“मोन पड़ैये’ अपन खरिहान”

323

रेखा झा।                               

बड्ड दिन पर गेलहुं गाम,सोचलहुं घूमब अपन खरिहान,
ओ मोन परै छल अपन खरिहान,
पुआरक टाल महिषक चारा, चारू कात अनाजक पसरल धारा,
नेना-भुटकाक जाहि मे बसल प्राण
मोन परै छल अपन खरिहान!
जखन विवाहक सुरमुर होइत छल
खरिहानक रूप और निखरै छल,
साजल बांस समियाना ओहिमे
बरियाती के आवभगत होइते छल,
सबहक लाज बसेने अपना मे
सबके राखै छल सम्मान
मोन परैया अपन खरिहान!
सोचैत सोचैत गाम पहुचलहुं,
देखलहुं जा क खेत खरिहान
छल उदासी चहुं दिस पसरल,
इ कोन ढंग केलक इंसान,
मोन परैया अपन खरिहान!
टुकड़ा टुकड़ा आरि स घेरल,
बहुते सीमा रेखा खींचल , बंटवारा
के हाल कहैत हक्कन कनैया
इ खरिहान,
मोन परैया अपन खरिहान!
आब खतम भेल जारनि काठी
नहि देखलहुं कतउ महिष उकाठी,
नहि लागल छल पुआर आ धान
कतय बिलायल ओ खरिहान,
मोन परैया अपन खरिहान!
उपजा बारी भेल बटैया,खरिहानक
दशा के केयो ने खेवैया,
बंटवारा के दंभ मे सब केयो
धरती के चीर देलक इंसान
बिलायल रूप हमर खरिहान
मोन परैया अपन खरिहान, !!