“देखसी में बाबा बेलबटम पहिरलाह”

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— कृति नारायण झा।             

“देखसी में बाबा बेलबटम पहिरला। ने घर के रहला आ ने घाट के रहला।।” अपना सभक ओहिठाम केर ई एकटा प्रसिद्ध फकरा छैक। हमरा लोकनि आब गाम मे अनुभव कऽ रहल छी जे गामक छोटो छीन भोज में रसगुल्ला तऽ हेबे टा करैत छैक। हमरा ओहिठाम एकटा काज छलैक तऽ पढल लिखल परिवारक हिसाबे हमरा लोकनि निर्णय कयलहुँ जे भोज में भात दालि तरकारी बरी आ एक रत्ती कऽ दही दऽ कऽ ब्राम्हण भोजन भऽ जाएत। सभटा बजट सेहो ओही हिसाबे निर्धारित भऽ गेलै। एहि बात केर सूचना केना ने केना हमर पितियौत भाई साहेब श्री देबन भाई, जिनका हमरा लोकनि गामक माइनजन बनाओने छियन्हि, हुनका भेटि गेलैन्ह।८० सालक हमर देवन भाई बेंत हाथ में लेने दरबज्जापर धमकि गेलाह आ अप्पन महाभारत के पाठ आरम्भ कयलनि जे तू सभ हमर नाक कटा देबऽ। ज्योतिषि कक्का के गाम मे जे इज्जत छैन्ह से सभटा माटि मे मिलि जेतैन्ह। एं हओ। दुखिया मलाह सँ तोरा सभकेँ कम औकादि छह जे ओकर बेटा अपन बापक श्राद्ध में पूरा गाम के रसगुल्ला खुआ कऽ धमगिज्जर मचा देने छलैक आ गौंवाँ तोरा घर मे भात दालि खयबाक लेल अओतह? भाई साहेब केर अजीबो-गरीब तर्क सुनि हमरा लोकनि निरुत्तर भऽ गेल रही। घरक स्त्रीगण सभ सेहो हमर भाई साहेब के अनमोल तर्क सँ प्रभावित भऽ गेल छलीह तेँ हमर देबन भाई के आदेश के अक्षरसः पालन कयल गेल आ हमरा लोकनि जे बजट बनाओने रही ओकर दुगुना खर्च भेल। हमरा लोकनि मोन मसोँसि कऽ रहि गेलहुँ मुदा आर्थिक स्थिति सबल होयवाक कारणे हम सभ कोनहुना बर्दास्त कऽ लेलहुँ। मुदा गामक टुनटुन काका साकीन भऽ गेलाह तीन टा बेटी के बियाह करएवा में आ गामक हमर देबन भाई सभ सन ग्रामीणक बजटवेत्ता सभक बात में आबि कऽ। अपना सभक ओहिठाम एकटा प्रसिद्ध कहावत छैक जे “जे भोज नहि करय ओ दालि बड्ड सुरकय” सएह स्थिति छलैक गामक लोक सभक जे अप्पन बेटी के बिवाह सौराठ सभागाछी सँ करवैत छलाह पाँच टा बरियाती केर संग आ टुनटुन काका के बेटी के बिवाह में १०१ बरियाती ओहो तीनसंझू। माछ, माँस आ रसगुल्ला….. “अनकर धन पाबी तऽ सत्तरि मोन तौलाबी “टुनटुन काका के ५ बीघा जमीन करीब सभटा बिका गेलैन्ह। आई हुनकर स्थिति देखि तामस सेहो उठैत अछि आ दया सेहो लगैत अछि जे देखसी करवाक दुष्परिणाम कतेक भयावह होइत छैक। देखसी करवाक चाही मुदा नीक चीज के। धिया पूता के नीक सँ नीक शिक्षा देवाक देखसी करवाक चाही ।सभ केर संग प्रेम सँ मिलि जुलि कऽ रहवाक देखसी करवाक चाही ।अपन औकादि कखनो नहिं बिसरवाक चाही नहिं तऽ वेएह हेएत जे “खंजनी चललन्हि बगरा के चालि तऽ अपनो चालि बिसरली ” जय मिथिला जय मैथिली 🙏