“टेमी- एकटा परिवार रूपी दीप के”

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– वंदना चौधरी।                                 

शीर्षक : टेमी ,
हम एकटा टेमी छि,जेकरा पहिने खूब क काटल जाइत छै,ताबे तक,जाबे तक ओ बंटबा के योग्य नै भ जाइत छै।

हम एक टेमी छि,जेकरा खूब क तरहथि पर रगड़ल जाइत छै,ओकर मुँह के मोचरल जाइत छै,ताबे तक,जाबे तक ओ दीप में अंटबा योग्य नहीं भ जाइत छै।

हम एक टेमी छि जेकरा खूब क तेल में भरी राइत भिजाओल जाइत छै,ताबे तक,जाबत ओ जरबा योग्य नहीं भ जाइत छै।

तखन ओकरा मुँह पर आगि लेस क जराओल जाइत छै,ताबे तक जाबत ओकर अस्तित्व नै मिटा जाइत छै।

लेकिन तैयो ई कहाँ कियो कहै छै,जे टेमी जरै छै,सब त बस एतबे कहै छै आ कहते जे कतेक सुंदर ई दीप जरै छै।