ॐ श्री परमात्मने नमः !!
॥ त्रयोदशोऽध्यायः ॥
अर्जुन उवाच ।
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ॥
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥१३-०॥*
अर्जुन कहलनि:
प्रकृति आर पुरुष, क्षेत्र आर क्षेत्रक ज्ञाता, ज्ञान, जे जनबाक चाही – से सब बात, हे केशव, हम जानय चाहैत छी ।
*ई श्लोक कतेको एडिशन मे हंटा देला गेल छैक ।
श्रीभगवानुवाच ।
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥१३-१॥
भगवान कहलनि:
हे कुंतीपुत्र, एहि शरीर केँ क्षेत्र कहैत छैक, आर जे ई जनैत अछि, ओकरा (क्षेत्र आ क्षेत्रज्ञ केँ) जानयवला लोक क्षेत्रज्ञ कहैत छथि ।
क्षेत्र: मतलब, खेत: शरीर केँ एना एहि लेल कहल जाइत छैक कियैक तँ कर्म सभक फल खेतहि जेकाँ अहु मे भेटैत छैक ।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥१३-२॥
हे भरतवंशी, अहाँ हमरहु सब क्षेत्र मे क्षेत्रज्ञे जानू । क्षेत्र आ क्षेत्रज्ञ केर ज्ञानहि टा हमरा द्वारा ज्ञान मानल गेल अछि ।
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ॥
स च यो यत्प्रभाव तत्समासेन मे शृणु ॥१३-३॥
क्षेत्र कि थिक, ओकर गुण कि थिक, ओकर रूप केर परिवर्तन कि थिक, कोन कारण सँ कि प्रभाव उत्पन्न होइत छैक, आर ओ के थिक तथा ओकर शक्ति कि सब छैक, से सबटा हमरा सँ संछेप मे सुनू ।
से: एहि सब खास पक्ष (विन्दु) मे क्षेत्र आर क्षेत्रज्ञ केर असली स्वभाव (प्रकृति) ।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ॥
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥१३-४॥
(एहि सत्य केँ) ऋषि लोकनि कतेको प्रकार सँ, अलग-अलग मंत्र मे, ब्रह्म सँ जुड़ल भाग मे, तर्क सँ भरल आ विश्वास दियाबय वला भाग मे गेलनि अछि ।
हमर नोट: ई चैप्टर हमरा सब केँ ई बुझय लेल एकटा बहुते आसान फिलॉसफी समझाबैत अछि जे हम सब के छी आ परमात्मा किनका कहैत छी । सबटा श्लोक पर खास ध्यान राखू ।
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ॥
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥१३-५॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ॥
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥१३-६॥
महान तत्व, अहंकार, बुद्धि, संगहि अव्यक्त (मूल प्रकृति), दस इंद्रिय आर एकटा (मन), आर इंद्रिय केर पांच विषय; इच्छा, घृणा, सुख, दुःख, सङ्घाता (समग्रता), बुद्धि, धैर्य – एहि तरहें क्षेत्र केँ ओकर बदलैत रूप केर संग संक्षेप मे कहल गेल अछि ।
सांख्य (दर्शन) केर ज्ञाता लोकनि पांचम श्लोक मे कहल गेल तत्व सब केँ चौबीस तत्व या सिद्धांत कहैत छथि ।
महान तत्व: महाभूत – समस्त विकार मे व्याप्त, यानी पदार्थ केर परिवर्तित रूप मे ।
कुल योग: सङ्घाता – शरीर आर इंद्रिय सभक सम्मिलन सँ प्राप्त योगफल । (सब किछु संयुक्त रूप मे – एग्रीगेट) ।
इच्छा तथा अन्य गुण जेकरा वैशेषिक (दर्शन) केर ज्ञाता लोकनि आत्माक भितरिया गुण कहैत छथि, तेकरा छठम श्लोक मे केवल क्षेत्र केर गुण कहल गेल अछि, नहि कि क्षेत्रज्ञ केर । एतय कहल गेल इच्छा तथा अन्य गुण, अंतःकर्ण या अंदरूनी ज्ञानेन्द्रिय केर समस्त गुण सब केँ देखबैत अछि – खाली मानसिक अबस्था सभक रूप मे । ताहि मे सँ हरेक चीज जनबा योग्य हेबाक कारण क्षेत्र थिक ।
क्षेत्र, जेकर अलग-अलग रूप सब केँ समग्र रूप सँ पहिलुक श्लोक मे “ई शरीर” कहल गेल छैक, एतय ओकर सबटा अलग-अलग रूप पर बात कयल गेल अछि, “महान तत्व” सँ लय केँ “धैर्य” तक मे ।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ॥
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥१३-७॥
