दृष्टिदोषः आँखि परका पट्टी

विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

आँखि परका पट्टी
 
लोक केँ लोक कहैत सुनैत होयब, “हौ! तोरा आँखि पर पट्टी लागल छह कि? ” यानि सच्चाई देखि नहि सकैत छह कि – यैह भाव रहैत छैक कोनो वक्ताक राखल पक्षपातपूर्ण या एकतर्फा विचार सुनिकय। महाभारतक धृतराष्ट्र एक एहेन पात्रक भूमिका कयलनि जे अपन पुत्रक मोह मे राज-काजक सब नियम बिसैरिकय पाण्डुपुत्र भातीज सभक हक नहि देबाक मौन समर्थन देलनि। आर महाभारतक काण्ड सब केँ बुझले अछि। कतबो मध्यस्थता आ न्याय लेल विदुर, भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य आदि अपन तर्क रखलाह – धृतराष्ट्र पर चढल पुत्र मोह आ ताहि सँ उत्पन्न अनुचित ममत्व जे हमरहि पुत्र राज भोगय ई स्थिति मे परिवर्तन नहि आयल। ओना ओ कतेको बेर एहि नीति आ न्याय केर वचन सब सुनि प्रभावित भऽ अपन पुत्र व हुनक समर्थक लोकनि सँ कनेक लचीलापन अनैत पाण्डव पाँचों भाइ सँ न्याय हेतु समझौता करबाक लेल विनीत संबोधन सेहो कयलन्हि, परञ्च सनकल पुत्र अपन अलगे दंभ मे चूर होयबाक कारण पिता वा पितामह वा कोनो न्यायकर्ताक केहनो विनती सुनबाक इच्छा नहि रखैत आखिरकार युद्धक मैदान सँ अपन हक लेबाक अन्तिम नीति अनुरूप न्याय देबाक वास्ते तैयार भेल। आर परिणाम सब केँ पता अछि – ईश्वरवाद केँ मानयवला त ओनाहू सत्यमेव जयते केर नारा केँ अंगीकार करैछ – जे नहियो आस्था रखैछ आ अपना केँ स्वविवेक अनुरूप मानव जीवन जिबैत रहबाक दृष्टान्त सँ एहि धराधाम मे रखैत अछि, ओहो धृतराष्ट्रक आँखिक पट्टीक बारे मे अपन तर्क सहजहि राखैत हुनक पक्षपात आ पुत्रमोहक गाथा अवश्ये टा कहता।
 
एक गोट दृष्टान्त आधुनिक लोकाचार सँ लेल गेल कथा मे बड चुटकुलादार भेटैत अछि। एक गोट चरबाहा हरियरका चश्मा पहिरिकय घास काटय लेल गेल आ सब सुखायल-पीरायल घास केँ हरियरे-हरियर देखि काटि आनलक। गाय केँ खाय लेल देलक। गाय ओहि मे हरियरीक कमी देखि खेबा सँ अनिच्छा प्रकट केलक। कनेकाल मे चरबाहा केँ अपन दृष्टिदोष बारे पता चलल आर कारक ओ हरियरका चश्मा थिक से बुझि वैह चश्मा ओ गाइयो केँ पहिरा देलक। कनेकाल मे गायक दृष्टि मे अन्तर बुझाय लगलैक। नीचाँ खायवला नादि मे देखलक जे सब हरियरे-हरियर कुट्टी काटिकय खेबा लेल परसल छैक आर तैयो ओ भूखे छटपटा रहल अछि, बस एतेक सोचिते मुंह मे पानि आबि गेलैक आ लपलपाकय जीह्वा निकालि चपर-चपर वैह पीरायल-सुखायल घास वला कुट्टी केँ चपबय लागल। केनकाल मे जखन अप्राकृतिक स्वाद सँ मोन नहि भरलैक त तामशे माथ-मुंह झमारि आँखिक ओ हरियरका चश्मा फेंकि देखैछ जे वैह सुखेलहा घास जेकरा ओ पहिने नहि खेने छल से दृष्टिक फेरक कारण एखन खेलक अछि। अर्थात् जीवक ज्ञानेन्द्रिय मे आँखिक भूमिका कतेक महत्वपूर्ण छैक आर नजरिया कोना बनैत छैक तेकर एकटा छोट उदाहरण एहि प्रकरण मे हम सब देखि रहल छी।
 
