“पुनर्विवाहक औचित्य”

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— प्रियम्बदा कुमारी।                       

पुनर्विवाहक औचित्य

अप्पन सभहक पुरूष प्रधान समाज कुनु पुरूष के विदुर भेला पर या हुनक वैवाहिक सम्बन्ध विच्छेद भेला पर हुनका पुनरर्विवाहक अनुमति त दति अछि मुदा अखनो स्त्री के पुनर्विवाह लेल उदासीन अछि। देखल जा सकति अछि कि पुरूष के पुनर्विवाह लेल कतेको कुमारि, कम उम्र कन्या भेंट जायत अछि मुदा स्त्री के लेल पुनर्विवाह लेल बढ़िया प्रस्ताव खोजनाय कठिन अछि। हुनकर भाग्य के दोष द हुनका भरि जिंदगी एकाकी जीवन बीताब लेल मजबूर क देल जायत अछि।
पुनर्विवाह जतेक पुरूष लेल जरूरी अछि ओहि स् बेसी एकटा स्त्री लेल जरूरी अछि। आधुनिक काल में पुनर्विवाह के अतेक हेय दृष्टी स नहि देखल जाय छल जतेक आब देखल जायत अछि। पहिने स्त्री के विधवा भेला पर हुनक विवाह हुनकर दियर स करा देल जायत छल जहि स हुनक घर टूटय स बचि जायत छल, बाल- बच्चा के सेहो पिता सहित पूरा परिवार के प्रेम भेटति छल। मुदा आब पुनर्विवाह के प्रति समाज उदासीन भेल अछि खास क के ऊँच जाति ब्राहम्ण, राजपूत, भूमियार में। छोट जाति में एखनो पुनर्विवाह आम बात अछि। एक दिस एकर एक टा प्रमुख कारण दहेजक लोभ सेहो अछि। लोग के सोच इ रहति अछि विधवा के अप्पन पुत्र स ब्याह क के की भेटति, नव कन्या आनब त दान- दहेज सेहो भेटत। ओतहि एक दिस किछ लोग एकरा अभिशाप मानति अछि। हुनका हिसाबे विधवा भेनाय अमुक स्त्री के कर्मक फल अछि, भागक दोष अछि जे हुनक साथ भरि जिंदगी रहति अछि। तहि लेल कुनु परिवार विधवा के अप्पन घर नहि आन् चाहति छथि।
पुनर्विवाहक औचित्य:-

1. समाज में नैतिकता बढ़त :- एकाकी जीवन व्यतीत क रहल स्त्री आ पुरुष रति सुख लेल अनैतिक सम्बंध नहि बनेता।
2. विधवा स्त्री के मानसिक आ शारीरिक दंश नहि झेल परत। विधवा स्त्री जौं किनको स हँसि- बाजि लय छथि त हुनक चरित्र पर सवाल उठ लागय छन्हि। हुनका नहि अप्पन पसिन के खाय – पीब् के स्वतंत्रता भेटति अछि नहि पहिरय ओढ़य के।
3. बाल- बच्चा के उचित लालन- पालन :- कतेको बेर देखल जायत अछि माँ या पिता के एकाकी जीवनक प्भाव बाल – बच्चा के विकास पर परति अछि। बच्चा के उचित विकास, शिक्षा- दिक्षा में माँ आ बाप के अहम भूमिका होयत अछि।
4. वैशयावृति में कमी:- पुनर्विवाहक अभाव में कम उम्र के विधवा अथवा परित्यक्ता स्त्री जीवन व्यापन लेल वैश्यावृति के जाल में फंसि जायत अछि।
आधुनिक युग के शिक्षित लोग के पुनर्विवाह के समर्थन लेल आगू एबाक चाहि।
अहि क्रम में स्व. हरिवंश राय बच्चन के लिख कविता मोन परति अछि
” जो बसे हैं, वो उजरते हैं प्रकृति के जड़ नियम से।
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है।
है अंधेरी रात पर दिया जलाना कब मना है।।”

✍प्रियम्बदा कुमारी
बैंगलोर
स्वरचित एवं मौलिक