“बरसाइत पाबनि केर महत्व”

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— आभा झा।                     

सावित्री सत्यवानकेँ कथासँ प्राप्त भेल सीख –

वट सावित्री जेठ मासक अमावस्या तिथि क’ होइत अछि।ई व्रत विधि-विधानसँ केलासँ अखंड सौभाग्य और संतानवती होयबाक फल प्राप्त होइत छैक। एहि पूजामें बड़क गाछसँ ” फल लागल ” डारि तोरि क’ अंगनामें माटिमें या जे बाहर फ्लैटमें रहैत छी से गमलामें रोपिक ओकर पूजा करैत छथि।संतानवतीकेँ फल लागल डारिकेँ पूजा केनाइ आवश्यक मानल जाइत छैक। अरिपन सेहो देल जाइत छैक। नब वस्त्र पहिर अंगनामें अरिपन देल सब पर पूजा कयल जाइत छैक। बड़क डारिमें सिंदूर, पिठार लगा आरतक पात साटल जाइत छैक। बियैन पर सिंदूर पिठार लगा क’ पियर तागकेँ डारिमें लपेट क’ एक दालि, अंकुरी और एकटा आम आ लीची ल’ क’ लोटामें जल ल’ चारूकात घुमिक बड़क गाछमें सबटा राखि देल जाइत छैक।फेर तीन या सात बेर बेढ़ द’ क’ पुनः कथा सुनल जाइत छैक। मिथिलामें बरसाइत पाबैन में नबका बांसक बियैनसँ गाछकेँ होंकल जाइत छैक। वट वृक्षकेँ पूजन और सावित्री सत्यवानकेँ कथाक स्मरण करवाकेँ विधानक कारणे ई व्रत वट सावित्रीकेँ नामसँ प्रसिद्ध अछि।मिथिलांचलमें अहि व्रतकेँ बरसाइत कहल जाइत छैक। सावित्री भारतीय संस्कृतिमें एतिहासिक चरित्र मानल जाइत छथि।सावित्रीकेँ अर्थ वेद माता गायत्री और सरस्वती सेहो होइत अछि। वैदिक ग्रंथसँ ल’ क’ उपनिषद, ब्राह्मण तथा पौराणिक ग्रंथमें मृत्युकेँ चुनौती देबय वाला वट प्रजातिकेँ वृक्षमें बरगदकेँ अमूल्य बताओल गेल अछि।एकर जड़ि, छाल, पात, छाया और हवाकेँ ने सिर्फ मनुष्य बल्कि धरती , प्रकृति तथा समस्त जीव-जंतुकेँ लेल जीवन रक्षक कहल गेल अछि।मनुष्यकेँ शरीरमें बीमारीकेँ रूपमें यदि यमदूत प्रवेश करि गेल हो और ओ एहि गाछक शरणमें चलि जाय त’ जेना सावित्री अपन पति सत्यवानकेँ यमराजक हाथसँ जीवित वापस आनैमें सफलता हासिल केने छलीह। ओहि तरहें सामान्य व्यक्ति सेहो यमदूतसँ मुक्ति पाबि सकैत अछि।कारण ई अछि कि एकर हवासँ मनकेँ शक्ति बढ़ैत अछि।मन अगर मजबूत हुए त’ काल सेहो परास्त भ’ जाइत छैक। यैह कारण अछि कि जखन श्रीराम वनवासक लेल निकलल छलाह और प्रयाग राजमें भारद्वाज ॠषिकेँ आश्रममें एला ,तखन जे गाछक पूजा भेल ओ बड़क गाछ ही छल।यैह ‘अक्षयवट’ बड़क गाछ अछि ,जकरा आइयो आस्थाकेँ गाछ मानल जाइत छैक। वटवृक्षमें त्रिदेवक निवास छनि।एहि गाछक छालमें साक्षात विष्णु, जड़िमें ब्रह्मा और शाखामें देवाधिदेव महादेवक वास होइत छनि।ज्येष्ठ मासकेँ अमावस्यासँ पहिने त्रयोदशी तिथिसँ एहि गाछक पूजनक आशय सेहो त्रिदेवकेँ पूजन मानल जा सकैत अछि।आध्यात्मिक ग्रंथमें दैहिक-दैविक व भौतिक तापसँ मुक्तिकेँ लेल एहि गाछक सानिध्य में साधना केनाइ तैं श्रेष्ठ मानल गेल अछि, कियैकि बड़क गाछक शाखाकेँ नींचा दिस झुकल आशीर्वादकेँ मुद्रामें रहैत अछि।यैह शाखाकेँ स्पर्श सावित्रीकेँ बल प्रदान केने छलनि और मृत पतकेँ जीवित करय, पिताकेँ आँखिक रौशनी लौटाबय तथा पुत्रवती होइकेँ वरदान हुनका प्राप्त भेलनि।सावित्री आ सत्यवानक जीवनगाथासँ ई व्रत जुड़ल हुएबाक कारणे अहिबातक लेल महत्वपूर्ण मानल गेल अछि।हमर सभक लोकाचारमें कतेक एहेन पाबैन और तिहार अछि जे हमरा जीबैकेँ सीख दैत अछि।हमरा प्रकृतिसँ स्नेह और प्रेम केनाइ सिखबैत अछि।एहि धरती पर जीवन तखने संभव अछि जखन तक धरती पर हरियर-हरियर गाछ बिरीछ अछि।एहि कोरोनाकालमें सबसँ बेसी मृत्यु ऑक्सीजनकेँ कमीसँ भेल छल।जीवनकेँ लेल सबसँ महत्वपूर्ण अछि हवा।हवा बिना हम एक क्षण जीवित नहिं रहब। तहिना ई लोकपर्व अछि बरसाइतकेँ व्रत जे हमरा प्रकृतिसँ प्रेम केनाइ सिखबैत अछि।ताहि दुवारे वटवृक्ष के महत्व बेसी छैक। जेना कि अहि कथासँ हमरा सभके सीख भेटैत अछि कि ई पाबैन हर परिस्थितिमें अपन जीवनसाथीकेँ संग देबयकेँ संदेश दैत अछि।पतिव्रता स्त्रीमें एतेक ताकत होइत छैक कि ओ यमराजसँ अपन पतिकेँ प्राण वापस आनि सकैत छथि।साउस-ससुरकेँ सेवा और पत्नी धर्मकेँ सीख एहि पाबैनसँ भेटैत छैक। जय मिथिला जय जानकी

आभा झा ( गाजियाबाद )