“प्रकृति प्रेमी : मिथिलावासी”

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अखिलेश कुमार मिश्रा।                   

मिथिलाक जे भौगोलिक स्थिति अछि से उत्तर हिमालय, दक्षिण गंगा, पूरब कोशी आ पश्चिम गंडक तक अछि। बीच कमला-बलान आ बागमती नदी सेहो अप्पन जल सँ अहि धरा कें सिंचित करैत छैथि। अर्थात ई क्षेत्र सदा प्राकीर्तिक रूप सँ परिपूर्ण रहल अछि। ई प्रकृति प्रेम एतुका हरेक पाबनि-तिहार में रचल बसल अछि। सभ पाबनि-तिहारक प्रकृति प्रेम के वर्णन संक्षेप में प्रस्तुत अछि। चैत महिनाक संक्रान्ति आ ओक्कर प्रातः जुड़ शीतल मनाओल जाइत अछि। अहि पाबनि में सभ पोखड़ि इनार के सफाई, गाछ वृक्ष कें जल सँ सिंचित केनाइ, धूल माटि सँ खेल केनाइ, माटिक बनल घैल दान केनाइ इत्यादि प्रकृति प्रेम के ही द्योतक अछि। रामनवमी आ हनुमान जयन्ती सेहो चैत में होइत अछि। अहि में भगवान राम आ बजरंगबली के जन्मोत्सव मनबैत छी। बैसाख में अक्षय तृतीया में सभ प्यासल आ अन्य के सरबत (गुड़ आ नेबो बाला) पिएनाइ। जेठ महिनाक अमावस्या कs बरसाइत मनाओल जाइत अछि। अहि पाबनि में वरक गाछ कें पूजा होइत अछि संगहि नाग-नागिन कें सेहो। पूजा में प्रयोग होब बाला बीऐन, गुड़, अंकुरित चना, आम आ घरेलू कपड़ा सँ निर्मित कनियाँ पूतरा सभ प्रकृति प्रेमक ही द्योतक अछि। आषाढ़ महीनाक अरदरा में पातरि हो अथवा देवशयनी एकादसी व्रत या आषाढ़ी पूर्णिमाक पूजा, साओन महीना में नाग पंचमी आ मधुश्रावणी में बिषहरि के पूजा पूर्ण रूपेण ही प्रकृति पूजा ही अछि। भादव महीना में जन्माष्टमी, कुशोत्पाटनी अमावस्या (विशेष क), चौरचन, राखी आदि में बिधि विधान सभ प्रकृति सँ जुड़ल ही पूजा अछि। आसिन महिनाक पितृपक्ष में पितर सभ कें याद केनाइ, जितया पाबनि आ माछ मड़ुआक भोजन, खैर तेल सँ झिमनी पात पर पूजन, दुर्गा पूजाक दसो दिनक माताक सविधि पूजा आ कोजगराक हरेक गति-बिधि तs प्रकृति प्रेम ही दरसाबैत अछि। दुर्गापूजा में सप्तमी/अष्टमी के राति में तs एक विशिष्ट पूजा व्यास (गीदड़) पूजन सेहो होइत अछि। अहि में माछ भात लs कs राति में व्यासजीक बीहरि सामने राखs पड़ैत अछि। अन्य पूजा में भगवतीक समक्ष काँच नारियल, कुमहर, कुसियार अन्य बलि पड़नाई, बेल निमंत्रण, बेलतोड़ी सभ तs प्रकृति स्नेह ही दरसावैत अछि। सभ पवित्र महीना कातिक में दियाबाती, गोवर्धन पूजा, भरदुतिया, महान पाबनि छैठि, देवउठनी एकादशी आ सामा चकेवाक पूजा, कतिकी पूर्णिमाक स्नान आदि एहेन बिधि अछि जे सिर्फ आ सिर्फ मिथिले में भेंटत। सभ पूजा तs प्रकृति प्रेम ही दर्शाबैत अछि। छैठि तs एहेन पाबनि अछि जाहि में साक्षात मूर्त भगवान भास्कर के आराधना कैल जाइत अछि। अहि पूजा के एक एक बिधि तs विलक्षण रूप सँ प्राकृतिक पूजा ही अछि। आगहन महीना में मिथिलांचल में धानकटी अप्पन चरम पर रहैत अछि अहि महिनाक विशेष पावनि नवान्न आ धात्री गाछक नीचा में ब्राम्हण भोजन अछि। पूस महीना में जाड़ बेसी रहक कारण कुनो विशेष पाबनि नै।माघ में तीला संक्रांति अछि जाहि में भोरे स्नान, तिल आ चुरा गुड़ सँ निर्मित लाई, उड़िद दालि बाला खिचड़ी समयानुकूल ही होइत अछि जे कि पूर्णतया प्रकृति सँ जुड़ल अछि। सरस्वती पूजा सेहो माघ में ही मनाओल जाइत अछि जाहि में पूजा अर्चना आ प्रसाद पूर्णतया प्रकृति पर ही निर्भर अछि। फागुन महीना में शिवरात्रि आ होलिका दहन मनाओल जाइत अछि। फगुआ चैत कृष्ण के प्रतिपदा क होइत अछि। देखल जाय तs मिथिलांचल के घरही तुलसी गाछक नियमित पूजा, पीपल गाछक पूजा, उपनयन संस्कार में मरबा बनेनाइ, माटि मंगल, आम मौह पूजन आ रातिम सभ त प्रकृति प्रेम ही देखबैत अछि। विवाह संस्कार सँ पहिने आम-मौह संगे पूजनाई सेहो ऐह थिक। मृत्य पर्यन्त सभ संस्कार तs प्रकृति प्रेम ही अछि। जतेक पेटिंग अछि सभ पूर्णतया प्राकीर्तिक रंग सँ ही बनाओल जाइत जे कि विश्वविख्यात अछि।