“रामायणक एकटा अद्भुत प्रसंगक वर्णन”

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— आभा झा।                       

रामचरितमानसे एक अत्यंत भावुक प्रसंग राम भरत मिलाप अछि।* परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू।।हरन कठिन कलि कलुष कलेसू।महामोह निसि दलन दिनेसू।।भरतजी के परम पवित्र आचरण मधुर, सुंदर और आनंद मंगल करय वाला अछि।कलियुग के कठिन पाप और क्लेश के हरै वाला अछि।महामोह रूपी रात्रि के नष्ट करय के लेल सूर्यक समान अछि।।रामायण में ओना त ‘कतेको एहेन प्रसंग अछि ,जे बड्ड मार्मिक अछि – माता सीता के अपहरण, हुनकर अग्नि परीक्षा ,लव कुश के बालपन आदि। राम भरत मिलाप चर्चित प्रसंग अछि।आइयो कियो भाई बहुत दिनक बाद बड्ड प्रेम भावना सँ मिलन करैत छथि त’ लोक एकरा राम भरत मिलाप के उपमा दैत छथिन। रघुकुल वंशक महाराज दशरथक चारू पुत्र- राम,भरत,

लक्ष्मण और शत्रुघ्न अपन शिक्षा -दीक्षा पूर्ण करि अयोध्या लौटि अबैत छथि।एकर पश्चात चारू भाई के विवाह महाराज जनक के पुत्री सँ भ’ जाइत छनि।महाराज दशरथ के पैघ पुत्र रामजी के राजा बनाबै के निर्णय होइत छैक। एहि निर्णय सँ सब प्रसन्न होइत छथि।परन्तु महारानी कैकयी के दासी मंथरा एहि संबंध में कैकयी के मन में विष घोलैत छथि और राम के राजा नहिं बनाबै के लेल उकसबैत छथि।कैकयी राम सँ बहुत प्रेम करैत छलीह,परंतु मंथरा के बात में आबि क’ दशरथ के विवश क’ दैत छथिन कि ओ भगवान राम के 14 वर्षक वनवास द’ देथिन और भरत के राज्य देथुन।दशरथ के विवशता में एहि बात के कारण ई निर्णय लेबऽ पड़लनि ।राम अपन पत्नी सीता और छोट भाई लक्ष्मण संग वनक लेल प्रस्थान केलनि।जखन ई सब घटना भ’ रहल छल तखन भरत और शत्रुघ्न अपन नाना गाम गेल छलाह। हुनका एहि घटना के कोनो जानकारी नहिं छलनि।अपन पुत्र राम के वियोग में महाराज दशरथ के मृत्यु भ’ गेलनि।ई दुखद समाचार सुनि भरत और शत्रुघ्न वापस एला।तखन हुनका अपन पैघ भाई राम के संग घटित एहि घटना के पता चललनि।हुनकर ऊपर दुखक पहाड़ टुटि पड़लनि।कियैकि एक दिस पिता के अकस्मात मृत्यु भ’ गेलनि ,त’ दोसर दिस पिता समान पैघ भाई के छत्रछाया छिन चुकल छलनि।संग ही राज्य के कुशलतापूर्वक चलाबै के जिम्मेदारी सेहो भरत पर आबि गेलनि। कियैकि ओ बुझैत छलाह जे अयोध्या राज्य पर अधिकार हुनकर पैघ भ्राता राम के छनि। एहि ग्लानि भाव सँ राजकुमार भरत भरल छलाह। संग ही अपन माता कैकयी सँ भगवान राम के प्रति कैल गेल दुर्व्यवहार के लेल रूष्ट छलाह। एहि सब भावना सँ घिरल रहबाक कारण ओ भगवान राम के वापस अयोध्या आनै के निश्चय केलनि। भरत के ई पता चललनि कि प्रभु श्रीराम अपन छोट भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के संग चित्रकूट में ठहरल छथि, तखन भरत तुरंत चित्रकूट प्रस्थान केलनि।भगवान राम अपन भ्राता सँ वन आगमन के कारण पूछैत छथिन। तखन भरत हुनका वन में ही राज्याभिषेक करि क’ वापस अयोध्या लेल प्रस्थान करै लेल कहैत छथिन। परन्तु श्रीराम एना करै सँ मना क’ दैत छथिन। कियैकि ओ अपन पिता के देल वचन सँ बान्हल छलाह। तखन भरत बड्ड दुखी मन सँ अयोध्या वापस प्रस्थान करै के तैयारी करैत छथि, परंतु प्रस्थान सँ पूर्व ओ अपन भाई राम सँ कहैत छथि कि अयोध्या पर केवल श्रीराम के अधिकार छनि और केवल 14 वर्षक समय तक ही हम अपन कार्य भार सम्हारब और एहि कार्यभार के सम्हारै के लेल अहाँ हमरा अपन चरण- पादुका द’ दिय, हम एकरा सिंहासन पर राखि अहाँ के महाराज मानि क’ अहाँक प्रतिनिधित्व में 14 वर्ष तक राज्य काल पूर्ण करब।भगवान श्रीराम अपन छोट भाई भरत के अपार प्रेम,समर्पण ,सेवाभाव और कर्त्तव्यपरायणता देखि क’ हुनका गला लगबैत छथिन। अपन चरण पादुका हुनका दैत छथिन संगही भरत के प्रेमपूर्ण आग्रह के मानैत 14 वर्षक अवधि पूरा भेला पर वापस अयोध्या लौट आबै के वचन दैत छथिन। श्रीराम के चरणपादुका के सम्मान के संग माथ पर राखि दुखी मन सँ अयोध्या लेल प्रस्थान करैत छथि।भरत अयोध्या लौटैत जथि त’ प्रभु राम के चरण पादुका के राज्य के सिंहासन पर सुशोभित करैत छथि आर स्वयं श्रीराम के जेकां संन्यासी वस्त्र धारण क’ हुनके जेकां जीवन यापन करै के निश्चय करैत छथि।एहि प्रसंगक संदेश अछि – भ्रातृत्व प्रेम,एतऽ भगवान रामक आचरण सँ हुनकर उत्तम चरित्र और वचन बद्धता के प्रेरणा भेटैत अछि।ई कथा भरत के अपन भाई के प्रति अपार प्रेम,समर्पण, सेवाभाव के ज्ञान करबैत अछि।संग ही संग हुनकर कर्तव्य परायणता के सेहो उजागर करैत अछि।