“पितृपक्ष”

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— पीताम्बरी देवी       

पितृपक्ष पितर के पक्ष अछि ।देवी पक्ष से पहिले पितृपक्ष पितृपक्ष सुरुह भ जाईत अछि ।ई सम्पूर्ण भारत में पितर के श्राद्ध करम एहि पक्ष में होईत अछि ।ई भादव के पूर्णिमा दिन से सुरूह होती अछि आर अश्विन के अन्हरिया आमावास्या तक पन्द्रह दिन तक तीथ बाई तीथ जाहि पितर के जाहि दिन मृत्यु तीथ रहै छनि हुनकर निमित्त ब्राम्हण भोजन करौल जाईत छनि।कहल जाती अछि जे एहि पक्ष में पितर के श्राद्ध करम केला से पितर के हुनकर निमित्त जे दान कैल जाईत छनि ओ हुनका पटि भय जाईत छनि । सतयुग में ते पितर अपनै अपन पिण्ड लेवय अबै छला ।जेना त्रेता युग में राजा दशरथ पिण्ड माता सिता से लय के चल गेला ‌।मुदा कलयुग में ओ शक्ति नै रहल आब हुनकर निमित्त ब्राम्हण भोजन करौल जाईत अछि ।सबसे पहिल दिन पूर्णिमा दिन अगस्त मूनि के तर्मण क के तील कुस लय के जल देल जाईत छनि ।प्रात से जिनका जतबा पुरषा के नाम माता पिता दादा दादी काका काकी भाई भौजाई नाना नानी जे स्वर्गीय भय गेल रहै छथिन हुनका सब के तर्पण क जल तील अर्पण करै छथि।कहल जाईत अछि जे पितृपक्ष में जे पुत्र के कुश के नोक से जल खसैत अछि ओ हुनकर पितर के प्राप्त होईत छनि तै तर्पण पुत्र के अबश्य करवाक चाहि।मान्यता अछि जे सब पितर पन्द्रह दिन लेल मर्तभुवन में अपन बंश के देखय अबै छथि जे हमर कुल में कियो जल देनहार अछि कि नै ।हमर बंस में पुत्र के पुत्र भेलनि कि नै ।मान्यता ते ई हो अति जे ओहि लोक में जल के बहुत अभाव अछि एतहि जे पुत्र पोत्र जे जल दै छथिन वेह पितर के पैंट होईत छनि।पहिले ते ब्रम्हण सब बारहों मास संध्या वन्धन करै छला आर अपन पितर के जल अर्पण करैत छलाह। लेकिन आब ते एहि भागम भाग जिंदगी में गिनले चूनल ब्यक्ति से पार लगैत अछि। पितृपक्ष के एकटा आरो कारण अछि जे सब बिसरल कुल पुरषा के नाम लय के जल देला से अपन कुल पुरषा के नाम ते बूझल रहतै ।जे बहुत आबश्यक अछि।कुल पुरषा के नाम मोन रखनाई ई विवाह दान मातृका पूजा सब में काज अबैये तै हमेशा अपन कुल पुरषा के याद करैत रहि । पितर के जल अर्पण केला से बहुत पून्य होईत छै ।पितर ओतय से बहुत आशिर्वाद दैत छथिन ।जाहि से जलदाता के पुत्र ,पौत्र ,धन्य धान यह कृति में बृध्दी होती छनि।
पीताम्वरी देवी