विनम्रता, सादापन, केकरो चोट नहि पहुँचेनाय (अहिंसा), सहनशीलता, ईमानदारिता, गुरुक सेवा, पवित्रता, स्थिरता, स्वयं पर नियंत्रण;
गुरु (आचार्य): ओ छथि जे मोक्ष पेबाक तरीका सिखबैत छथि ।
पवित्रता: बाहरी आ अन्दरूनी । पहिल (बाहरी) पवित्रता मे पानि आदि सँ शरीरक गन्दगी केँ धोयब शामिल अछि, आर दोसर मे – मन केर पवित्रता – एहि मे इंद्रिय सभक विषय (सम्बन्धित) चीज सब मे खराबी केँ बुझनाय, आसक्ति व आन-आन इच्छा सभक गन्दगी केँ हंटेनाय शामिल अछि ।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ॥
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥१३-८॥
इंद्रिय सभक चीज केर त्याग, आर अहंकार केर नहि होयब; जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, बीमारी आ दर्द केर खराबी सब पर विचार करब (सोचब);
इंद्रिय सभक चीज: जेना देखल या बिनु देखल सुख दयवाली आवाज, स्पर्श आदि ।
दर्द: चाहे आध्यात्मिक हो, यानी स्वयं उत्पन्न होयवला हो; या आधिभौतिक हो, यानि बाहरी चीज सब सँ उत्पन्न होयवला हो, या आधिदैविक हो, यानि अलौकिक शक्ति सब सँ उत्पन्न होयवला हो ।
जन्म, मृत्यु… दर्द केर खराबी सब पर विचार करब (सोचब): या एहि वाक्यांशक अर्थ ई निकालल जा सकैत अछि – जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा आर बीमारी केर खराबी व दुःखादि पर विचार कयनाय । जन्म आदि सबटा दुःख छी, एहि लेल नहि जे ओ स्वयं मे दुःख छी, बल्कि एहि लेल जे ओ दुःख उत्पन्न करैत अछि । एना सोचला सँ इंद्रिय सँ जुड़ल सुख सभक प्रति विरक्ति (वैराग्य) उत्पन्न होइत अछि, तथा इंद्रिय सब ज्ञान प्राप्तिक लेल अन्तरतम आत्मा दिश मुड़ि जाइत अछि (रुख करैत अछि) ।
हमर नोट: कृपया एहि श्लोक सभक महत्व केँ बहुत ध्यान सँ बुझू आर ताहि अनुसार अपन जीवन जीबू ।
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ॥
नित्य च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥१३-९॥
अनासक्ति, बेटा, पत्नी, घर व बाकी चीज सब सँ स्वयं केँ नहि जोड़नाय (चिन्हनाय), आर नीक व बेजा चीज सभक रहलोपर सदिखन एक जेकाँ सोचनाय;
स्वयं केँ चिन्हनाय (आत्म-पहिचान, आत्मज्ञान): जेना कोनो लोक जेकरा संग जुड़ल अछि, तेकर खुशी या दुःखी भेलोपर स्वयं केँ खुश या दुःखी अनुभव करैत अछि, आर जे अपना कोनो खास लोकक जिन्दा आ मरि गेलापर स्वयं केँ जिन्दा या मृत भेल अनुभव करैत अछि ।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ॥
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥१३-१०॥
अनन्य योग (अपरिग्रह – अलग नहि होयवला भाव) द्वारा हमरा प्रति अविचल (अव्यभिचारिणी) भक्ति, पृथक स्थान सभक आश्रय, मानव समाज केर प्रति अरुचि;
पृथक स्थान सभक आश्रय: मन केर समता (समत्व भाव) वास्ते अनुकूल, जाहि सँ अपना आप (स्वयं केर आत्मा) पर निर्बाध ध्यान, आदि संभव भ’ सकय । (एकान्त आ शान्त – निर्जन क्षेत्र आदि ।)
मानव समाज: अज्ञानी आर अनुशासनहीन लोक केर, शुद्ध आर पवित्र लोक केर नहि, कियैक तँ बादवला (यानि शुद्ध आ पवित्र लोक सभक) संग संगति ज्ञान दिश लय जाइत अछि ।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ॥
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥१३-११॥
आध्यात्मिक ज्ञान पर लगातार ध्यान देनाय, सत्य ज्ञान केर लक्ष्य केँ बुझनाय; एकरा ज्ञान कहल गेल अछि, आर जे एकर विपरीत अछि ओ अज्ञान थिक ।
“विनम्रता” सँ लय केँ “सत्य ज्ञान केर लक्ष्य केँ बुझनाय” धरिक ई समस्त गुण केँ ज्ञान कहल गेल अछि, कियैक तँ यैह ज्ञान तक पहुँचबाक माध्यम थिक ।
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ॥
