्ति भेटैत छै।”

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— विद्या चौधरी   

पितृपक्ष भादब मासक पूर्णिमा दिन स शुरू होयत अछि आ ई पंद्रह दिन तक चलैत अछि। ई पुरा भारत मे मनाओल जाइत अछि। ई मानल जाइत अछि जे इ पंद्रह दिन क लेल पितर सब धरती पर अबैत छथि। अपन बंशज के आशिर्वाद देबाक लेल। पूर्णिमा क दिन अगस्त मुनि के तर्पण तील, कुश लक जल लक देल जाइत छन। तकर बाद अपन पूर्वज नाम स जल दैत छथि। कहल जाइत अछि जे अगस्त मुनि के संतान नहि छलनि ओ भगवान के तपस्या मे लागि गेला संतान प्राप्ति के लेल परन्तु हुनका संतान प्राप्त नहि भेलनि त ओ क्रोध मे आबि क भगवान के कहलखिन जे हम अपन तपस्या के बल स अपन संतान के स्वंय निर्माण करब कियाकि मानल जाइत छय जे जिनकर संतान हुनका मरला पर तर्पणो नहि करैत छथिन त हुनका प्रेतात्मा स मुक्ति नहि भेटैत छनि ताहि दुआरे हमरा पानियो के देत आ ओ नारियल के फल के मनुष्य क आकार देबय लगलाह ई देख भगवान संसय मे परि गेलाह जे मनुष्य स मनुष्य क उत्पति होयत छय तखन त सबके भरण पोषण केनाई कठिन अछि आ गाछ स यदि मनुष्य निर्माण होबय लागत त प्रलय आबि जाइत। भगवान अगस्त मुनि के बहुत तरहे समझाब लगलाह परन्तु ओ मानबाक लेल तैयार नहि तखन भगवान सोचलथि किछ कायल जाई। भगवान अगस्त मुनि स कहलखिन जे आहाँ एक टा अकैउनक पात तोरू जाहि स एक बुन्द दुध खसत आ एक टा बालक के निर्माण होयत आ यदि आहाँ ओही बालक के समहारी लेब तखन हम बुझब। भगवान माया स ओ बालक अगस्त मुनि के समहारने नहि समरनि ओ बालक हुनका त्रिभुवन घुमाब लगलैन। तखन हारी क अगस्त मुनि भगवान स कहलाह ई आहाँ क माया अछि ई अहि समहारू। आ हमर ई फल के जाहि मे मनुष्य क आकार द चुकल छी तकर कि होयत। भगवान कहलखिन आहाँ चिन्ता जुनि करू। ई नारियल के फल होयत जे हमर सबस प्रिय फल आ सब पुजा मे शामिल होयत। शुभ फल मे प्रथम स्थान ऐहि के रहत। आ संसार मे जिनकर पुत्र तर्पण करथिन जल देथिन ओ आहाँ के देता। पहिल जल अहि के प्राप्त होयत। ताहि दुआरे पूर्णिमा क दिन अगस्त मुनि के जल देल जाइत छनि। पितृपक्ष मे ब्राम्हण सेहो खुआओल जाइत अछि। परिबा के दिन स ब्राम्हण भोजन शुरू भ जाइत अछि। कहल जाइत अछि जे पितर के जल देला स पितर तृप्त होईत छथिन आ आशिर्वाद दैत छथिन। पितृपक्ष मे कोनो शुभकाज नहि होयत अछि परन्तु अपना सब के सब शुभ काज मे देवता आ पितर दुनु के पुजा होयत छनि।
जय मिथिला
जय मैथिली