“बाल श्रम – जघन्य अपराध”

39

— अरुण कुमार मिश्र।                 

कोरोना काल सँ पहिने धरि भोरमे पेेपर पढ़वा हमरा नशा छल। हाथमे चाहक कप आ सोझामे खुजल पेपर नित्य प्रतिदिनक नियम छल। नित्य पेपरमे हमर मनमाफिक किछु नहियो होइक तखनो बिन देखने शुकुन नहि भेटैैत छल। ओहि दिन रबि छल, पेपर पढ़वाकक नशा तऽ एहेने छल जे ओहि दिन पेपर नहि आएल, मोन विचलित भऽ गेल। बेर बेर बालकनि सँ तकैत रहलौं। एहि क्रममे तीन बेर चाहक पीब लेलौं। अपन निजी पुस्तकालय के रैैक सऽ एक टा कुुनु मनलग्गु पोथी निकालि पढ़य लगलौं, कखन दस बाजि गेल, नहि बुझि सकलौं। भोरमे पेपर नहि पढ़वाक मलाल तऽ छलवे छल कि सांंझमे पार्कमे टहलैत काल हमरा सँ नीचा ग्राऊंड फ्लोर पर रहनिहार त्यागी जी भेटला, कहलिन्ह जे “आपका पेपर नीचे गिरा था मैने उठाकर अपने पास रख लिया है और मै यह बताना भूल गया था।” सांझक समयमे पेपर सेरायल चाह सन बेस्वाद होइत अछि। फेर दोसरो दिन पेपर नही आयल। हमरा भेेल जे त्यागी जी नीचा खसल देख फरे कतयो पेेपर राखि बिसरि तऽ नहि गेला। त्यागी जी पेपर नहि लैत छलैथ, मुदा पढ़वाक शौक छलन्हि तैँ हमरा इहो शंका भेल जे जानि बुझि कऽ ओ पेपर तऽ नहि राखि लैत छैथ। आब हमरा सहजे तामस हॉकर होइत छल आ कालिह ओकर क्लास लेवाक मोने मोन विचारि लेने छलौं। पहिने ओकरा चारि मंजिल धरि सहजे जुमि जाइत छलैक आ आब फस्ट फ्लोर पर नहि जुमैत छैक। कहीं जानिबूझि कऽ बदमासी तऽ नहि कऽ रहल अछि। याह सब सोचैत आफिस चलि गेलौं। तेसुरका दिन हम भोरे सँ तैयार भऽ बालकनीमे बैैसल रही कि धपss सँ पेपर नीचा खसवाक आवाज भेल। निहुर कऽ नीचा तकलौं आकि किछु कहय लगलौं कि देेखलौ एक गोट दस एग्यारह बरखक गौरवर्ण लड़का, साईकिल पर पेपर लदने ठाढ़ छल। गर्वोन्नत मुखारविंद, मंद मंद मुसकुराइत देखि, हमर तामस कपूरक खुशबू जकां उड़ैत चलि गेल। हम थोड़ेक धकाइत पूछि बैसलौं जे ………..

आजकल तुुम पेपर बाट रहे हो?

हां !

विजयी मुस्कानक संग ओ जबाब देलक, शायद ओकरा एहि बातक प्रसन्नता छलैक जे ओ आब सब काज कऽ सकैत अछि जे पैघ लोक करैत छैथ। सभ बच्चाके हरदम पैैघ होवक चाह रहैत छैक। बच्चा सभ एकसरि मे खेलेत काल वो सब नकल करैत छैथ जे ओ पैघ के देखैत छैथ। अकरा स्वाभाविक नेनपन कहि सकैत छी। हम ओकरा किछु विशेेष नही कहि सकलौं। अतवे कहलै जे

पेपर ठीक से फेंका करो ! रोज नीचे गिरा देते हो !

ठीक है अंकल !

कहि ओ अपन साईकिल सम्हारैत चलि गेल। तकर बाद हम कतेेको दिन धरि आफिसक काजमे बहु व्यस्त भऽ गेलौं। एक दिन भोरेके समय कोलवेल बजल। हम अपने सँ दरवाजा खोललौं कि सोझामे एक गोट कम बयसक लड़का ठाढ़ भेटल ओ झट एक टा परची हमरा दिस बढोलक। हम ओकरा सऽ पूछलौं…..

