“वटसावित्री पूजा”

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अखिलेश कुमार मिश्रा।                   

🌹🌹🌹वट सावित्री व्रत🌹🌹🌹
परिचय एवम इतिहास- वट सावित्री मुख्य रूप सँ व्रत आ पूजा विधि के कहल गेल अछि जे कहिया सँ आरम्भ भेल ज्ञात नै। अहि पूजा के मिथिलांचल में बरसाईत कहल गेल अछि। ई व्रत-पूजा सधवा स्त्री के द्वारा जेठ महिनाक अमावस्या तिथि कs दिन में कैल जाइत अछि। वट सावित्री दू अलग अलग शब्द सँ बनल अछि। प्रथम शब्द वट, जेकर तात्पर्य वट वृक्ष सँ अछि आ दोसर शब्द सावित्री, जे सधवा स्त्री के सुहाग के प्रतीक मानल गेल अछि। ओना तs हरेक तीज-त्यौहार खुशी, सम्पन्नता आ आयु बढ़ाबs लेल मनैल जाइत अछि। मुदा ई व्रत-पूजा सधवा स्त्री सिर्फ आ सिर्फ अप्पन सुहाग के (पति के आयु बढ़े) लेल करै छैथि।
ई व्रत के करs के लेल जे कथा अछि जे मिथिलांचल में दू टा प्रचलित अछि। एक त पतिव्रता स्त्री सावित्री अप्पन हठ सँ यमराज के भी अप्पन नियम तोड़ लेल मजबूर कs देलैथि आ अप्पन मृत पति सत्यवान के आत्मा के यमराज सँ वापस आनि कs सत्यवान के नवजीवन देलैथि। चुकि ई घटना वट वृक्ष के नीचा ही घटल रहै तै ऐ दिन वट वृक्ष के ही पूजा होइत अछि। आ दोसर कथा नाग-नागिन आ ब्राम्हण-ब्राम्हणिक अछि। इहो कथा में स्त्री के हठ के आगा में नाग-नागिन के झुक पड़ै छैन्ह आ हुनका ओहि स्त्रीक सब जेठ सभ कें वापस कर पड़ैत छैन्ह। अहि नाग-नागिन के पूजा के विषहरि संग जोड़ी देल गेल अछि।
कहक मतलब जे अगर स्त्री अपना अगर पर उतरि जाइ छैथि तs देवी-देवता के सेहो मजबूर कs दै छैथि।
व्रत आ पूजा के विधि- अहि व्रत में सधवा स्त्री सभ पूजा सँ पहिले तक तs बिना जल आहार के व्रत, पूजा के बाद अनुना आ रात्रि में निराहार रहै छैथि। पूजा कर के लेल नव वस्त्र पहिर पूजा करै छैथि। अहि में नैवेद्य रूप में मुख्यतया अंकुरित चना, गुड़, मिठाई आदि चढ़ैल जाइत अछि। नव विवाहिता स्त्री जिनकर कि पहिल बेर बरसाईत रहै छैन्ह, विशेष ढंग सँ पूजा करै छैथि जाहि में वर गाछ के नीचा में माटि के बिषहरि सेहो बनेबै छैथि। पूजा के बाद गाछ के तीन फेरा धागा सँ बाँधि देल जाइत अछि। तक्कर बाद पाकल आम के साथ गाछ में जल ढारल जाइत अछि। आ तक्कर बाद बाँसक कमची सँ बनल बियैन सँ गाछ के हवा देल जाइत छैन्ह। सब सँ अंत में पूजनौती वट वृक्ष के एक पात तोड़ि अप्पन जुड़ा में बाँधि लै छैथि। घर आबि कs ओ अप्पन पति के प्रणाम क आशीर्वाद प्राप्त करै छैथि साथहि पति कें वैह बियैन सँ हवा सेहो करै छैथि। ततपश्चात किछु अन्न जल (अनुना) ग्रहण करै छैथि।
व्रत के महत्व: सभ व्रत त्यौहार के अप्पन अप्पन महत्व होइत अछि। ई व्रत केवल सधवा स्त्री के द्वारा अप्पन पतिक आयु के लेल कैल जाइत अछि। वट वृक्ष के नीचा त्रिदेव के वास मानल गेल अछि। अहुना प्राकृतिक रूप सँ देखल जै तs वट वृक्ष सभ सँ दीर्घजीवी होइत अछि। सभ सँ बेसी दूर तक साखा सभ पसरि जाइत अछि। तs ऐह बहाने अहि वृक्ष के पूजा होइत अछि आ वृक्ष के आयु हिसाबे ही पति के आयु के कामना आ साखा सभ के हिसाबे अप्पन वंश वृद्धि के कामना कैल जाइत अछि।
अन्य परम्परा: भारत के किछु भाग में वट सावित्री के पूजा जेठ महिनाक पूर्णिमा के होइत अछि। ओ पूजा मिथिलांचलक पूजा सँ बिल्कुल भिन्न होइत अछि।
धन्यवाद🙏🙏🙏🌹🌹🌹
नोट: शब्द के सँख्या निर्धारित भेलाक कारणे दुनू कथा नितान्त संक्षेप में कहल गेल।🙏