“समाजमे अपन सामर्थक अनुसारे काज-तिहार करब आवश्यक”

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— आभा झा।         

अपन मिथिला में विवाह, उपनयन,मुड़न हो या मृत्युभोज सब में लोक के देखौंस करै के आदत भ ‘ गेल छैक। विवाह एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रथा अछि, हिंदू धर्म के अनुसार विवाह गृहस्थ आश्रमक नींव अछि।पति- पत्नी के अहि नव जीवन के सामाजिक मान्यता देबय लेल विवाह के एक उत्सव जेकां मनाओल जाइत छैक। उपनयन संस्कार,मुड़न,या मृत्युभोज में सेहो लोक अलेल खर्च करैत छथि।फलना बाबू त ‘ एहेन भोज देलखिन थइथइ क’ देलखिन। समाजक दवाब में सेहो लोक सब आबि जाइत छथि।विवाह समारोह में सेहो लड़का पक्ष हो या लड़की पक्ष दुनू खाली सिनेमा के देखौंस करैत छथि। विवाह सँ पहिने प्री वेडिंग शूट होइत छनि।जाहि में लाखों-लाख खर्च क ‘दैत छथि।मेंहदी, हल्दी,रिंग सेरेमनी सब हेबाक चाही।ई सब खर्चे के घर छैक ने।हर कोई अंबानी जेकां अमीर त ‘ नहि अछि जे शाही विवाह क ‘सकै।एहि समारोह सब में लोक अपन हैसियत सँ ऊपर खर्च क’ दैत छथि, चाहे हुनका कर्ज कियैक नहि लेबय पड़ेन।स्टेटस के चक्कर में लोक अपन परंपरा संस्कृति के बिसरने जा रहल छथि।जाहि समाज के ओ अपन स्टेटस देखा रहल छथि ओहि में 90% तमाशगीन रहैत छथि।जे ई देखि क ‘ खुश नहि होइत छथि बल्कि उल्टा अंदरे अंदर जरैत छथि।विवाह में धूम -धड़ाका ,आतिशबाजी और कतेक ठाम त ‘ गोलीबारी सेहो होइत छैक। कतेक बेर लोकक जान सेहो चलि जाइत छैक। एकटा एहने मित्रक बरियाती में हमरो भाईजी गेल रहैथ। ओहिठाम बरियाती में बंदूक सँ गोली चलल छल।ओहि में हमर भाई जी आ हुनकर मित्र के पैर में गोली लागि गेलनि। हुनका सबके रक्सौल सँ पटना अस्पताल आनल गेल। ओतय दुनू के इलाज भेलनि। पैरक आॅपरेशन क’ गोली के छर्रा सब निकालल गेलनि।बुझू त ‘हुनकर सभक जान बांचि गेलनि।भाईजी के मित्र के नकली टांग लागल छनि।लोक एहि सब देखौंस के चलते लोक के जान के चिंता सेहो नहिं करैत छथि।खुशी के माहौल मातम में बदलि जाइत छैक। एक दिस हम दहेजक विरोध करैत छी ,जेकरा कारण बहुतो माता-पिता नहिं चाहैत छथि हुनका ओतऽ धियाक जन्म होइन।भ्रूण हत्या के सब सँ पैघ कारण ई दहेज थिक।विवाह आरो संस्कारक आयोजन में अतिथि के संख्या सेहो निर्धारित हेबाक चाही।एहेन आयोजन में लोक खेनाइ के सेहो खूब बर्बादी करैत छथि। ततेक खेनाइ बर्बाद होइत छैक जेकरा सँ अहाँ कोनो गरीबक पेट भरि सकैत छी।लोक के लगैत छनि जे जतेक बेसी खर्च करब, जतेक बेसी दिखावा करब,विवाह या कोनो काज तिहार में ओतेक नीक मानल जायत।एकरा गलतफहमी के अलावा आर कि कहल जा सकैत अछि।जकरा लग पाइ छइ ओ त ‘ खर्च करत मुदा जकरा लग पाइ नहिं छइ ओकरा लेल बड्ड कठिन भ ‘ जाइत छैक। ओकरो सँ ओतबे मांग होइत छैक। सबहक स्वागत ठीक सँ हेबाक चाही।आखिर ई ठीक के परिभाषा कि होइ छइ।जतेक करू कमे बुझाइत छनि।आब त ‘भोज-भात में चाट-पकौड़ी ,तरह-तरह के पेय,फल ,पंजाबी,
बंगाली, मुगलई, मांसाहारी ,शाकाहारी पश्चिमी देशक आदि के खाना विवाह में परसल जाइत छैक। एहि समारोह सब में पाइ
सोचि- समझि क ‘ खर्च कैल जाय त’ एहि बांचल पाइ के इस्तेमाल कोनो आन उपयोगी काज में लगाओल जा सकैत अछि।अगर अहाँ के पाइ अछि त ‘ आवश्यकतानुसार ही खर्च करू और फिजूलखर्ची करै सँ बचू। ओहि बचत के अहाँ निर्धन कन्या कोष में द ‘सकैत छी।जाहि सँ कोनो गरीबक बेटी के मदद सेहो भ ‘जायत। हमर माननाइ अछि कि विवाह,
उपनयन या मुड़न एक धार्मिक संस्कार अछि दिखावा करै के माध्यम नहीं। जय मिथिला जय मैथिली।🙏🙏
आभा झा ( गाजियाबाद)