यह क्या है?

पेपर का बिल है अंकल !

चुकि हम अपने काजमे ततेक व्यस्त छलौं तैँ दस सेकेंड बाद ध्यानमे आयल। अरे ! ई तऽ वाह लड़का अछि ! सूखाएल मुरझाएल,पसीना सँ तरबतर, परेशान सन। किछुऐ दिन पहने खिलल गुलाब सन देखल लड़का आई चार दिन का बासी निरमाल्य सन लागि रहल छल। किछु सशंकित भऽ पूछि देलै …….

तुम बीमार हो!

नहीं!

आब हमरा किछु बुझवामे आवय लागल। हम पाई देवाक क्रम मे पूछय लगलौं………

और बताओ क्या सब करते हो?

स्कूल जाते हो ?

हां अंकल!

हम थोरेक आर कुरेदलौं।

कब जाते हो ?

ओ कहलक कि रात के बारह बजे सेंटर पर जाता हूं जहां अखवार छप के आता है। उसके बाद घर आकर एक एक अखबार मे कमर्शियल पंपलेट सब डालता हूँ तब तक चार के करीब बज जाता है। उसके बाद बांटने निकल जाता हूं। वापस नौ बजे घर से खाना खा के स्कूल चला जाता हूँ। शाम को कुछ देर घर पर होमवर्क फिर वही बारह बजे पेपर सेंटर।

हम सुनि स्तब्ध रहि गेलौं! बड मुश्किल सऽ पूछि सकलौं कि…

तुम्हारे पापा ?
पहले वही तो पेपर बांटते थे?
अब वो क्या करते है ?

अंकल पापा भी पेेपर ब़ाटते हैं। पहले कम पेपर उठाते थे और अब बहुुत ज्यादा।

अंकल मुझे लेट हो रहा है। पिलिज पेमेंट जल्द कर दिजिये।

हम तत्काल पाई ओकरा थमा देलौं आ संज्ञाशून्य भऽ भारी मन सँ सोचय लगलौं कि बाल शोषण कानून केवल फैक्ट्री आ दुकानमे काज केनिहार बाल बच्चा लेल छैक ?
बाल शोषण कि केवल ओतै धरि सीमित छैैक ?
ओह! कतय कतय धरि पँहुचत ई कानून !
चाय दुकान, ढाबा आ धनाढ्य (अफसर) लोकक कोठीमे काज केनिहार बच्चाके लेल सेहो बनल छैक कि ई कानून ?

अखनो ई स्थिति छैक जे नहि जानि कतेको शादी विवाहमे बच्चा सभ सँ बालश्रम कराओल जाइत छैैक। बच्चा सभ शादी विवाहमे रोड लाइटके माथ पर लऽ सड़कक काते कात चलैत अछि। ह्रदय झकझोरैत ई दृश्य देखि कर सरकारक नीति आ ओकर कार्य प्रणाली पर बड अफसोस होइत अछि। सरकारे नहि हमु अहाँ समान रूपें जिम्मेवार छी, कारण हमरा अहाँक आखिँँक सोझा ई सभ भऽ रहल छैक। ई आजुक शिक्षित एवं तथाकथित सभ समाजक संवेदनहीनताक प्रकाष्टा छैक। जाधरि बच्चा के विकास नहि होयत ओ शिक्षित नहि होएत ताधरि देशक विकास सम्भव नहि। देशक भविष्य आजुुक बच्चा पर निर्भर छैक तैँ बालश्रम कानूनक अवहेलना घातक सिद्ध होयत।बाल श्रम सभ्य समाजक माथ पर कलंकक टीका अछि।

बाल श्रम निषेध अधिनियम 1986 मे काम पर लऽ गेनिहार बच्चा के नियोक्ता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के बात कहल गेल छैक। शिक्षा के अधिकार अधिनियमक अनुसार 6-14 बरखक बच्चा के विद्यालयमे अवश्य होवाक चाही। बच्चा के शोषण नहि होइक एहि लेल सामाजिक क्षेत्र सँ जुरल लोक के आगु अएवाक आह्वान करैत छी। अस्तु।