“बेमेल विवाहपर आधारित एकटा रोचक कथा”

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— मंजूषा झा।           

चारि बहिन छलै , पर यैह छलै सबहक छोट। नाम सेहो बड्ड सुंदर छलै फुलिया आ चेहरा मुहरा लागय जेना गुलबिया । कै टा ने कैएक टा भाइयो छलै । पर ई छलै कनी सुद्धा – बुद्धा माथा के । एकरा छल-बल छूने नै छलै। त तें भरिसक सब एकर नबका नाम राखि देने छलय ‘पगलिया ‘। माय – बाप , टोल समाज , भाय- भातिज आ बहिन सँ भागिन तक सबहक लेल ओ छलै केवल पगलिया ।सबहक भेटै छलै ओकरा बस दुत्कारे- दुत्कार ।
ओ खेलकै या नेहेलकै , सुतलै या जगलै नै छलै ककरो ओहि सब सँ कोनो सरोकार । मूर्ख आ बनेर बनाबै मे कियो कोनो कसैर नै छोड़ल कै । ओ फुलिया सबहक़ मनोरंजनक साधन बनि गेल छलै। केम्हरो सँ आबि ओकरा खोंचारैत खौंझबैत दु टा अलबल गप्प कहैत चलिते बनल ।आ ई बेराबेरी अनेरो सबहक कुचालि सँ जूझैत कन्नाखिज्जि गड़ागाड़ी – मारामाड़ी, चिकरा- चिकड़ी सँ अनजाने मे पागलक लक्षण के सबटा सुबूत समाजके देखना मे सत्य प्रतीत करा रहल छलै । समय सेहो पंख लगा के जेना उड़िए रहल छलै ।

प्रकृति ते कोनो कोताही नै केने छलय ओकर शारीरिक वनावट मे । मनुक्खक सबटा छिछा- विच्छा ते ओकरो मे छलहिए । ओकरो सब ज्ञान देरिए सँ सही पर आब बुझ’ मे बड्ड किछू आबय लगलै । शरीर भरायऽ लगलै ओकर । ओकरो शौख – सेहंता जागय लगलै । आब ओ टुकुर – टुकुर मनगुप्ते अकाने बनि कय सबहक बात , विवाद, निक बेजाय , मान – सम्मानक महत्व के संगे सब बातक अक्ख्यास राखय लगलै । पर तैयो ओ चतुरपन बला बुद्धि नै सीख पेलै ।आजूक समाजक गिड़गिटिया रंग बदलब से कला नहि पढि पेलै । तथापी माय बापके तँ यादि छलहिए जे हमर एहनो एकटा बेटी भगवान देने छथि । अचके एक दिन हरलै ने फुरलै एकटा वरक अता- पता लगाओलनि। बेमेल_ विवाहक_बदलैत_ रूप_ अहि ठाम सद्यः देखइ मे आबय अछि । अपन संतानक अनुरूप नहि आनि अनला एकटा “ आगु नाथ ने पाछु पगहा , विना छान के कूदय गदहा “ बला वर जे भागि पड़ायल छल गाम सेआ तें बारल-ताड़ल अधकचरा शहरिया आ तैपर सँ कमाऊआ वर संग ब्याही देल गेलै । ओकरा तँ गामक दु बीघा बला कोनो बकलेल सँ ब्याह कराओल जैतई तँ सूखितगर रहितै । अहि बेमेल ब्याह से ओ बेचारी फुलिया अनचोके बिन सोचने तखन ते राजकुमारी बनि गेल । पर असल जिनगिक कथा तँ आबे सुरु भेलै कियाकि ओ गदहा वरबो तखन ते तृपित छल जे आहा बड्ड लजकोटरि कनिया हमरा भेटल अछि । चारि दिन भेंट ठीक से नै भेल ते की ?? ई एहन ते बिधे होई छै ।परिवारक बुधियरका सदस्य के तुलना कके मोन गदगद रहय ।किंतु एतेक पैघ बात छूपित रहब संभव कहाँ छलै !छःहो दिन नै भेलै कि गामक टोलक सारि – सरहोजि आबेसी नानी बनि सब अपन बुद्धिमता क परिचय दैत बम्बईय्या वर के कान मे टिप देलखिन जे “ धनि आहाँ सन हिम्मतगर लोक जे एको दिन डेबलियै !” आहाँ ! आहाँ सनके हीरा ! ओहोहो जुलुम भ गेलय ? एहन अनर्थ भगवती कोना केलनि आहाँ संग से नै जानि । बड्ड दुःखक बात – आहाँक कतौ एहन बताहि संग ब्याह होईक चाही ??? कोना कऽ लेलियै यौ ? आहाँ ते सूखले मे ठकाऽ गेलौं । आहाँ सन सुभग वरक ब्याह कतऊ बकलेल बताहि सँ होई ?? घोर अनर्थ .. घोर अनर्थ भ गेलय । आब वर सनकल जेना दहारैत फुलिया के बजेलक । वरक सोझाँ फुलिया डरे चुप्प ! तखन वैह समदिया बितपैन सब ओतहिए खूब लोढिएलकै फुलिया के । तैयो जेना – तेना तीन साल धरि उलहन – उपरागक आदान – प्रदान संग समय बितैत रहलै । कियाकि ओई वर के गामक समाज गाम घर आबि ब्याह केलकै ते कनी मान इज्जत देबय लागल रहय तें अहि संबंध के निबाहै छलय। द्विरागमन सेहो भेलै , कुमारिक पद छूटलै, कियाकि आब ते सासुर चलि गेलै ।
पर सासुर मे रहनाय ते नीकही बुधियरकी के सेहो भारी पड़य छनि ते ई फुलिया कोनो खेतक मुरैयो बराबर नै छल।फुलिया के ते कियो झगड़ा के अलावा किछू सिखेने नै छलय । कोना टिक पैतै ?? ऊपर से कमाऊआ वर , अहि बेर कोठा एक कोठली के सेहो बनेने छलय तहन ओ एहन उज्जड देहाती संग कोना रहितै ? शहर मे लोक की कहितै ?? ई बंबैया ठग फेर भागि गेल गाम से । आ कमेलहा पाई सँ नबका कनिया तकलक शहर मे । आब ठाठ से रहय अछि ॥ माय बाप गाम मे जिनगी कहुना बिताऽ रहल अछि ।

