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गीताक पाँचम अध्यायक प्रवीण व्याख्या

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ॐ श्री परमात्मने नमः !!

श्री कृष्ण भगवान् की जय !!

गीताक पाँचम अध्यायक प्रवीण व्याख्या

– प्रवीण नारायण चौधरी

विगत अध्यायक क्रमिक अध्ययनोपरान्त आब पाँचम अध्याय आरम्भ करैत छी । तेसर अध्याय मे कर्मक सिद्धान्त, चारिम अध्याय मे कर्म मे ज्ञानक भूमिका, शास्त्रक निर्दिष्ट यज्ञ आ ताहि मे मानवोचित त्याग केर विशद् चर्चा – आर फेर अन्त मे ज्ञान बिना सब किछु अधूरा-अपूर्ण हेबाक सत्य सँ परिचय करौलनि भगवान कृष्ण । पाँचम अध्याय अर्जुनक स्वाभाविक जिज्ञासा सँ शुरू होइछ – “संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ॥ यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥५-१॥”

अर्जुन कहैत छथि:

हे कृष्ण, अपने कर्म केँ त्याग करबाक सलाह दैत छी, आर फेर ओकरा करबाक सेहो । एहि मे सँ कोन बेसी नीक अछि ? अपने हमरा सुनिश्चित रूप सँ कहल जाउ ।

अध्याय ४ केर १८, १९, २१, २२, २४, ३२, ३३, ३७ आ ४१ मे, भगवान कर्म सभक त्याग केर बारे मे बात कयलनि अछि; आर ४२ मे, ओ अर्जुन केँ योग मे, कर्म करबाक लेल कहलनि अछि । दुनूक बीच परस्पर विरोधक कारण, जाहि सँ एक आदमी लेल एक्के समय दुनू बातक सहारा लेनाय असम्भव भ’ जाइत छैक, अर्जुन केर मन मे सन्देह उत्पन्न भ’ जाइत छन्हि, आर तेँ उपर पुछल गेल जेकाँ सवाल उठैत छैक ।

(ओकरा करबाक: – पाठ में “योग”: एतय आ आगाँक श्लोक सब मे योग केर मतलव कर्म-योग अछि ।)

श्री भगवानुवाच ।

संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ॥
तयोस्तु कर्मसंन्यासत्कर्मयोगो विशिष्यते ॥५-२॥

त्याग आर कर्म करब दुनू मुक्ति दिश लय जाइत अछि; एहि मे सँ कर्म करब, कर्म केर त्याग सँ बेसी नीक अछि । 

अध्यात्म केर मार्ग मे नव व्यक्तिक वास्ते, कर्म करब, ज्ञान केर बिना कयल गेल (कर्मक) त्याग सँ बेसी नीक अछि । एहि अध्याय केर छठम श्लोक देखब ।

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न कांक्षति ॥
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्मप्रमुच्यते ॥५-३॥

ओकरा निश्चित संन्यासी बुझबाक चाही, जे नहि तँ पसन्द करैत अछि आ न नापसिन; कियैक तँ, द्वंद्व सँ मुक्त, हे महाबाहु, ओ सहजता सँ बन्धन सँ मुक्त भ’ जाइत अछि । 

निश्चित संन्यासी: ओकरा औपचारिक रूप सँ संन्यास लेबाक कोनो जरुरत नहि छैक, मुदा अगर ओकर सोच उपरोक्त कथन (द्वंद्व सँ मुक्त जेहेन) छैक, त ओ हमेशा लेल संन्यासी छी ।

नहि तँ पसिन करैत अछि आ न नापसिन: नहि तँ दर्द या दर्द दयवाली चीज सँ घृणा करैत अछि, नहि तँ खुशी आ खुशी दयवाली चीज सभक इच्छा (लालसा) करैत अछि, भले ओ काज मे लागल अछि ।

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ॥
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥५-४॥

ज्ञान आ कर्म केँ अलग-अलग मानबाक बात बच्चा (अबोध) सब करैत अछि, बुझनुक (बोधसम्पन्न) लोक नहि । जे सच मे एकटा मे रहैत अछि, ओकरा दुनूक फल भेटैत छैक । 

