“शिक्षा के कोनो विकल्प नै”

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— किरण झा।               

मोहन बाबू गांव के प्रतिष्ठित व्यक्ति छलाह, हुनका एक टा बेटा दु टा बेटी छलैन्ह, हुनकर घर में खूब दबदबा रहेन, मुदा बेटी के शिक्षा देब में उदासीन रहैत, कंचन घर के काज में खुब निपुन छलि, मगर विधात हुनका रंग रूप सेहो कंजूसी देने,माय कंचन के बहुत मानय छलिह। मोहन बाबू मोट दहेज गीन कंचन के विवाह केला, मुदा लडका के कंचन के छोट बहिन के देखैल गेल रहि जे बहुत सुन्दर छलीह। चतुर्थी दिन बर कंचन के देख झमा कऽ खसला और भागी गेल,घर में कन्ना रोहट भऽ गेल सभ कंचन के दोख देब लागल। कंचन ओऽ तऽ अपन भाग्य के दोष सेहो नइ द सकै छलिह, हुनकर भाग्य तऽ हुनकर पिता लिखने छला कंचन के अशिक्षित क।
मुदा पांच साल लागल दुरागमन होइ में,बर के गाड़ी और बहुत समान देल गेल, मुदा सासुर में नोकरानी सँ जादा हुनकर हेसियत नइ छला। एक दिन हुनकर पिता के खबर भेटल कंचन मरी गेलनि गेस पर भोजन बनाब काल नायलोन के साड़ी में आगी लागी गेल छल, हुनकर पिता कोट कचहरी सब केलैन मुदा आब कि, दहेज के दोष ककरा देता छे कंचन के निगलि गेल ,लेब वाला सँ जादा तऽ देब वाला दोषी थिक।
बेटी के शिक्षा नइ द दहेज के प्राथमिकता देलैन,,कि बेटा वाला खाली दोषी थिक, बेटी वाला कि दहेज के बढावा नइ देलैथ। एहन कतेक कंचन थिक जे दहेज के आगी में अखनो झूलसी रहल अछि।।

किरण झा।