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“मिथिलाक सुप्रसिद्ध पाबनि – मधुश्रावणी”

310 भ्यूज

— आभा झा।         

” मधुश्रावणी” मधुश्रावणी पाबैन अपन मिथिलाक मुख्य पाबैन अछि।नवविवाहिता वर कनियाँक ई पाबैन प्रेमरस सँ भरल रहैत अछि।बियाहल कनियाँ
पबनैतिन सभक उमंग देखै जोगर रहैत अछि।एहि पाबैन
के व्रत में विशेष पूजा गौरी शंकरक होइत छैन्ह। साओन मास अबैत देरी मधुश्रावणीक गीत वातावरणमें गूँजय लगैत अछि।सभ पबनैतिन सब दुल्हिन जेकां श्रृंगार कऽ खूब धूमधाम सँ एहि पाबैन के करैत छथि।बियाहक पहिल साओन मास में नव विवाहित कनियाँ सभ एहि व्रत केँ करैत छथि।साओन मासक कृष्ण पक्षक पंचमीक दिन सँ एहि व्रतक शुरूआत भऽ जाइत छैक। एहि दिन सुहागन व्रत राखि कऽ मइट आ गोबर सँ बनल बिसहरा
और गौरी शंकरक पूजा करैत छथि।साओन मासकेँ मधुमास सेहो कहल जाइत अछि।पबनैतिन सभ एहि दिन सासुरक नब साड़ी -वस्त्र,गहना पहीरि कऽ सजि-धजि कऽ सासुर सँ आयल सामग्री सभ सँ पूजा करैत छथि।गीत-गाइन सभ अपन मधुर आवाजमें गीत गबैत छथि।एहि पाबैन में प्रकृतिक महत्वपूर्ण भूमिका छैक। मइट और हरियाली सँ जुड़ल एहि पूजाकेँ पाछू पतिक दीर्घायुक कामना होइत छैक। एहि पाबैनमें पूजाक लेल रोज बसिया फूल और पातक इस्तेमाल होइत छैक। ‘लालहि बन फूल लोढ़ब फूल तोड़ब, हे सिन्दूर भरल सोहाग, सखी फूल लोढ़े चलू फूलवरिया सीताकेँ संग सहेलिया एहि गीत सभक स्वर वातावरणमें अनुगुंजित भऽ उठैत अछि।अधिकांश फूल भोरमें जे फुलाइत अछि से सांझ धरि लोढ़य योग्य भऽ जाइत अछि।नवविवाहिता सभ ओहि फूलकेँ चुनि कऽ अपन डालामें भरैत छथि।सासुर सँ आयल भार-दोरक गप्प,पतिक संग हँसी – मजाक अपन सभक संस्कृति एहिमें बिहुसँ लगैत अछि।अंतिम दिन टेमी दगबाक बिध होइत अछि।मिथिलाक नव विवाहिताक ई पाबैन आस्था आ श्रद्धा सँ जुड़ल अछि।शिव -पार्वती सँ जुड़ल कथा पबनैतिनकेँ सुनाओल जाइत छैन्ह। एहि कथामें दाम्पत्य जीवनमें केहन आचार-विचार हेबाक चाही, एकर लाभ की होइत अछि सभ बताओल जाइत छैक। ई कथा सभ कहि कऽ नब-नब संबंधक बीच समन्वय कोना बनेबाक चाही और गृहस्थ जीवनकेँ सुचारू रूप सँ कोना चलेबाक चाही ओहि लेल तैयार करैत अछि।मधुश्रावणी पाबैन नवविवाहिताकेँ सासुरक लेल मनोवैज्ञानिक रूप सँ सेहो तैयार करैत अछि।ताहि दुवारे ई विधान अछि कि ओ भरि पाबैन सासुरक अन्न,फल,दूध,पूजन सामग्री वस्त्र आदिक उपयोग करैत छथि। नैहरक बाद सासुरकेँ अपन घर बुझबाक दिस प्रेरित करबाक ई पाबैन पहिल सीढ़ी बनैत अछि।ई एहन पाबैन अछि जे पबनैतिनकेँ सोझे प्रकृति सँ जोड़ैत अछि।हुनका ई संदेश दैत अछि जे गाछ-बिरिछ पर्यावरणक लेल कतेक उपयोगी अछि।आधुनिक विज्ञान सेहो एकरा स्वीकार करैत अछि कि पर्यावरणमें साँप सन विषधरकेँ सेहो महत्वपूर्ण स्थान छैक। मिथिलाक अधिकांश लोक अपन सांस्कृतिक परम्परा सँ जुड़ल छथि।ओना धीरे-धीरे लोक सभमें आबक समय में ई कम भेल जा रहल अछि।मधुश्रावणी पाबैनमें महिला पुरोहित होइत छथि जे समाजक बुढ़ -पुरान ,बाबी, काकी, पीसी आदि जे पबनैतिनकेँ पुजबै छथि आ सभ दिन अलग-अलग कथा कहैत छथि।नवविवाहिताक पाबैन मधुश्रावणी मिथिलाक मातृभाषा मैथलीक प्रति सेहो संवेदनशील बनबैत अछि।
जय मिथिला जय मैथिली।

आभा झा
गाजियाबाद

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