“आदर्श बिआह ककरा कहल जाए..!”

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— उग्रनाथ झा।                     

मानव जीवन के सोलह संस्कार में स एकटा संस्कार छै _ विवाह । आदर्श जीवन के कल्पना बिनु विआह संभव नहि अछि ।ई ओ गठजोड़ आछि जेकर उत्पत्ति सं मानवीय सृष्टी के संकल्पना आधारित छै । ऐहन जे पुनीत संस्कारक अवसर हर्षोल्लास सं परिपूरित रहैत अछि । दु कुल के अनभिज्ञता के समाप्त क भिज्ञता स्थापित केनाय यानी ई कहीं जे पहिचान संबंधी कटुता के दूर करैत मैत्री के संबंध कुटमैत्री स्थापित होइत छै । जाहि में दूनू पक्षक आत्मसम्मान आ मर्यादाक रक्षा आवश्यक , जेकर मजबूत स्तम्भ आछि आदर्श विवाह । एहन विवाह जाहि में वर पक्ष आ कन्या पक्षक स्वैच्छिक प्रतिबद्धता सं बिना कोनो शर्त के आपस में संबंध स्थापित करबाक लेल सहमत हो। दूनू यथा साध्य निर्णय ल सामर्थ्य अनुसार उत्सव के यादगार बनाबैथ । जाहि में उभय पक्षक सब तरहक पारस्परिक भागिदारी हो । एहि में लेन देन पर रोक कतौ नै छै मुदा मांग चांग के मिसियो भरि नहि हो । जे हमरा सबहक आदिकाल सं परंपरा रहल अछि ,परंच वर्तमान में समाज मांगबाक लुतुक ध लेलक अछि जे सुरसा सदृश मुंह बाबि समाज केँ घोटि रहल आछि । लेकिन सुहृद समाज एखनहुँ जागृत छैक आ आपन उपस्थिति दर्ज करा रहल छैथ आ दोसरो के प्रेरित क रहल छैथ जाहि सं आदर्श विवाह के अस्तित्व जीवित छैक ।
मुदा समाज में एखनहु छद्म वेशधारिक आभाव नहि ओ आदर्श विवाहक वचन द भावनात्मक रूपे कन्यागत के सिसोह लैत छैथ । ताहि हेतु आदर्श विवाह आदर्श बनल रहय किछु बातक ध्यान राखब आवश्यक जेना :-
आदर्श विवाह माने निर्लोभ विवाह ।यानी मांग चांग नहि । उभय पक्ष सामर्थ अनुरूप कर्तव्य निभाबैथ । क्रिया कलाप पारंपरिक आ अर्थ अनुरूप मितव्ययिता संग हो । बाहरी आडम्बर सँ बचल हो । देखौस के आधार पर हम सब प्रतीयोगिता नहि करि । शास्त्र सम्मत आ समाजिक पऱपराक आनरुप विवाह करि । एक दोसर पक्षक आर्थिक स्थिति के ध्यान राखि आ बराबरि के कामना वा सामर्थ स़ बेसी जनेबा के लेल अग्रसर नहि हो । जेब सँ नमहर जीह नहि बुझबा चाहि । देखबा में अबैत अछि लड़का लड़की मिलान स्वरुप संबंध फाइनल भ जाएछ परंतु आर्थिक अंतर कारण कमजोर पक्ष बदाम संग घुन सदृश पीसाईत रहैत छथि । ताहि पर विचार होएबाक चाहि । उचित के सम्मान हेबाक चाहि । हंसी खुशी कन्यादान हेबाक चाहि । भावनात्मक बलिदान सं बचबाक चाहि । कहबाक तात्पर्य जे विवाह आदर्श हो तैयो कन्या पक्ष भावना पर नियंत्रण राखि यथाशक्ति सत्कार करथि नै कि कुटुम नै किछु मंगला त सत्खारे में घरारि बेचि ली । यानी रहै त नुकाबी नै आ नै रहे त बिकाय नहि ।
एहि तरह स नव किर्तिमान स्थापित करि ।