“मिथिलाक कोहबर आ ओहि के महत्त्व”

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— रेखा झा।                       

अपन मिथिला में विवाह आ दुरागमन दुनुमे सब ठाम कोबर लिखल जाइते टा अछि।
इ लिखबाक लेल पहिने त पिठार आ ओहि में किछु कच्चा रंग मिला क चित्रकारी दिवालक भित्ती पर होईत छल जे कालांतर मे तरह तरह के आधुनिक रंग स होबय लागल आ पहिने स बेसी समृद्ध , सुंदर भ अपन छटा बिखेर रहल अछि।
कोबर कला लिखबाक सबस पैघ कारण अछि नवदंपती के सांकेतिक भाषा में गह्स्थाश्रम में प्रवेश के जानकारी देनाई ।
कोबर के चित्रकारी में जे लिखल जाइत अछि ओ एहि तरहें भेलः-
बांस -बांस वंशवृद्धि आ पुरूष जननांग के प्रतीक मानल गेल,
पुरैन -पुरैन के पात बहुत तेजी स अपन आकार वृद्धि करैत अछि , स्त्री जननांग के प्रतीक
सूर्य -यश तेज के प्रतीक
चंद्रमा-शीतलता के प्रतीक,
नवग्रह-वास्तु दोष स मुक्ति के प्रतीक
कमल-विपरित परिस्थिति में लक्ष्य के प्रतीक
सुग्गा मैना-प्रेम के प्रतीक
पटिया-नवदंपति के समागम के प्रतीक,
माछ-तेजी स प्रजनन के प्रतीक, बुद्धि के प्रतीक
कछुआ-दीर्घायु के प्रतीक,
केलाक गाछ-तेजी स फलदायी वृक्ष के प्रतीक,
लत्ती फूल -हरियाली आ सुगंध के प्रतीक।
युगल जोडी-नवदंपति के प्रतीक
हाथी-ऐशर्व्य के प्रतीक
गौरी शंकर-संसार के सबस सुंदर सुखद दांपत्य के प्रतीक,
कोबर में इ सब आकृति विशेष रूप स महत्व देल रचैत जाइत अछि।
नवदंपति के मंगलकामना लेल आ प्रकृति स समरूपता रखैत गृहस्थाश्रम के शुभारंभ कयल जाइ अहि लेल कोबर के चित्र सदा महत्वपूर्णं रहल।
इ कोबर के चित्रकारी एक कमरा जेकरा की कोहबर घर कहल जाइत अइ ओहि मे दीवाल पर या कपडा पर लिखी टांगल जाइत अछि।