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥१३-१२॥
हम ओकर वर्णन करब जेकरा जानबाक रहैत अछि, जेकरा जनला सँ अमरता आ अनादि परम ब्रह्म प्राप्त होइत छथि । जिनकर नहि त सत् आ न असत् कहल जाइत छन्हि ।
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ॥
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१३-१३॥
हरेक जगह हाथ आ पैर, हरेक जगह आँखि, सिर आ मुंह, ब्रह्मांड मे हर जगह कान – ओ सब मे व्याप्त छथि ।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ॥
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥१३-१४॥
समस्त इंद्रिय केर कार्य सँ झलकयवला (अभरयवला, चमकयवला), तथापि इंद्रिय बिना; निरपेक्ष, तथापि सब केँ सम्हारनिहार (पालन-पोषण कयनिहार); गुणरहित, तथापि गुणक अनुभव करयवला (ओ ब्रह्म छथि) ।
बहिरन्तश्च भूतानामचर चरमेव च ॥
सूक्षमत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥१३-१५॥
(समस्त) प्राणीक संग आर ओकर भीतर; अचल (गतिहीन) आ चल (गतिशील) सेहो; अपन सूक्ष्मताक कारण समझ सँ दूर; ओ दूरो छथि आ लगो छथि ।
समझ सँ दूर: अज्ञानी लोक लेल, हालाँकि अपने आप मे जानय योग्य छथि ।
दूर: जखन अज्ञात छथि ।
पास: ज्ञानी लोक लेल, कियैक तँ ई हुनकर अपनहि स्वरूप छथि ।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ॥
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥१३-१६॥
अविभाज्य, तैयो प्राणी सब मे बंटल छथि; हिनका प्राणी (जीव) सभक पालन-पोषण कयनिहारक रूप मे जानल जाइत छन्हि; आर ओकरा सब केँ भक्षण करयवला (खा जायवला, ग्रास बनबयवला) तथा संगहि-संग उत्पन्न करयवला रूप मे सेहो जानल जाइत छन्हि ।
भक्षण: प्रलय केर समय (सब प्राणी केँ अपन ग्रास बनबयवला, भक्षण करयवला) ।
उत्पन्न: उत्पत्ति या ब्रह्मांड केर उत्पत्तिक समय (सब प्राणी सभक उत्पन्न करयवला) ।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ॥
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य धिष्ठितम् ॥१३-१७॥
प्रकाशहु केर प्रकाश, जिनका अन्धकार सँ उपर कहल जाइत छन्हि; ज्ञान, आ जानय योग्य एकमात्र चीज, समस्त ज्ञान केर अन्तिम लक्ष्य, जे सभक हृदय मे रहैत छथि ।
प्रकाशहु केर प्रकाश: सम्पूर्ण प्रकाश दयवाली चीज, जेना सूरज आदि, आर बुद्धि आदि केँ प्रकाशित करयवला (प्रकाशहु केर प्रकाश) । असल मे, ई बादवला (प्रकाशपुंज) सब तखनहि प्रकाशित होइछ जखन स्वयं केर चेतना (ब्रह्मचेतनाक) प्रकाश सँ प्रकाशित होइत अछि ।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ॥
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥१३-१८॥
एहि प्रकार सँ क्षेत्र, ज्ञान आर जे जनबा योग्य (ज्ञेय) छथि, से सबटा संक्षेप मे कहल गेल अछि । ई सबटा बुझिकय (जानिकय), हमर भक्त हमर स्थितिक योग्य भ’ जाइत छथि ।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ॥
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥१३-१९॥
ई जानि लिय’ जे प्रकृति आर पुरुष दुनू अनादि छथि; आर इहो जानि लिय’ जे समस्त परिवर्तन तथा गुण प्रकृति मात्र सँ उत्पन्न होइत अछि ।
परिवर्तन: विकार – बुद्धि सँ लयकेँ नीचाँ शरीर धरिक (विभिन्न रूप परिवर्तन सभक सन्दर्भ) ।
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ॥
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥१३-२०॥
शरीर आर इंद्रिय सभक निर्माण (बनय) मे प्रकृति केँ कारण कहल गेल अछि; सुख आर दुःख केर अनुभव मे पुरुष केँ कारण कहल गेल अछि ।
इंद्रिय: किछो बुझबाक लेल पांच इंद्रिय, पांच कर्म करयवाली इंद्रिय, मन, बुद्धि आ अहंकार ।
