“भक्त और भगवान”

106

– कृति नारायण झा।                 

“कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ।दुखहि जनम लेल दुख हि गबाओल सुख सपनहुं नहिं भेल” महाकवि विद्यापति केर एहि लोकप्रिय रचना में भक्त द्वारा अपन करूण ब्यथा केर वर्णन एहि रूप सँ कयल गेल अछि जकरा सुनलाक बाद एक आम भक्त के अपन भगवान के प्रति संवेदना एवं विश्वास के पूर्णरूपेण परिलक्षित करैत अछि। भक्त के अपन ब्यथा एकमात्र अपन आराध्य देव सँ कहवाक लेल प्रेरित करैत अछि एकर सभ सँ पैघ कारण एकटा भक्त के अपन भगवान पर आस्था एवं विश्वास केर द्योतक मानल जा सकैत अछि। महाकवि विद्यापति केर रचना में भक्ति रस केर अतिरिक्त श्रृंगार रस के सेहो बहुत बेसी स्थान देल गेल अछि यथा “कामिनी करू स्नाने” आओर” कुंज भवन सँ निकसल रे रोकल गिरिधारी” इत्यादि जाहि में श्रृंगार रस के उपयोग करवा में महाकवि द्वारा कोनो कंजूसी नहिं कयल गेल अछि ।अपन आराध्य देव महादेव के अतिरिक्त भगवान श्री कृष्ण के सम्बोधित “माधव कते तोरा करब बङाई। उपमा तोहर करब ककरा हम कहितहुं अधिक लजाई” एहि रचना मे विद्यापति के भक्ति के समुद्र में एहन कोनो बस्तु देखाइत नहिं छैन्ह जाहि सँ ओ भगवान केर उपमा कय सकैथि। भक्ति रस के सम्बन्ध में त महाकवि केर लेखनी में जेना समुद्र में हिलकोर मारैत अछि सएह स्थिति दृष्टिगोचर होइत अछि। भक्ति रस में महादेव केर अतिरिक्त जगत जननी जगदम्बा केर विषय में बहुत बेसी रचना कयल गेल अछि यथा “जय जय भैरवि असुर भयावनी पशुपति भामिनि माया। सहज सुमति बर दियअ हे गोसाओनी अनुगति गति तुअ पाया” आओर “सिंह पर एक कमल राजित ताहि उपर भगवती” इत्यादि अनेकों सशक्त रचना महाकवि द्वारा कयल गेल अछि। आम मिथिला वासी के विद्यापति केर बारे में आम धारणा छैन्ह जे महाकवि महादेव केर खांटी भक्त छलाह मुदा ई सत्य नहिं अछि। परिस्थिति केर अनुकूल महाकवि अपन रचना करैत गेलाह। महादेव के नचारी शब्द अबितहिं विद्यापति के नाम अपनहि आप मुंह में आबि जाइत अछि अर्थात नचारी शब्द विद्यापति केर रचना के पर्यायवाची बनि गेल अछि। विरह वेदना केर रस महाकवि केर रचना में प्रचुर मात्रा में पाओल जाइत अछि। उगना जखन महाकवि के छोङि क कैलाश चलि गेल रहैथि तखन जंगले जंगल विक्षिप्त अवस्था में खसैत पङैत आ जंगल केर गाछ बृक्ष सँ पूछैत ओ रचना अद्वितीय अछि “उगना रे मोरा कतय गेलाह कतय गेलाह शिव किदहु भेलाह… जे मोरा कहता उगना उदेश तिनका देवैन हम कंगना संदेश”! भक्त आओर भगवान केर एहन सम्बन्ध विद्यापति केर अतिरिक्त आओर कोनो रचना में एतेक सशक्त रूप सँ प्रस्तुत नहिं कयल गेल अछि ।महादेव आओर उगना केर प्रसंग केर चर्चा मैथिली केर प्रख्यात एवं लव्ध प्रतिष्ठित विद्वान प्रोफेसर ईशनाथ झा केर लिखल” उगना “नाटक में अत्यंत सरल आओर मनभावन शैली में उल्लेखित कयल गेल अछि। एक दिस महाकवि विद्यापति केर बहुमुखी प्रतिभा आओर दोसर दिस प्रोफेसर ईशनाथ झा केर लिखवाक शैली एकटा अत्यन्त रोचकता केर वातावरण के आओर अधिक भक्तिमय बातावरण में परिणत कय दैत अछि। जय मिथिला जय मैथिली ।जय महादेव आ जय महाकवि विद्यापति 🙏🙏🙏