कि करय नवोदित मैथिली गायक-कलाकार, ब्रान्डिंग लेल कि उपाय?

विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

एखनहि न्युज फीडलाइन मे Madan Muskan जी केर किछु सवाल देखलहुँ – मुख्य रूप सँ ओ नव कलाकार केँ सेहो मौका देबाक लेल आयोजनकर्ता लोकनि सँ आग्रह कयलनि अछि। शिकायत सेहो छन्हि जे आखिर मैथिली मे गायन कयनिहार पाँचे गोटा छथि जे हर मंच पर हुनके सभ केँ मौका देल जाएत छन्हि… आदि। काफी रास लोक अपन-अपन विचार रखलैन एहि प्रश्न पर – बेसी रास ओहने जे अपना ओतय अधिक संख्या मे अछिः “जायज सवाल”, “वाजिब बात”, “सटीक प्रश्न”…. आदि। किछु लोक एहनो उत्तर देलखिन जेकरा अपना सब बिखपादी कहैत छियैक। एहेन लोकक सेहो कमी नहि। पहिल जे वाजिब बात कहि पोन झाड़ि अपन काज भेल से ९०%, ८% बिखपादी आ २% जायज समाधान लेल चिन्तन करैत सेहो देखेलाह। मैथिली भाषा, संस्कृति, साहित्य, लोककला, समाज, सौहार्द्रता आदि अनेकों विषय पर बड नजदीक सँ काज करैत किछु अनुभव प्राप्त कयलाक बाद हमर विचार कि अछि, अपना आप सँ पूछल आर फेर आत्माक आवाज संग मिलैत मोनक बात एतय राखय चाहबः
 
१. मैथिली-मिथिला कार्यक्रमक आयोजनक प्रकृतिः
अधिकांश कार्यक्रम कोनो न कोनो विषय पर होएत छैक। ओ विषय सामाजिक – सांस्कृतिक – आर्थिक आदि पक्षक पृष्ठपोषण करयवला होएत छैक। विशुद्ध सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन सेहो विभिन्न अवसर पर होएत देखैत छी, नाच-गाना-प्रहसन आदि। ईहो तय बात छैक जे भले अहाँ कवि गोष्ठी करू आ कि विचार गोष्ठी आ कि विद्वत् सभा – जँ आदि आ अन्त गीत सँ नहि करब त मिथिलाक लोकसंस्कारक विरुद्ध ओ अनायासे निरस सिद्ध होयत। तखन गीत गाबय लेल जे कलाकार औता से के? प्रश्न ई छैक – मदन मुस्कान जी केर उठाओल प्रश्न सेहो एतय यैह बुझाएछ। कार्यक्रम आयोजनक मुख्य विषय आ आयोजनकर्ताक सुविधा अनुरूप गीत गेबाक खानापूर्ति मे बजट सब सँ पैघ मुद्दा होएत छैक। ९९% कार्यक्रम सीमित बजट केर होएत छैक आर ओहो बजट अनुरूप कोष व्यवस्थापन मे छक्कल-बक्कल लगैत छैक तेकर खुलस्त चर्चा हम बेसीकाल लाइव वीडियो मार्फत करैत आयल छी। आयोजनक अगुआ सदिखन नुक्सान मे जाएत अछि। जे भार उठेलक, ओकरा अपना जेबी सँ १०-२० लगाबहे टा पड़ैत छैक। विरले कोनो कार्यक्रम मे कोषक व्यवस्था वांछित मात्रा सँ अधिक होएत हो, लेकिन अधिकांश कार्यक्रम मे ई संकलन राशि सँ अत्यधिक ऊपर होएत छैक। आर एहि कारण सँ आयोजक अपन सुविधा मुताबिक कम खर्च मे नीक गायक केँ करबाक व्यवस्था मे लागि जाएत छथि।
 
२. स्थापित गायक-कलाकार द्वारा खर्चाक मांग कम आ आयोजक संग आपेकता बेसीः
जे चलल कलाकार छथि, हुनकर खर्च कम छन्हि। जे नव छथि, हुनकर तामझाम अधिक छन्हि। जे महानगर मे पहुँचि गेल छथि, हुनकर बैन्ड अपना तरहें मंच तकैत अछि। मानि लियौ जे कुञ्जबिहारी मिश्र समान शीर्षस्थ गायक केर प्रोग्राम करबाक अछि, त हुनकर मांग अपन बजनिया आ सङ्गोरिया लेल भले भऽ जाय, अपना लेल आयोजकक विवेक पर छोड़ि दैत छथिन। हमरा बुझने हुनकर समय लेबा मे व्यवसायिक पक्ष अत्यल्प होएछ। तहिना पवन नारायण, राजनीति रंजन, नवीन मिश्र, रामसेवक ठाकुर, रामबाबू झा, आदि जतेक मधुबनी या दरभंगा या जनकपुर केन्द्रित गायक वा गायन समूह सब छथि ओ सब सहज उपलब्धताक गारंटी आयोजक केँ करैत छथिन। एतेक बजट व्यवस्था मे करय मे सहजता होएत छैक। लेकिन अहाँ कोनो कलाकार केँ दिल्ली सँ मिथिला बजायब, या दिल्ली सँ देशक अन्य भाग मे बजायब त अहाँ केँ गायक व गायन समूहक भाड़ा सहित विदाईक रकम सेहो पूर्ण व्यवसायिक ढंग सँ तय करय पड़त। ऊपर सऽ दिल्ली मे पहुँचल गायक लोकनि, हुनक समूह केर स्वागत आ सत्कार मे रहबाक, भोजन करबाक आ आरो कतेको प्रकारक सुविधा आदिक ख्याल राखब मानवीय पक्ष थिक – ओकरो भार आयोजक पर होएत छन्हि। तथापि, आइ दिल्ली सँ कलाकार लोकनिक मांग देशक विभिन्न भाग मे होएत छैक। मुदा दिल्लियो मे यदि अहाँ अपन ब्रान्डिंग ठीक सऽ नहि केने छी त समस्या उठबइये पड़त।
 
