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“चलू-चलू बहिना हकार पुरय लए”

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— कीर्ति नारायण झा।             

“चलू-चलू बहिना हकार पुरै लेए
टुन्नी दाइक बर एलइ टेमी दगैलेए।।
लटहा चूरा छै नौ कूरा
पाकल केरा सात चंगेरा
छाल्ही बाला दही तँ करेजा कटैए।। चलू।।
सड़ल बदाम भरल पनपथिया
भरि घर लेए साड़ी सेहो तिनपढ़िया
टुन्नी दाइ लेए ललका पटोर एलइए।। चलू।।
माटिक साँप बनल छै करिया
मैनाक पात पिठारक थरिया
बीचमे सिन्दूरक ठोप सोभैए।।चलू।।
कनिञाक माइ के घुघना लटकल
पातिलक चाउर एलइ सेहो बिनु फटकल
सासुक कोंढ़ कठोर छलैए।।चलू।।
भरि पनपथिया जाही-जूही
कथा कहथि से होइ छथि कूही
बीधमे मटकूरी बड़ छोट एलैइए।। चलू।।
उथल-पुथलमे छथि बिधकरी
दीपक टेम सटेलन्हि धरी
टुन्नी दाइ के आँखि सँ नोर झड़ैए।।
चलू-चलू बहिना बहिना हकार पुरैले।। मैथिली पुत्र प्रदीप जी केर ई सुप्रसिद्ध गीत मिथिलाक अमर सुहाग सँ परिपूर्ण पवित्र पावैन मधुश्रावणी केर साक्षात चित्रण करैत अछि। मधुश्रावणी एहि साल रवि दिन अर्थात ३१ जुलाई २०२२ आ पंचमी तिथि सँ मिथिलाक नवविवाहिता लोकनिक पवित्र पावैन प्रारम्भ भेल। नवविवाहिता मुख्यतया अपन नैहर मे ई पावनि करैत छैथि । एहि पावनिक व्रत मे कनियाँ अपन बरक दीर्घायु लेल पूजा अर्चना आ प्रार्थना करैत छथि। एहिमे गौरी आ शंकरक विशेष पूजा कएल जाइत अछि। सावन मास अबैत देरी मधुश्रावणी के गीत गुंजायमान होबय लगैत अछि। सब विवाहित महिला मधुश्रावणी के तैयारी मे लागि जाइत छथि। ई पावनि नव- विवाहिता कनियाँ पूर्ण श्रद्धा सँ मनबैत छैथि । विवाहक पहिल वर्षक सावन मासमे नवविवाहिता मधुश्रावणीक व्रत करैत छथि। ई व्रत सावन मासक कृष्ण पक्षक पंचमी तिथि सँ आरम्भ होइत अछि। चौदह दिन धरि चलय बला एहि पाबनिमे पावनि करय बाली दिन में एकहि बेर भोजन करैत छैथि। चौदहो दिन साँझ मे साज श्रृंगार आ फूल पात लोढ़य में ओ लोकनि ब्यस्त रहैत छैथि। फेर डाला सजाओल जाइत अछि आओर अगिला दिन विषहाराक पूजा अर्चना कयल जाइत अछि। मधुश्रावणी के चौदह दिन के अलग अलग चौदह टा खिस्सा सुनाएल जाइत अछि जाहि मे राजा श्रीकर के बेटी के अमर सुहाग केर कथा केर विस्तार सँ वर्णन कयल गेल अछि। मिथिलाक गाम गाम नवविवाहिता केर सजल वस्त्र में समस्त मिथिला के सुहाग भाग्य केर कामना में समाहित पवित्र वातावरण सँ समस्त मिथिला सुन्दरताक चादर ओढने अत्यन्त मनोभावन लगैत रहैत छैक। नागपंचमी के दिन कोबर घर में गोबर सँ नीपि कय ओहि पर सेनूर पिठार सँ नागिन अर्थात विषहरा केर चित्र बनाओल जाइत अछि आ ओहि पर माटिक बनल नाग देवता केर मूर्ति बनाओल जाइत अछि आ हुनका स्थापित कयल जाइत अछि। नवका वस्त्र आ गहना सँ सुसज्जित नवविवाहिता पूजा करवाक लेल बैसैत छैथि आ महिला पुरोहित लौकिक मंत्र केर द्वारा सविधि पूजा करबैत छैथि। पूजाक उपरान्त पवनैतिन अपन हाथ में लाल कपड़ा में बान्हल धानक पोटरी जकरा बिन्नी कहैत छैक ओकरा लऽ कऽ कथा सुनैत छैथि। कथाक उपरान्त महिला पुरोहित द्वारा बिन्नी नामक एकटा विशिष्ट पद केर पाठ करैत छैथि आ पावनि करय वाली नागदेवता के फूल चढ़वैत छैथि। नागपंचमी के दिन पाँच टा अहिवाती के तेल सिनूर आ खोंइछ भरि कऽ अनोन भोजन कराओल जाइत अछि। ई पावनि मुख्यतः अहिवातक दीर्घकालिक अभिलाषा केर पूरा करवाक लेल कयल जाइत अछि। एहि पावनि मे मधुश्रावणी के दिन कनियाँ के टेमी सँ दागवाक एकटा प्रचलित विधि सेहो होइत अछि। धन्य मिथिला आ धन्य मिथिलाक पावनि तिहार

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