दहेजक आगि के धाह”

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— मंजूषा झा।             

किछू बरस पहिने के बात छियै । गाम क एक सूखितगर किसान ब्रामहन छलैथ ।ओहि ज़माना क कोलेज तक पढ़ल लिखल सर्वगुनी व्यक्ति छलाह । गाम भरि मे दबदबा या नीक लोक क धाख बनल छलनि ।
सौ टका खरा , सच्चा व्यक्तित्वक धनी रहथिन । गामक राजनीति आ तनातनी सँ कोसो दूर । बिन पंचैति मे गेने हुनकर उचित सलाह क रुपे देल फ़ैसला अकाट्य रहय छलनि अपन सँ आन गाम धरि । चेहरा मुहरा आ स्वभाव अति ओजस्वी छलनि ।
परंतु ई दहेज क लालच व विकट आ बेकार समस्या तँ अपन देश आ समाज के कतहु के नहि रहय देलक । एहन जे ओजस्वी छलाह ओहो अहि धधरा सँ नहि बचि सकलाह । हुनकर एकटा भातिज बड्ड पैघ ईंजीनियर क पढ़ाई केलकनि । तहिया बीटेक क’ पढ़ाई परोपट्टा मे एके दुइए लोक क पाबै । तें हुनका पर घटक क बाढ़ि आबि गेलै सैह बुझु । आ तखन गृहस्तक लेल पढ़ेबाक खर्च बड्ड महग बुझना जाई छलै । तँ जखने कोनो घटक आबय तँ अपन भातिज क़ भला सोचैत आ अपन पैघ भाईक लेल मदतक रुपे ओहो धरद’ पहुँच जाथि । कते एला – गेला । अंतोगत्वा एक ठाम ब्याह तय भ गेल 51000 रुपैया पर । एकहि दिन शगुन आ ब्याह दुनू हेबाक निश्चित भेल छल । पहिले गछी क ब्याह भ जाई । पर ई तँ वर के काका बड्ड अग्रचेती , अड़ी गेलाह जे पहिले पाई दियौ तखने वर बरयाती जैत । आब तँ माहौल शनाशनी सन भ गेल । जेना तेना पाईक’ पूरबैत वरक़’ ल गेला आ ब्याह भेल । परंतु अहि क़समकस मे हिनका बरियाती भोजन मे बहुत अपमानित केलकनि संगहि सब बरियाती के गोबर लक स्वागत केलकनि । सब एके दुइए घंटा मे बपहारि काटिके भागल आबि गेल । आनक ख़ातिर अपन मान घटाओलनी । सभक आँखिक काँट बनला । आ एके दुइये वर्षक बाद अपन बेटी क विवाह मे अपनो संग वैह सब प्रक्रिया दोहरेलनि । आ आगु बेटी संग एतेक ख़राब व्यवहार भेलनि जे अपना आँखि सँ नोर नै सुखय छलनि ।
तें कहय छै नै ज़ेहन करब तेहन भरब । सब व्यक्तित्व विना स्वार्थ क’ अनेरो आन लेल धूमिल भेल । ई दहेजक आगिक धाह किनको बेदाग़ नहि छोड़त । सब कियो चेतु । सभक संतान समान अछि । अपन संतान के भलाई अपने हाथ मे अछि । बेटा बेटी के समान दर्जा दैत तराज़ू के दुनू पलड़ा पर बराबरि राखू । ओ दुनू पक्ष एके भ गेल आ ई बकलेल बनि गेला ।

——— मंजूषा झा_✍🏻