बच्चा (अबोध): ओ अज्ञानी लोक जेकरा शास्त्र केर उद्देश्य नहि पता छैक ।

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ॥
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥५-५॥

ज्ञानी लोक सब जाहि सतह (उच्चस्थान) धरि पहुँचैत छथि, ओतय धरि कर्म-योगी लोक सब सेहो पहुँचैत छथि । जे ज्ञान आ कर्म केँ एक जेकाँ देखैत अछि असगर वैह (सचमुच) देखैत अछि (बाकी सत्य केँ नहि देखैत अछि) ।

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुयोगतः ॥
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥५-६॥

हे महाबाहु, कर्म कएने बिना कर्म केर त्यागो कय पेनाय कठिन अछि; ध्यान करयवला लोक, कर्म मे रुचि राखिकय पवित्र भेलापर, शीघ्रहि ब्रह्म केँ प्राप्त करैत छथि । 

एहेन नहि छैक जे ज्ञानक आधार पर कर्म केर त्याग कयनाय कर्म करय सँ बेसी नीक नहि छैक, बल्कि कर्म करयवला तरीका नव लोकक वास्ते सहज छैक, आर ओकर मन केँ शुद्ध कयकेँ ओकरा ऊँच मार्ग (रास्ता) वास्ते योग्य (काबिल) बनबैत छैक । तेँ ओकर मामिला मे यैह सही छैक आर तेँ बेसी नीक तरीको छैक ।

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ॥
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥५-७॥

कर्मक प्रति समर्पित रहि जेकर मन शुद्ध भ’ गेल हो, शरीर पर जीत हासिल भ’ गेल हो, इंद्रिय सब काबू मे आबि गेल हो, स्वयं (अपना आप) केँ प्रत्येक कर्म करैत प्राणी सब मे अनुभव करय, तेहेन मनुष्य कर्म करितो कर्म सब मे लिप्त नहि होइत अछि । 

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ॥
पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गछन्स्वपञ्छ्वसन् ॥५-८॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥५-९॥

सत्य केँ जानयवला केँ, स्वयं मे केन्द्रित रहिकय एना सोचबाक चाही, “हम किछुओ नहि करैत छी” – देखनाय, सुननाय, छुनाय, सुंघनाय, खेनाय, गेनाय, सुतनाय, सांस लेनाय, बजनाय, छोड़नाय, पकड़नाय, खोलनाय आ आँखि बन्द कयनाय केर बादो – ई मानैत जे इंद्रिय सब इंद्रिय सभक बीच घुमैत अछि । 

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ॥
लिप्यते न स पापेन परापत्रमिवाम्भसा ॥५-१०॥

ओ (लोक) जे आसक्ति छोड़िकय, सबटा ब्रह्म केँ अर्पित कयकेँ कर्म करैत अछि, ओ कोनो तरहक खराबी सँ गन्दा (छुआइत, अपवित्र) नहि होइछ, जेना कमलक पात पानि सँ नहि होइछ ।

खराबी: नीक आ बेजा कर्मफल (परिणाम), जे बंधन उत्पन्न करैत अछि ।

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैन्द्रियैरपि ॥
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥५-११॥

कर्म मार्ग में भक्त, आसक्ति केँ छोड़िकय, मात्र शरीर, मन, इंद्रिय आर बुद्धि सँ, हृदय केर शुद्धिक लेल कर्म करैत अछि । 

मात्र शरीर, मन, आदि सँ – बिना स्वार्थक अहंकार केर; ई शरीर, मन, इंद्रिय आर बुद्धि पर लागू होइत अछि ।

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ॥
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥५-१२॥

जे लोक कर्म केर फल केँ छोड़िकय संतुलित (नीक स्थिति मे) रहैत अछि, ओकरा शान्ति भेटैत छैक, जे कि दृढ़ता (नैष्ठिकता) सँ उत्पन्न होइत छैक; जे लोक (विभिन्न तरहक) इच्छाक कारण असंतुलित रहैत अछि, ओ (कर्म केर) फल सँ जुड़ल रहिकय बन्हायल रहैत अछि ।