पुरुष: एतय जीव (आत्मा) केर अर्थ मे अछि ।
कार्य: प्रभाव, भौतिक शरीर ।
करण: इंद्रिय । किछु लोक लोक कारण पढ़ैत छथि, आर “कार्य व करण” केँ “प्रभाव आर कारण” केर रूप मे बुझबैत छथि ।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ॥
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥१३-२१॥
प्रकृति मे बैसल पुरुष, प्रकृति सँ उत्पन्न भेल गुण सब केँ अनुभव करैत छथि; नीक आ खराब गर्भ मे हुनकर जन्म केर कारण गुण सब सँ हुनक जुड़ाव छन्हि ।
मे बैसल: स्वयं केँ जेकरा संग चिन्हैत छथि ।
गुण: स्वयं केँ सुख, दुःख आ भ्रम केर रूप मे व्यक्त करैत अछि ।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ॥
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥१३-२२॥
आर एहि शरीर मे जे परम पुरुष छथि, हुनका देखयवला, स्वीकृति दयवला, सहारा दयवला, अनुभव करयवला, महान भगवान आर सबसँ ऊँच ‘स्व’ (परमात्मा) सेहो कहल जाइत छन्हि ।
देखयवला, स्वीकृति दयवला: ओ स्वयं शरीर केर अंग सब मे, मन आ बुद्धि केर काज सब मे भाग नहि लैत छथि, ओहि सँ बिल्कुल अलग हेबाक बादो, ओहि सब मे लागल बुझाइत छथि । आर देखयवला हेबाक नाते, ओ शरीर मे देखायवला प्रकृति केर काज सभक रास्ता मे कखनहुँ नहि अबैत छथि । वास्तव मे, जीवनक काज सब मे देखायवला सम्पूर्ण चेतना या बुद्धि, बस ओहि सर्वव्यापी, निरपेक्ष आ सम्पूर्ण बुद्धि – परमात्मे केर प्रतिविम्ब (झलक) थिक ।
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ॥
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥१३-२३॥
जे एहि तरहें पुरुष आर प्रकृति केर गुण सभक संग जनैत अछि, चाहे ओकर जीवन केहनो हो, ओ दोबारा जन्म नहि लैत अछि ।
चाहे ओकर जीवन केहनो हो, आदि: चाहे ओ तय अथवा मना कयल गेल कर्म सब मे लागल हो, ओ दोबारा जन्म नहि लैछ । कियैक तँ, सत्य केँ जानयवलाक कर्म, यानि दोबारा जन्म लयवला बीज, ज्ञान केर अग्नि सँ जरि जाइत छैक, आर तेँ ओ जन्म दयवला प्रभावी कारण नहि बनि सकैछ । ओकर मामिला मे ओ सिर्फ कर्मक झलक छी; उदाहरण लेल, एकटा जरि गेल कपड़ा, कपड़ाक काज नहि कय सकैत अछि ।
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ॥
अन्ये सांख्ये योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥१३-२४॥
किछु लोक ध्यान सँ, शुद्ध हृदय सँ अपन बुद्धि मे आत्मा केँ देखैत अछि, किछु ज्ञान केर मार्ग सँ, आर किछु लोक फेर कर्म-योग सँ (देखैत अछि) ।
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ॥
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥१३-२५॥
आन लोक सब एना नहियो जानैत, कियो आर लोक (दोसर लोक) सँ सुनल गेल बात मुताबिक पूजा (योग-साधना) करैत छथि । ई सब जेहो किछु सुनने रहैत छथि, तेकरे सर्वोच्च आश्रय (शरण) मानिकय मृत्युक (भवसागर) केर पार उतरि जाइत छथि ।
एना नहियो जानैत: उपर कहल गेल कतेको तरीका सब मे कोनो एकहु टा सँ स्वयं (अपन आत्मा) केँ नहि जानि पेनाय ।
कियो आर (दोसर लोक) सँ: आचार्य या आध्यात्मिक गुरु लोकनि सँ सुनिकय ।
मानिकयः श्रद्धाक संग अनुसरण कयकेँ ।
जेहो किछु ओ सुनने छथि: यानि, ओ पूर्णरूप सँ दोसरक निर्देश सब पर निर्भर रहैत छथि ।
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥१३-२६॥
हे भरतर्षभ, जेहो जीव उत्पन्न भेल अछि, चाहे ओ चल हो या अचल हो, ओकरा क्षेत्र आर क्षेत्रज्ञ केर मिलन मात्र सँ (उत्पन्न भेल) जानि लियह ।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञक मिलन: क्षेत्र आर क्षेत्रज्ञ, वस्तु आ विषय केर मिलन, आपसी अध्यास (भ्रम) जेकाँ होइत छैक, जाहि मे ओकर असली रूप मे अन्तर नहि हेबाक कारण ओ आर ओकर गुण एक-दोसराक संग मिश्रित (मिझरा) जाइत छैक । ई गलत ज्ञान (मिथ्या ज्ञान, अध्यास) तखन खत्म भ’ जाइत छैक जखन कियो क्षेत्र केँ क्षेत्रज्ञ सँ अलग कय पबैत अछि ।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ॥
