“ज्ञानक गप्प बच्चोसँ सीखल जा सकैए”

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— आभा झा।           

आइ भोरेसँ शीला भनसा घर मे भानस करय मे लागल छलीह। हुनकर सात बरखक बेटी पलक हुनका कहैत छनि कि माँ अहाँ आइ भोरे सँ कि सब बना रहल छी? सात बरखक पलक अपन बाल सुलभ जिज्ञासा सँ अपन माँ सँ प्रश्न केलनि।
माँ कहलखिन आइ अहाँक बाबा के श्राद्ध छनि ने ,हुनके लेल पकवान बना रहल छी। पलक सोचैत बजली माँ बाबा तऽ भगवान लग चलि गेलाह तखन ई सब पकवान खाइ लेल हमर घर कोना एता? माँ जवाब देलखिन नहिं पलक बाबा आब नहिं एता ई सबटा पकवान हम हुनका लग पहुँचा देबनि।ओ केना माँ? अपन पंडित जी छथि ने , ओ पूजा करि कऽ हुनका लग पहुँचा देथिन। शीला पलक के मुँह बंद करय लेल बजली। तखन पलक कहैत छनि कि माँ जखन बाबा अहिठाम रहैत छलाह तखन अहाँ हुनका ई सब पकवान बना कऽ कहाँ दैत छलियनि। तखन तऽ अहाँ हुनका समय पर जलखइ आ खेनाइ सेहो नहिं दैत छलियनि।आइ जखन बाबा नहिं छैथ तखन एतेक रास पकवान। शीला पलक के एकटक देखय लगलीह। तैं अहाँ बच्चा के ई नहिं बुझियौ कि ओकरा ज्ञान नहिं छैक। ओ जे अहाँ के देखैत अछि ओहो वैह सीख रहल अछि।अहाँ ओकरा नीक संस्कार देबै तऽ ओहो नीक सीखत आ खराब देबै तऽ ओहो खराब सीखत।