हम मानव अपन-अपन प्राकृतिक गुण सँ भरल जीवन-निर्वाह लेल विभिन्न व्यवसाय, पेशा, नौकरी, गृहस्थी मे लागल छी। इच्छा एक दिश आ दोसर दिश कर्म – जे प्राप्ति होएत अछि ताहि सँ घर-गृहस्थी, समाज, बाल-बच्चा आ धर्म-कर्म सब कय रहल छी। जखन पेट भैर जाएत अछि त ओहि गदहा आ गीदर केर मित्रता मे गीत गेबाक प्रकरण हमरो सभक जीवन मे आबि जाएत अछि। आर जखन गीत गाबय लगैत छी त ओकर प्रभाव हमरा-अहाँक समाज पर ओहिना पड़ैत अछि, मित्रता-शत्रुता-ईर्ष्या-डाह-प्रेम आदि ओहिना होबय लगैत अछि जेना गदहा-गीदर केर एहि कथा मे भेलैक। गौर करू – गदहा आ गीदर बड नीक मित्र छल। काफी समय तक ओ सब एक-दोसरक सुख-दुःख मे संग दियय। मुदा किछु कालान्तर मे एक-दोसरा केँ कोनो छोट टा बात लय केँ ईर बैढ गेलैक – मुदा रहय त मित्र से ई भितरिहा ईर केँ एक-दोसर पर प्रकट कहियो नहि करय – मुदा भीतरे-भीतर एक-दोसराक सुख आ समृद्धि सँ खूब डाह करय। एक दिन गीदर अपन बुद्धि लगाकय मित्र गदहा केँ मारि खुएबाक योजना बना लेलक। राति भेला उपरान्त दुनू यार विचार केलक जे आइ मक्कई आ चनाक खेत मे चरी करय जायत। बहुत दिन सँ स्वादिष्ट भोजन नहि केने छी मित्र, चलू आइ फल्लाँ खेत पर सुन्दर-स्वादिष्ट मक्कई आ चनाक भोजन (चरी) करब। – गीदर गदहा सँ कहलकैक। दुनू गोटा गेल। कनीकाल भेले छलैक आ कि गीदर कहलकैक, “मित्र, हमर पेट भैर गेल। आब कनेक गीत गाबय के मोन कय रहल अछि।” गदहा मना केलकैक, “यौ जी! अहाँक पेट कनीटा अछि, एखनहि भैर गेल। हमर पेट नम्हर अछि, कनी समय लागत। रुकू। कनीकाल मे हमरो पेट भैर जायत त दुनू गोटा संगे गीत गायब।”
 
गदहाक मना केलाक बादो गीदर अपन योजना मे सफलता पेबाक हड़बड़ी मे जबाब देलकैक, “यौ मित्र! पेट भरय त संसार सूझय। आब हमरा रोकू नहि, गीत गाबहे टा दियअ!” आर मित्रक जबाब सँ पहिनहि गीदर “हुआँ-हुआँ” करैत गीत गाबय लागल। रखबारक नींद टूटलैक। ओ दु-हत्थी डंडा लय चुपे-चुप ओम्हर आयल आ गीदर-गदहा दुनू केँ खेत मे पैसल देखि झमैटकय लाठी चलबय लागल। गीदरक शरीरो छो, भागैयो मे गदहा सँ तेज – ओ त भागि गेल, मुदा गदहा बेचारा जाबत धरि भगितय ताबत धरि पचासो डंटा शरीर पर खेलक आ दर्द सँ भैर राति छटपटाइत गीदरक गीत केँ कोसैत रहल। मोनेमोन गदहा सेहो योजना बनेलक जे एहेन दगाबाज मित्र सँ पाला छोड़ेनाय सेहो बड जरुरी अछि। किछु दिनक बाद गदहा कहलकैक गीदर सँ, “मित्र! आइ नदीक ओहि पार जे खेत सब छैक ओतय चरी करय चलू। खेसारीक छिम्मी आ केरावक छिम्मी सेहो पैर लागत। आलू-चुकन्दर-सकरकन्द सेहो बड नीक छैक ओहि पार।” गीदरक मुंह मे पानि आबि गेलैक। ओ झट तैयार भऽ गेल। ओकरा अपनहि टा बुद्धि पर दाबी रहैक। ओ कहियो सोचनहियो नहि छल जे गदहा मोने-मोन बदला लेबाक नियार मे अछि। ओ जहिना नदी लग पहुँचल कि गदहाक पीठ पर छड़ैपकय चढि गेल।
 