दृढ़ता सँ उत्पन्न भेल: शंकराचार्य नैष्ठिकम केर ज्ञानक मार्ग मे धीरे-धीरे पूर्णता अयबाक रूप मे बुझबैत छथि, जाहि मे विकास केर ई चरण सब होइत छैक: (१) हृदय केर पवित्रता, (२) ज्ञान प्राप्त कयनाय, (३) कर्म केर त्याग, (४) ज्ञान मे स्थिरता ।

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ॥
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥५-१३॥

(इंद्रिय केँ) वश मे करयवला, विवेक सँ सब कर्म केँ त्यागिकय नौ द्वार (दरबज्जा) वला पुरी (शरीररूपी नगर) मे खुशी सँ रहैत अछि, नहि तँ अपने किछु करैत अछि, नहिये दोसर सँ किछु करबावैत अछि । 

सब कर्म – १. नित्य या जरूरी – जेकरा कयला सँ कोनो पुण्य नहि भेटैछ, लेकिन नहि कयला सँ पाप लगैत अछि । २. नैमित्तिक – जे कोनो खास प्रयोजनक अवसर पर होइत अछि, जेना बेटाक जन्म; ई सेहो पारम्परिक कर्म थिक । ३. काम्य – जे कोनो खास उद्देश्य केर पूर्ति करबाक लेल होइत अछि; ई सिर्फ ऐच्छिक थिक । (ऐच्छिक माने – मन भेल त करू, नहि भेल त नहि करू । अनिवार्य कर्म नहि थिक ई ।) ४. निषिद्ध – मना कयल गेल कर्म । ओ (नौ खुला आंगिक भाग – ९ खुला दरबाजावला) शरीर मे खुशी सँ रहैत अछि, कर्म मे अकर्म केँ देखैत अछि; बस अपन प्रारब्ध पूरा करैत अछि – द्वंद्वयुक्त दुनियाक कोनो चीज सँ अपना केँ जोड़ैत वा पहिचानैत नहि अछि ।

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ॥
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥५-१४॥

भगवान एहि दुनियाक लेल नहि तँ कोनो कर्तृत्व (यानि कर्तापन, कोनो कार्य करबाक भावना) बनबैत छथि, नहिये कोनो कर्म, आ न ओ काजक फल सँ मिलन करबैत छथि । ई स्वभाव (सार्वभौमिक अज्ञानता – सर्वव्यापी अनभिज्ञता) थिक जे (ई सब) करैत अछि ।

नादत्ते कस्यचित् पापं न चैव सुकृतं विभुः ॥
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥५-१५॥

विभु (सर्वव्यापी भगवान) केकरहु गुण या दोष पर ध्यान नहि दैत छथिन । ज्ञान अज्ञान सँ झाँपल अछि, तेँ जीव (प्राणी) मोह मे पड़ि जाइत अछि । 

स्पष्ट शब्द मे, कृष्ण एहि दुइ छन्द मे ब्रह्मांड केर सम्बन्ध मे ईश्वर या भगवानक स्थिति केर वर्णन करैत छथि । (अध्याय ५ केर १४ आ १५ श्लोक मे)

ओ सर्वथा आनन्दमय, सर्वपरिपूर्ण छथि; एतय धरि जे हुनका मे कोनो उद्देश्य या सम्बन्ध केर छाँहो तक, हुनकर स्वभावक विपरीत होयत । प्रकृति संग हुनक निकटता प्रकृति केँ ओ सब किछु उत्पन्न करबाक शक्ति आ क्षमता प्रदान करैत अछि । जीव ताबत धरि बान्हल अछि जाबत धरि स्वयं केँ एहि प्रकृति सँ जोड़ैत अछि, आर ओकरा संग अपन पहिचान स्थापित करैत अछि । जखन ओ एना कयनाय बन्द कय दैत अछि, त ओ स्वतंत्रता प्राप्त कय लैत अछि । एहि विषय पर गीताक पूरा शिक्षा, आर तेँ पूरे हिन्दू धर्मग्रंथ केर, उपरोक्त मे संक्षेपित अछि ।