३. नव कलाकार केँ कतहु दिक्कत स्वाभाविकेः
नव कलाकारक प्रतिभा सँ परिचितिक माध्यम या त कोनो लोकप्रिय एल्बम् या फेर गायक केर अपन प्रयास सँ मंच तकबाक काज जरुरी होएछ। स्थापित समूहक संग किछु दिन काज करू, अपन प्रतिभा लोकमानस मे उजागर करू आर फेर देख लियौक जे खर्चा पड़ि जायत तर आ प्रतिभाक पूछ सब ठाम हेब्बे टा करत। अपन एकटा निश्चित कार्यक्षेत्र बनाकय आगू बढू – ताहि सँ अहाँक प्रस्तुति मे कि सब अछि आर कतेक खर्च मे अहाँ उपलब्ध हेबैक ई जनतब सब केँ भेट जेतैक। जखनहि ब्रान्ड चमका लेब, मांग बढि जायत। ब्रान्डिंग बहुत जरुरी छैक। एहि लेल सदिखन स्थापित कलाकार संग न्युनतम आय-मांग पर कार्य करब आवश्यक अछि।
 
४. फूहर-अश्लील गीत सभक मांग नहिः
मिथिला मे एकटा कहाबत बड़का-छोटका वला बड बेसी प्रचलित छैक। बड़का यानि विचार पैघ, छोटका यानि एखन धरि वैचारिक तुच्छता सँ ऊपर नहि उठि सकबाक स्थिति। बड़का लोकक बीच अश्लीलताक छुइतो नहि भेटत। छोटका लोकक बीच अश्लीलताक बाजार अछि। ओकरा सब केँ वैह चाही, खा ले तिरंगा फाड़-फाड़ के आ जा झार के। मतलब जे कलाकार केँ दुनू पक्षक पोषण करैत आगू बढय पड़त। फूहरता या अश्लीलता जाहि बाजार केर मांग छैक ओतय अहाँ विद्यापति या स्नेहलता आदिक गूढ-गंभीर गायन परसब त बुझि जाउ जे कतेक मांग होयत आर कतेक लोकप्रियता अहाँ कमायब।
 
५. अपन प्रचार अपनो सँ करब जरुरीः
संसारक हरेक भाग मे आइ प्रचार बिना ब्रान्डिंग संभव नहि भेलैक अछि। फेसबुक पर खाली पेज खोलि लेला सँ आ नामक आगाँ पाछाँ सिंगर आ कि डांसर आ कि रौकर जोड़ि लेला सँ अहाँक परिचिति ओतेक तीब्रता सँ लोकक बीच नहि पहुँचत जतेक कि कोनो प्रत्यक्ष आयोजन मे स्वतः संज्ञान सँ भाग लैत अपन प्रतिभा परसलाक बाद, या फेर अपन कृति प्रकाशित कय ओकरा विभिन्न रेडियो, एफएम आदि सँ बेर-बेर परसबाक काज केला सऽ।
 
अतः हमर ई सुझाव अछि जे सब सँ पहिने अहाँ सब एकटा अपन संगठन बनाउ। ताहि संगठनक विभिन्न प्रस्तुति सँ लोक केँ अवगत कराउ। ताहि मे ध्यान राखब जे छिपकिली रंग वला समूह जेना ‘मैथिली कला परिवार’ आदिक नाम पर सुनील पवन समान छींटखोपड़ी बुद्धि आ बिन बातहु केँ बतंगर बनेबाक बौद्धिकता सँ फेर किछुओ उपलब्धि नहि भेटत। जे करू यथार्थ काज करू आ ताहि अनुरूपे अपन बैन्ड – समूहक उचित प्रचार विभिन्न माध्यम सँ करैत अहाँ सब नव-नव कलाकार गायक हास्य प्रस्तोता आदि केँ केना समेटब से सोचैत अपन बाजार बनाउ। बाजार बनलाक बाद स्वतः मांग बढबे करतैक।
 
अस्तु!
 
विराटनगर चैप्टर ऊपर हम चर्चा नहि कयलहुँ। एतय रोहित कुमार यादव सन-सन नवोदित कलाकार होएक, मनोज भोले होएक आ कि कियो गीतकार होएक – बस एक परिचय आ प्रस्तुति सँ ओकरा मे एतेक ताकत भैर देल जाएत छैक जे जीवनक कोनो संघर्ष ओ अपन बल पर जरुर जीतैत अछि। एकर लाइव प्रस्तुति सेहो देखबैत आयल छी फेसबुक सँ, वीडियो उपलब्ध अछि। जरुर देखी। तहिना जँ विभिन्न आयोजक लोकनि अपन क्षेत्र मे उपस्थित कलाकार केँ मौका देबैक त निश्चित स्थिति मे सुधार होयत।
 
हरिः हरः!!