आ फुलिया उलाऊ-चुलाव स हारि के नैहर मे असगरक ब्याहल रहितो कुमैरिक जिनगी जिबय लेल बिबस अछि । मैथिलानी हेबाक गुणक लाज रखने अछि। राधा जेना मनही मन एक दु दिनक सुख संग जियल क्षण के बेर -बेर मन मे मनगुप्ते जिबैत नैहर मे नीके जिनगी काटि रहल अछि । मोनेमोन वरक सिनेह के संजोगैत पति परमेश्वरक आदर दैत पल पल यादि करैत रहैत छै । बड्ड खुश अछि , दिनक दिनचर्या मे लिप्त रहैत अछि । आब ओकरा सब मोन सँ मानय छै ।सबहक सहानुभूति सेहो प्राप्त छै । सबहक नजरि मे बड्ड कुलकाटनि छै ।

सबटा तरी- घट्टी , अरोजन-परोजन, पेंच- पालट, नीच – ऊँच, दुःख चिंता सब बात बूझय छै आब वैह फुलिया । आब अपन दिनचर्या संग अनको आशा क छाहरि बनल छै । पारिवारिक दायित्वक सब तरहें निर्वाह करय छै ।
पर लागय अछि जे एखनो कनी ते बताहि छै अवश्य कियाकि ओ अपन ओई भगौड़ा वर के फोन नम्बर अपन पिता सँ माँगि क रुपैया बला खूट मे बाँन्हि के नुकाक रखने छै । आ अठवारे कोनो अंठिया फोन सब से फोन क लेल करय छै । दु शब्द बतियायो लै छै । ओतबे मे चेहरा दमकैत रहय छै ओकर । वर के सख़्त हिदायत दई छै जे हम फोन केलौं आहाँक से हमर पिता क उलहन नै देबै आ नै पता चलय । सब दिन यैह कहैत फोन करय छै आ ओ वर कहय छै — पगली फेरो फोन किया केलौं ?? राखू आ काटि दई छै । ई बताहिया ते एकहि क्षण मे सौ सवाल केना छी ?कहिया ऐब ? आदि पुछि के चारि गो गारियो पढि के फोन कटल पर ‘मौन’ बैसि के घंटो ओहि अभगला वरक सिनेह के मँथैत मन मे शून्य मुख सँ सबहक मुँह निंघारैत रहय छै या लोक क भाव के बूझय चाहय छै । आ लोक ओहिये क्षण ओइ फुलिया क मुँह क भाव के पढ़य क प्रयास करय छै ।आकी तखने हँसि के कहि उठय छै चहकैत मुद्रा मे जे – टटिबा लेकिन हमर फोन ते उठाऽ लै त छै ना ! फोन नंबर फेरो नुका क राखि आबै छै ।
चौबीस घंटा सब काज राज करिते धरिटे मुँह मे मुस्कान भरने स्वामिक प्रति सिनेह जोगबैत रहय छै । फोन मे सुनल मधुर स्वर के अपन कान मे घोरैत रहय छै ।
लेकिन बताहि कहियै की किछू आर से ते नहि जानि पर ओ किछू बीत जाऊ दुर्गा स्थान भोर साँझ जेबे करय छै । भोरे फूल बेल्पत्र तुलसी दुइब तोडबे करय छै । भानस भात क ध के पूजा करय ले तिनु मंदिर जेबे करतय नित प्रतिदिन । ककरो ना ककरो गोसौनिक पूजा सेहो करिते टा छै । अनको फूल बेल्पत्र सरिया दई छै । बूझकनुके जेकां कहैत रहय छै जे जँ गामक या टोलक कियो हमरा मुड़न उपनयन मे प्रेम से साड़ी पहिरेलकै ते हमहु एको सौ रुपैया स आशीर्वाद कोना नै दियै ? ओ सौखसे देलकै ते हमरो ना सौख छै !नै किछू देबै ते नीक बात नै ने भेलै । हमहु ते सभक बेटिए छी ते हमरा जे जुड़ल से देबय दिय आ दैयेके मानय छै अपन असिरवाद ।

एकादशी, त्रियोदशी , सोमवारी आओर पता नै कोन कोन ब्रतो करय छै । ब्रामहनक सीदहा आ दक्षिना देबे करय छै । पूर्णिमा दिन कुमारि ब्रामहन सेहो खुआबै छै । चारिए बजे भोरे से गृहस्थी मे लागल रहय छै , छूछो खेतय पर मंगतय नै किछू ककरो से । अंगना कखनो सुन नै छोड़य छै । भरि दुपहर सुतिए के गमेतय पर एमहर ओमहर नै बाउआइ छै । छै ने फुलिया बकलेल ?? कियाकि एकरा सबहक चिंता छै एकदम निः स्वार्थ भाव सँ । वर के सिनेह मे मिथिलाक गुणक मान रखैत निभाऽ रहल छै बेमेल विवाह के ।🪷🌵🪷🌵🪷🪷🌵🪷

लेखिका — मंजूषा झा के ✍🏻से