अर्जुनक सवाल जे संन्यास नीक आ कि कर्म, ताहि पर भगवान कृष्ण द्वारा विस्तार सँ दुनू मार्गक श्रेष्ठता केँ फरिछौलनि अछि आर स्पष्ट कयलनि अछि जे संन्यासक मार्ग सर्वसुलभ नहि, अपितु कर्म मार्ग जे कि अनिवार्य मार्ग संन्यास मार्गी द्वारा पर्यन्त अपनाबइये टा पड़ैछ यैह सहज अछि । आर एहि तरहें अनासक्त भ’ कय, स्वयं केँ कर्ता नहि मानि इन्द्रिय द्वारा अपन विषय सब मे प्रवेश करब आ कर्म करब स्वाभाविक सत्य अछि, जे ज्ञानी स्वयं केर पहिचान आत्मारूप मे करैछ ओ अपना केँ कर्ता नहि मानि स्वभावे द्वारा स्वभाविक कर्म करबाक बात बुझैत स्वतंत्र रहैछ । आर अन्त मे १४-१५ श्लोकक उपरोक्त टिप्पणी अनुसार सर्वोच्च सत्य केँ हम सब बुझी, गुनी आ विभु (भगवान) केर सृष्टि मे स्वयं केर वास्तविक स्थिति बुझी से स्पष्ट कयलनि अछि ।

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ॥
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥५-१६॥

मुदा जेकर अज्ञानता आत्मज्ञान सँ नष्ट भ’ जाइछ – ओकर वैह ज्ञान, सूर्य जेकाँ परम ब्रह्म केँ प्रकट करैत अछि । 

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्टास्तत्परायणाः ॥
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥५-१७॥

जेकर बुद्धि वैह (परम ब्रह्म) मे लीन अछि, जेकर आत्मा वैह अछि, जेकर दृढ़ता वैह मे अछि, जेकर परिणति (अन्त) वैह अछि, ओकर अशुद्धि सब ज्ञान सँ शुद्ध भ’ जाइत अछि, ओ फेर घुरिकय नहि अबैछ अर्थात् मोक्ष केँ प्राप्त होइत अछि । 

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ॥
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥५-१८॥

परम ब्रह्म (परमात्मा) केँ जननिहार लोक ज्ञान व विनम्रता सँ सम्पन्न एक ब्राह्मण केँ, एक गाय केँ, एक हाथी केँ, एकटा कुत्ता केँ तथा समाज सँ बाहर कयल गेल (सबसँ नीच) एक मनुष्य केँ एक्कहि दृष्टि (समान नजरि) सँ देखैत छथि । 

कियैक तँ ओ परम आत्माक अलावे किछुओ नहि देखि सकैत छथि । सूर्य केँ एहि सँ कोनो फर्क नहि पड़ैत छन्हि जे हुनकर परछाई गंगा मे, शराब मे, छोट पोखरि मे या फेर गंदा पानि मे देखाय पड़य, आत्माक संग सेहो एनाही छैक । कोनो उपाधि (या सीमित करयवला सहायक) ओकरा सँ जुड़िये नहि सकैछ । 

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ॥
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥५-१९॥

(सापेक्ष) अस्तित्व केँ ओ सब जीति लेलनि अछि, एहि संसार मे सेहो, जिनका सभक मन समत्व (समान भाव) मे रहैत छन्हि, कियैक तँ ब्रह्म एक्के जेकाँ छथि आर ओहि मे कोनो अपूर्णता (कमी) नहि छैक; तेँ ओ सब सच मे ब्रह्महि मे सदिखन रहैत छथि । (ब्रह्म मे लीन/रमल रहैत छथि ।) 