बीच नदी मे जखन गदहा हेलिकय मित्र गीदर केँ पीठ पर लेने जा रहल छल, तखनहि ओ कहलकैक, “मित्र! हमरा त लोटपोट करय के मोन करइ य!” गीदर घबरा उठल। ओकर हेलय नहि अबैत छलैक। ओ गदहा सँ विनीत स्वर मे कहलकैक, “राम-राम मित्र! बीच पानि मे कतहु लोटपोट कय सकल कियो? एहनो काज कियो करय?” गदहा गीदरेवला लाइन उपयोग करैत कहलकैक, “मित्र, पेट भरलाक बाद जेना गीत गेबाक इच्छा कियो नहि रोकि सकैछ, तहिना बीच पानिक धार मे हेलनिहार केँ जलक्रीड़ा सँ कियो कोना रोकत! आब त बुझू जे हमरा गुदुरगांइ लागि रहल अछि, आर बिना लोटपोट केने मोन नहि मानि रहल अछि।” गीदर ओकरा खूब शप्पत-तप्पत सेहो देलकैक, मित्रताक गहिंराई मोन पारलकैक, कहलकैक जे ओकरा हेलय नहि अबैत छैक, ओ डूबि जायत, मृत्यु भऽ जेतैक…. मुदा गदहाक शरीर पर ओ चोटक घाव एखन धरि ताजे रहैक – से ओ गीदर सँ बदला लेबाक दृष्टि सँ आखिरकार लोटपोट करय लागल आ कनिये काल मे गीदर पानि मे भसियाय लागल, गदहा पुनः मन्दबुद्धिक संग जीत पेबाक खुशी सहित वापस अपन घर आयल। ओ अपना केँ स्वयं धैर्य दैत कहलक जे धोखेबाज मित्र सँ बिना मित्रक नीक।
 
त चरबाहाक आँखिक चश्मा हो आ कि मित्रक बीच सन्देह सँ उत्पन्न दूरी – ईर्ष्या-डाह आदि – ई सब बात नजरिक दोष थिक। दोषपूर्ण नजरि सँ कथमपि सत्यक दुनियां आबाद नहि भऽ सकैत अछि। हम बड धनिक छी, खूब पाइ अछि, गरीब आ पिछड़ल हमरा लेल घास-फूस थिक – ई सोचि लेनाय कोनो सम्पन्न वर्ग केँ ओहिना बर्बाद कय दैछ जेना पूर्व मे सामंतवाद केँ नष्ट करबाक लेल समाजवाद आ साम्यवाद फाँर्ह बान्हि मैदान मे उतैर सामंतवर्गक नहि सिर्फ अन्त केलक बल्कि उल्टे धारा बहाकय आइ नक्सलाइट मूवमेन्ट आ लालूवाद समान अन्यायी समाजवाद केँ समाज पर थोपिकय अगड़ा-पिछड़ा बीच तेहेन खधैर बना देलक जे आब एकरा भरय लेल विकास आ सुशासनक क्रियाकलाप सेहो कोनो खास नहि कय सकल। उल्टे विकास पुरुष आ सुशासन लेल प्रसिद्ध प्रदेशक मुखिया अपन महात्वाकांक्षा केँ पूरा करय लेल प्राकृतिक विकासशील गठबंधन केँ तोड़ि ‘बिहारी स्वाभिमान’ केँ बचेबाक एक मुहिम चलाकय लालूवाद केँ ‘घोर-लालूवाद’ मे परिणति दय देलखिन। कनिके दिन मे लालूवाद केर प्रखर-पुत्र तेजस्वी पुरुष जखन असली स्वाभिमानक कमांड अपना हाथ मे ‘पापाजी’ केर इशारा पर राखय लगलाह तखन जा कय सुशासन बाबूक नींद टूटल आर फेर गठबंधन केर बुनियादी मजबूती स्मरण करैत ओ पुनः अपन धार बदैलकय विकास आ सुशासन दिश डेग बढेला अछि। देश (केन्द्र) आ प्रदेश (राज्य) बीच समन्वय आरम्भ कयल गेल अछि। परञ्च एकर सुन्दरतम् उपलब्धि कहिया धरि होयत – एकर इन्तजार आम जनमानस मे चलिये रहल अछि। आब २०१९ बेसी दूर नहि, जल्दिये किछु महत्वपूर्ण घोषणा होयत से अपेक्षा कयल जा सकैछ। मिथिलाक दुर्दशाक संबोधन सेहो एहि मे रहत, एतय उद्योग नीति मे उल्लेख्य सुधार आओत आर प्राकृतिक संसाधनक सुन्दरतम् उपयोग करैत लोकपलायन सन खतरनाक संक्रमण सँ मुक्ति भेटत, हम यैह अपेक्षा करैत छी। प्रवासक चपेट मे घरक गोसाउनि केँ – ग्राम देवता केँ बिसैर शहरी माल पर मलफाई उड़ेनिहार अपन दृष्टिदोष सँ ऊबार पबैथ, अपन मड़ौसी केँ सदैव सजाबैक वास्ते तत्पर रहैथ, यैह आशा। ॐ तत्सत्!!
 
हरिः हरः!!