“”उगह चान की लपकी पूआ”

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— अरुण कुमार मिश्र     

भादव शुक्ल पक्षक चतुर्थी तिथि केँ मिथिलाक घर-घरमे चौरचन पाबनि बड्ड श्रद्धा सँ मनाओल जाईत अछि। ई पाबनि जहिया साँझमे चौठ पड़य तहिया करी से पर्व निर्णयमे कहल गेल अछि।
एहन मान्यता अछि जे इ पूजा केनिहार सदैव धनवान, पुत्रवान आ प्रसन्नचित्त रहैत छथि। “उगह चान की लपकी पूआ” सँ गुंजित पाबनि अछि चौरचन। महिला लोकनिक संग समस्त परिवार विशेषकर धिया पूतामे अहि पाबनि के प्रति अलगे उत्साह देखवामे अबैत अछि। महानगरीय व्यस्तम जीवनमे छतो पर जा लोक अहि दिन कुनु एक टा फल हाथ मे ल’ चंद्रमा के प्रणाम करैत छथिन।

भादव मासक शुक्ल पक्षक चतुर्थी (चौठ) तिथिमे साँझखन चौठचन्द्रक पूजा होइत अछि, जकरा लोक चौरचन पाबनि सेहो कहैत छथि। स्कन्द पुराण अनुसार चन्द्रमा केँ अहि दिन कलंक लागल छलन्हि, ताहि कारण अहि समयमे खाली हाथ चन्द्रमाक दर्शनक मनाही छैक। चौरचन दिन चंद्रमा जे कियो खाली हाथ देखैत छथि हुनका मिथ्या कलंक (दोष) लगैत छनि। मिथिलामे अकर निवारण हेतु रोहिणी सहित चतुर्थी चन्द्रक पूजा कायल जाइत अछि ! स्कन्द पुराण केर अनुसार एक बेर भगवान श्रीकृष्ण केँ स्यमन्तक मणि चोरीक मिथ्या कलंक लागि गेलनि छलन्हि। श्री कृष्ण नारदजीक प्रेरणा सँ अहि तिथि केँ श्री गणेश आ चन्द्रमाक पूजा कयलन्हि तखन हुनक कलंक छुटलन्हि।

अहि पूजा के एक टा इहो विशेषता छैक जे अहिमे महिले पबनितिन होइत छथिन। मैथिलानी पबनितिन (विशेषकर घरक बुढ़ पुरान महिला) दिन भरि निराहार वर्तमे रहि पवित्रता सँ पूरी-पकवान ( छनुआ सोहारी, चीनीक फूईट वला पूरी, रंग विरंगक पुरुकिया, टिकरी इत्यादि) बना रंग बिरंगक फल, मधुर-मिठाई, नारियल, दहीक छाँछी सब सँ डाली कोनियाँ सजा पहिल साँझखन पूर्व सँ ठाँऊ अरिपन देल स्थान पर राखि देल जाइत छैक। कलशस्थापन कऽ चानन, रक्त चानन, सिनूर, यज्ञोपवित, अक्षत, फूल, फूलमाला, दूईव, वेलपत्र, अर्घा पंचपात सँ सुसज्जित भऽ गणपत्यादि पंचदेवता भगवान विष्णु गौरी आ चौठीचानक पूजा कऽ बेराबेरी सबटा पुरी पकवान फल सँ सजल डाली हाथमे लऽ चन्द्रदेवक दर्शन आ प्रणाम करैत छथि। अहि दौरान मैथिलानी सब पारम्परिक गीत गाबि चांदक’ आराधना करैत छथि। जेना “पूजा के करबै ओरियान गै बहिना, चौरचन के चंदा सोहाओन” इ दृश्य अत्यंत मनोरम होयत अछि। तकर बाद आरती कऽ विसर्जन करैत छथि, मरर पर चढाओल खीर पूरी केँ भांगि सबके प्रसाद वितरण करैत छथि।

एक गोट कथा प्रचलित अछि जे गणेशके देखि कऽ चंद्रमा अपन सुंदरता पर घमंड करैत हुनक मजाक उड़ेला। अहि पर गणेश क्रोधित भऽ हुनका ई शाप देलथिन कि चंद्रमा के देखना सऽ लोगके समाज सऽ कलंकित होबय पड़तेन। अहि शाप सऽ मलित भऽ चंद्रमा स्वयं के छोट महसूस करय लगलाह तँ अहि दिन चंद्रमा के देख’ सऽ कलंक लागि सकैत अछि। शाप सऽ मुक्ति पाबेक के लेल चंद्रमा भादो मासक’ चतुर्थी तिथि कऽ गणेशक पूजा केलैथ। तखन गणेशजी कहलथिन, जे आजुक’ तिथिमे चंद्रमा के पूजाक संगे हमर पूजा करत, हुनका कलंक नहि लगतैन। तहिया सँ ई पूजा मिथिलामे प्रचलित अछि।

ई पूजा मिथिलामे मिथिलानरेश हेमाङ्मद ठाकुर द्वारा प्रचलित भेल। हुनका एहि तिथिकेँ विशिष्ट शुभ फल प्राप्त भेलनि तैं ओ एहि पावनिक प्रचार प्रसार मिथिलामे जोर शोर सँ कयलनि। मिथिलामे चन्द्रमाक पूजा प्रशस्त मानल जाइत अछि। चौठचंद्रक’ पूजामे एक विशेष श्लोक पढ़ल जायत अछि :

सिंहप्रसेन मवधीत सिंहोजाम्बवताहत:
सुकुमारक मारोदीपस्तेह्यषव स्यमन्तक:।।