” पूस के खरमास कहबाक पाछू की कारण…”

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– आभा झा।                         

हिंदू धर्म में खरमासक विशेष महत्व मानल गेल अछि।हर वर्ष मार्गशीर्ष और पौष मासक बीच में खरमास लगैत अछि।सनातनी परंपरा में खरमास के खराब मास, शुभ काजक लेल अनुचित समय मानल जाइत छैक। एक मासक एहि विशेष अवधि में समय प्रतिकूल होइत अछि और सब मांगलिक ग्रह-नक्षत्रक धरती सं दूरी रहैत अछि,ताहि लेल शुभ कार्य अहि दौरान नहीं कयल जाइत छैक। खरमास के मलमासक नाम सं सेहो जानल जाइत अछि।खरमासक अवधि एक मासक होइत छैक। खरमास में धार्मिक कार्य करय सं जीवन में आबय वाला कष्ट सं मुक्ति भेटैत अछि।खरमास के भगवान विष्णुक प्रिय मास कहल गेल अछि।खरमासक समय भगवान सूर्यनारायण दक्षिणायन होइत छथि।अहि समय शुभ काज भले नहिं होइत छैक,मुदा तीर्थयात्रा,दान-पुण्य,हवन-जाप आदि काज कयल जा सकैत अछि।तीर्थयात्रा और भगवान विष्णुक पूजाक लेल ई मास के काफी उत्तम मानल गेल अछि।दक्षिणायन के आखिरी मास ही खरमास होइत छैक। एकर बादे सूर्यदेव उत्तरायणक लेल जाइत छथि।खरमास में मांगलिक कार्य,विवाह,और यज्ञोपवीत काज नहिं कयल जाइत छैक। खरमास में भगवानक उपासना और भजन केला सं मानसिक शांति प्राप्त होइत छैक। मान्यता अछि कि सूर्यदेव जखनो देवगुरु बृहस्पतिक राशि पर भ्रमण करैत छैथ,तऽ मनुष्यक लेल नीक नहिं मानल जाइत छैक। एहेन में हुनकर सूर्य कमजोर भऽ जाइत छैन और हुनका मलीन (कमजोर)मानल जाइत अछि।सूर्यक मलीन भेलाक कारण अहि मास के मलमास सेहो कहल गेल अछि।सूर्यदेव ऊर्जा और प्रकाशक देवता छथि ,जिनका सं धरती पर जीवन चलायमान अछि। मिथिला में खरमासक विशेष परंपरा छैक। अपन मिथिला में बच्चाक जन्मक एक सालक अंदर पूसैठ होइत छैक। पूसैठ में बगिया सँ बच्चाक गाल,हाथ,पैर सेकल जाइत छैक। अहि मास मेंबगिया ,तीसी सजमनि,खेसारी के साग ,तिलवा ,चुलौर,नबका धानक चाउरक खीचैड़ तिला संक्रान्ति में बनबे टा करत।खरमासक मास में कियो व्यक्ति नीक आस्था और श्रद्धा के संग दान पुण्य करैत अछि तऽ हुनका कतेको फल प्राप्त होइत अछि।खरमास के खर माह कहय के पाछू पौराणिक कथा अछि।खरक तात्पर्य गधा सं अछि।मार्कण्डेय पुराणक अनुसार सूर्य अपन सात घोड़ाक सहारे अहि सृष्टिक यात्रा करैत छथि।परिक्रमाक दौरान सूर्य के एक क्षण भी रूकै और धीमा होइ के अधिकार नहिं छैन। लेकिन अनवरत यात्राक कारण सूर्य के सातों घोड़ा हेमंत ऋतु में थाकि कऽ एक पोखरिक कात रूकि जाइत छैक,ताकि पइन पीबि सकै।सूर्य के अपन दायित्वक बोध मोन पड़ि जाइत छैन कि ओ रूकि नहिं सकैत छथि,चाहे घोड़ा थाकि कऽ भले ही रूकि जाय।यात्रा के अनवरत जारी राखय के लेल तथा सृष्टि पर संकट नहीं आबय,ताहि दुवारे भगवान भास्कर पोखरि के समीप ठाढ़ भऽ दू गधाक रथ में जोति कऽ यात्रा के जारी रखैत छथि।गधा अपन मंद गति सं पूरा पौष मास में ब्रह्मांडक यात्रा करैत रहल ,अहि कारण सूर्यक तेज बहुत कमजोर भऽ धरती पर प्रकट होइत छैक। मकर संक्रांतिक दिन पुनः सूर्यदेव अपन घोड़ाक रथ मं जोतैत छथि,तखन हुनकर यात्रा पुनः रफ्तार पकड़ि लैत अछि।एकर बाद धरती पर सूर्यक तेजोमय प्रकाश बढ़य लागैत अछि।
जय मिथिला जय जानकी 🙏🙏