“पुनर्विवाह- पुनर्जीवन”

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— कृति नारायण झा।       

विधवा पुनर्विवाहक औचित्य के सम्बन्ध में कहल जा सकैत अछि जे हमर सभक समाज पढि लिखि कऽ बहुत अग्रणी पंक्ति में अपन नाम अवश्य दर्ज कऽ लेलक अछि मुदा सामाजिक कुरीति एखनो धरि अपन समाज के पूर्णतया अपन दाँतक तर मे दबाओने अछि। हमर सभक लाखो प्रयास कयलाक उपरान्त हमर सभक समाज एखन धरि पूर्णरूपसँ दहेज मुक्त समाज नहिं बनि पाओल अछि। विधवा पुनर्विवाह के अपन समाज मे स्थापित करवा में एखनो धरि सफल नहिं भऽ रहल छी। पढल लिखल समाज पुरान घिसल पीटल समाजक ढकोसला आ अस्वीकृत परम्परा के समक्ष आत्मसमर्पण कयने छी। पुरान बिचार धारा जे एहि छौंङी के भाग्य में पति सुख नहिं लिखल छैक। बिवाह होइतहि बर के खा गेलै, भगवान एकर किस्मत में जिनगी भरि असगरे रहवाक लेल बनाओने छथिन्ह इत्यादि – इत्यादि। एहिना पहिले सती प्रथा के सम्बन्ध में सेहो कहल जाइत छलैक जे वैधव्य जिनगी जीबा सँ बढियां जे पति के चिता पर ओकर पत्नी के जीवितहि फेकि देल जाइत छलैक, मुदा समाज एहि प्रथा के बिरोध कयलक जकर परिणामस्वरूप एहि कुप्रथा केर अन्त भेल। बिधवा विवाह समाजक सभ जाति में प्रतिबन्धित नहिं छैक। इ मुख्यतया ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार आ कायस्थ समाज में वर्जित छैक। हमरा हिसाबे विधवा विवाह के लेल दू टा श्रेणी में एकरा विभक्त कऽ देवाक चाही। जाहि स्त्री के बिवाहक उपरान्त कोनो बाल बच्चा भेलाक बाद विधवा जीवन प्राप्त होइत छैन्ह तऽ एकरा अति संवेदनशील श्रेणी में नहिं राखि समाजक बिचार बुझि आपसी सामंजस्य के संग पुनर्विवाह के लेल बात विमर्श करवाक चाही ओना एहि सम्बन्धमे हमर पिता आइ सँ पचास वर्ष पहिने हमर एकटा मौसी के बिवाह विधवा भेलाक उपरान्त हुनकर दियर सँ कराओने रहैथि ।समाज में कने मने विरोधक स्वर निकलल रहैक मुदा हमर पिता सन प्रकांड विद्वान् आ हुनक सटीक बिचार केर समक्ष समस्त समाज नतमस्तक भऽ गेल छल। विधवा के दोसर श्रेणी के अर्थात् जिनका कोनो बाल बच्चा नहिं छैन्ह, हिनका विषय में हमरा हिसाबे ओकर पुनर्विवाह अवश्य होयवाक चाही। ओहि विधवा के अपन आगूक जिनगी जीबाक लेल ने कोनो बाल बच्चा छैक जकरा सहारे ओ जीवन केर बाँकी कठिन समय काटि सकय तें ओकर पुनर्विवाह में कोनो प्रकारक किंतु परन्तु नहिं होयवाक चाही ।अपन सभक समाज पुरुष प्रधान समाज होयवाक कारणे पुरुष केर पुनर्विवाह केर अनुमति दैत अछि त स्त्री के कियए नहिं? एहि प्रकारक सौतेला व्यवहार अपन सभक शिक्षित समाज कथमपि नहिं बर्दाश्त कऽ सकैत अछि। विधुर के बिवाह विधवा सँ होयवा में कोनो प्रकारक आपत्ति एहि समाज मे नहिं होयवाक चाही। ओना एहि विषय पर अपन सभक समाज धीरे – धीरे सोचय लागल अछि कारण हुनका लोकनि के आब आस्ते आस्ते बुझवा मे आबि रहल छैन्ह जे जँ एहि प्रकारक बिवाह के जँ अनुमति नहिं भेटतैक तऽ समाज मे अनैतिकता आ व्यभिचार बढि जायत। भ्रुण हत्या आ वेश्यावृति मे वृद्धि होमय लागत। अंतर्जातीय बिवाह के प्रश्रय भेटय लगतैक। एकटा नव शब्द लभ जेहाद केर संख्या में वृद्धि संभव अछि। तें पढल लिखल समाज पुरान घिसल पीटल धर्मांधता के समाप्त कऽ विधवा पुनर्विवाह के स्वीकारि एकटा सभ्य आ नैतिक समाज केर निर्माण करबा मे सहायक हेताह। संक्षेप आ मूल रूप सँ पुनर्विवाह केर अर्थ एहिठाम पुनर्जीवन प्रदान करवाक पुनीत काज के रूप में लेल जा सकैत अछि। जय मिथिला आ जय मैथिली 🙏 🙏 🙏