“श्वेतवर्णी भवानी हे माँ शारदे”

120

— अखिलेश कुमार मिश्र।                   

सम्पूर्ण उत्तर भारत अगहन पुसक जाड़ सँ त्रस्त रहैत अछि। सभ बाट जोहैत रहैत अछि जे अहि जाड़ सँ कहिया मुक्ति भेंटत। तहन मकर संक्रान्ति कs सूर्य उत्तरायण में आबैत छैथि आ मौसमक रूप में परिवर्तन दृष्टिगोचर होबs लागैत अछि। तदुपरांत सूर्यक प्रकाश तेहो तेज होइत अछि आ गाछ-बृक्ष सभ पुष्पित मज्जर सँ शोभित भs जाइत अछि। ई प्राकृतिक परिवर्तन मनुष्य आ अन्य जीव-जन्तु के आह्लादित करैत अछि। माघ महीनाक शुक्ल पंचमी कs, जखन प्राकृतिक श्रृंगार शुरू, तीसी-सरसों कें फूल सँ बाध-बोन नीला-पीला, आमक मज्जर सँ सुशोभित आ मज्जरक सुगंध सँ सुगंधित सम्पूर्ण वातावरण रहैत अछि, ओहि दिन कें बसन्त पंचमी कहल गेल अछि। बसन्त पंचमी कs बसन्तक आगमनक आरम्भ सेहो कहल गेल अछि। ओना तs ऋतु हिसाबे हेमंत जे माघ फागुन आ तक्कर बाद बसन्त चैत-बैसाख होबाक चाही, मुदा अपना लोकनि बसन्त पंचमी सँ ही बसन्तक आगमन मानैत छी। अहि दिन माँ सरस्वतीक पूजा-आराधना सेहो धूम-धाम सँ करैत छी। प्रकृति के रंग के अनुसार ही परिधानक रंग सेहो, तs पीयर वस्त्र पहिरs के परम्परा सेहो अछि। ई रंग मनभावन संग मन-मष्तिष्क में नव ऊर्जाक सृजन करैत अछि।
विद्या के देवी माँ सरस्वतीक विशेष पूजा अर्चना करs के दिन रहैत अछि।
उत्तर भारत के निवासी के जिनगी में बसन्त पंचमी कें बहुत महत्व अछि। जतेक रब्बी फसल अछि से फूल सँ भरि परागणक स्थिति में रहैत अछि। कृषि कार्य के लेल ई क्षण कनि विरामक होइत अछि। तs कृषक सभ कें कनि उत्सव मनेबाक अवसर भेटैत छैन्ह ताहि पर सँ मनोहर वातावरण सेहो रहैत अछि तs अहि उत्साह में आर वृद्धि भs जाइत अछि। अझुके दिन सिखक दसम आ अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी कें विवाह भेल रहैन्ह। तs दिल्ली सभ में लोक सभ बिना कुनो मुहूर्त-लग्न कें विचार केने अहि दिन विवाह करैत छैथि। ओना मिथिलांचल में सेहो विवाह, द्विरागमन आ उपनयन संस्कार के लेल वसन्त पंचमी के दिन शुभ मानल गेल अछि।
माँ सरस्वतीक संग सरस्वती पुत्र सूर्यकान्त त्रिपाठी निरालाजीक जन्मोत्सव सेहो बसन्त पंचमी कs ही मनाओल जाइत अछि। अझुके दिनक पृथ्वीराज चौहान मुहम्मद गोरी के बाण मारि अप्पन जिनगीक अंत केने रहैथि।