“सरकारी जमाए”

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— प्रियम्बदा कुमारी।           

“आर पंडितजी, लड़का करैत की छथिन?”
जजमान, लड़का दिल्ली में कुनु पैघ कम्पनी में, ओ कथी कहय छहि…एम.एन.सी में कम्पयूटर इनजिनियर छथि, लाख रूपया महिना दरमाहा छन्हि आ इकलौता छथि।
पंडितजी..(बात बीचे में काटति) हमर लड़की बी.एड क रहल छथि किछ दिन में मास्टरनी बनि जायत, रंगो रूप में तेहने सुंदर, घरक काम- काज में निपुन। हम्मर बेटी त सर्वगुन सम्पन्न छथि आ तिन्हका लेल अहाँ एकटा प्राइवेट नौकरी वला लड़काक रिस्ता आनलौं।
लड़का एक लाख कमै चाहे जतेक कमै तहि स हमरा कुनु सरोकार नहि अछि। लड़का के नौकरी पक्का होबाक चाही। मंदी होय छैक अमेरिका आ चाइना में मुदा ओकर गाज एतह गिरति छहि। अगला बेर रिस्ता तखने आनब जखन लड़का सरकारी नौकरी में होयत। क्लर्क, कौन्सटेबल किछो चलत, बुझि गेलौं न पंडितजी सरकारी लड़का।
और पंडितजी ओतह सॅ झोड़ा- झपटा उठा विदा भ गेलथि।
लड़की के माँ ” आबि गेलौं लड़का देखि के? केहन छल लड़का?
बाप ” अहि बेर पंडितजी लड़का त सही देखेलथि, लड़का सिचाई विभाग में बड़ा बाबू छहि। दूधक साथ मलाईयो भेंट जायत छहि अहि सभ विभाग में, घरो परिवार नीक छल, खेत पथार सेहो छल मुदा,…
माँ- मुदा की??
बाप- एकटा बात हमरा समझि नहि आबि रहल अछि लड़का एतेक कमायत अछि, इकलौता अछि, लम्बा- चौरा खानदानी अछि। हुनकर पिताजी सेहो रेलवे में अधिकारी छथि, गाँवों में एकटा पुष्तैनी हवेली छहि, एतह सेहो अप्पन मकान छैक तखनो दहेज में एक्को टका नहि माँगलथि । कहि रहल छलथि हमरा लड़की एक जोड़ कपड़ा में चाही।
हमरा त लागति अछि जरूर लड़का में कुनु खोट हेतय…।