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३-२७॥
वैह देखैत अछि जे परमप्रभु केँ देखैत अछि, जे समस्त प्राणी सब मे समान रूप सँ विद्यमान छथि, मरइयोवला मे अमर छथि ।
समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ॥
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥१३-२८॥
कियैक तँ ओ भगवान केँ हरेक जगह समान रूप सँ देखैत अछि, ताहि सँ ओ स्वयं (आत्मा) सँ स्वयं (परमात्मा) केँ नोकसानी नहि पहुँचाबैछ, आर एहि तरहें सबसँ ऊँच लक्ष्य (परमब्रह्म – परमपिता परमेश्वर) धरि पहुँचि जाइत अछि ।
ओ स्वयं सँ…. केँ नोकसानी नहि पहुँचाबैत अछि: जेना अन्जान आदमी या तँ दोसर लोक मे स्वयं (आत्मा) केँ नजरअंदाज कयकेँ (अविद्या या अज्ञानता), या गैर-आत्मा (भौतिक शरीर, आदि) केँ आत्मा मानिकय (मिथ्या-ज्ञान या झूठक ज्ञान) – एहि दुइ गोट पर्दा सँ आत्मा (स्वयं) केर सत्य रूप केँ नुका दैत अछि ।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ॥
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥१३-२९॥
वैह देखैत अछि, जे ई देखैछ जे सबटा काज मात्र प्रकृति टा करैत अछि आर परमात्मा बिना काज केँ रहैत छथि ।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ॥
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥१३-३०॥
जखन ओ एक (परमात्मा) मे निहित समस्त प्राणीक अलग-अलग अस्तित्व केँ देखैत अछि, आर असगर वैह (एक) सँ समस्त प्राणीक विस्तार भेल देखैत अछि, फेर ओ ब्रह्म बनि जाइत अछि ।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ॥
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥१३-३१॥
हे कुंतीक पुत्र, ई परमात्मा, जे बिना आरम्भ आर गुण सभक छथि, शरीर मे भेलाक बादो नहि तँ काज करैत छथि आ नहिये हुनका उपर असर (प्रभाव) पड़ैत छन्हि ।
आरम्भ होयब: जिनकर कोनो कारण नहि अछि ।
नहि तँ काज करैत छथि, नहिये हुनका पर असर (प्रभाव) पड़ैत छन्हि: चूँकि आत्मा कर्ता नहि छथि, ताहि द्वारे हुनका कर्मक फल सँ कोनो फर्क नहि पड़ैत छन्हि ।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ॥
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥१३-३२॥
जेना हरेक जगह मौजूद आकाश अपन सूक्ष्मताक कारण दूषित नहि होइछ, तेनाही शरीर मे हर जगह मौजूद आत्मा सेहो दूषित नहि होइछ ।
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ॥
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥१३-३३॥
जेना एक्के टा सूर्य एहि सम्पूर्ण जगत केँ प्रकाशित करैत अछि, तहिना ओ जे एहि क्षेत्र मे रहैत छथि, हे भरत केर वंशज, पूरे क्षेत्र केँ प्रकाशित करैत छथि ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ॥
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यन्ति ते परम् ॥१३-३४॥
जे लोक एहि तरहें ज्ञानक आँखि सँ क्षेत्र आ क्षेत्रज्ञक बीच केर अन्तर बुझि लैत अछि, आर जीव सभक प्रकृति सँ मुक्ति सेहो पाबि लैत अछि, ओ परमात्मा लग जाइत अछि ।
जीवक प्रकृति: अविद्याक कारण जीव केर भ्रम (मोह) या भौतिक स्वभाव ।
॥ इति क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥
The end of thirteenth chapter designated, The Discrimination of the Ksetra and the Ksetrajna.
हरिः हरः!!