सापेक्ष अस्तित्व: जन्म, मृत्यु आदि जेहेन समस्त बन्धन । बन्धन केर समस्त संभावाना सब तखन खत्म भ’ जाइत अछि जखन मन पूर्ण समत्व भाव केँ प्राप्त कय लैत अछि, जेकरा दोसर शब्द मे अर्थ होइछ – ब्रह्म बनि गेनाय । 

न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ॥
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥५-२०॥

ब्रह्म मे स्थिर, स्थिरबुद्धि आ बिना कोनो भ्रम केँ, ब्रह्म केँ जानयवला नहि त सुखद वस्तु पाबिकय प्रसन्न होइत छथि, आर नहिये अप्रिय वस्तु पाबिकय दुःखी होइत छथि । 

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ॥
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥५-२१॥

बाहरी चीज सब सँ हृदय केँ अनासक्त राखिकय (लगाव हंटाकय), ओ (ब्रह्म केँ जननिहार लोक) (परम) आत्मा (स्वयं ब्रह्म) मे निहित प्रसन्नता (आनन्द) केँ अनुभूति करैत छथि । ब्रह्म केर ध्यान मे हृदय केँ लगाकय, ओ कहियो खत्म नहि होयबला आनन्द (परमानन्द) केँ प्राप्त करैत छथि । 

हृदय: अंत:करण ।

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ॥
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥५-२२॥

हे कुंतीपुत्र, चूँकि (भौतिक सम्पदा, बाहरी चीज सभक) सम्पर्क सँ उत्पन्न होयबला सुखे दुःखक जनक थिक, आर ओकर आरम्भ तथा अन्त होइत छैक, तेँ बुद्धिमान लोक ओहि सब मे सुख (आनन्द) नहि तकैत छथि (या, ओहेन सुख/आनन्द सब मे नहि रमैत छथि) । 

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ॥
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥५-२३॥

जे एहि संसार मे, शरीर सँ मुक्ति भेटय सँ पहिने, काम (कोनो वस्तु प्राप्त करबाक कामना) एवं क्रोध (वस्तु नहि प्राप्त भेलापर उत्पन्न क्षोभ, दुःख, आदि) सँ उत्पन्न आवेग केँ बर्दाश्त कय सकैत अछि, ओ योग मे दृढ़ अछि, वैह सुखी मनुष्य अछि ।

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथाऽन्तर्ज्योतिरेव च ॥
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥५-२४॥

जेकरा सुख (स्वयं केर) भीतर मे रहैछ, जेकरा आराम (स्वयं केर) भीतर मे रहैछ, जेकरा प्रकाश (स्वयं केर) भीतर मे रहैछ, वैह योगी ब्रह्म बनिकय पूर्ण स्वतंत्रता (मोक्ष) प्राप्त करैत अछि । 

भीतर: स्वयं मे ।

पूर्ण स्वतंत्रता: ब्रह्म-निर्वाण । ओ शरीर मे रहिते मोक्ष पाबि लैत अछि ।

एहि सब श्लोक मे मनुष्यक वास्ते सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि जेना परमानन्द, परमसुख, परमज्ञान/ब्रह्मज्ञान, पूर्ण स्वतंत्रता (मोक्ष), ब्रह्मरूप आदिक चर्चा करैत हमरा सब केँ अपन जीवन केँ सफल बनेबाक सन्देश दय रहल अछि श्री कृष्ण । हम सब आत्मनिरीक्षण करी । अपन रिपोर्ट कार्ड अपने तैयार करी ।

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ॥
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥५-२५॥

अपूर्णता (कमी-खामी सब) दूर कयकेँ, सन्देह (भ्रम/शक) दूर कयकेँ, इंद्रिय सबपर काबू पाबिकेँ आर समस्त जीव सभक भलाइ (उपकार) मे लागल रहला सँ ऋषि लोकनि केँ पूर्ण स्वतंत्रता (मोक्ष) भेटैत छन्हि ।

ऋषि: सही दृष्टि आ त्याग करयवला लोक ।

एतहु सुन्दर मार्गदर्शन पूर्ण स्वतंत्रता वास्ते देलनि अछि श्री कृष्ण । अपन अपूर्णता यानि कमी-कमजोरी केँ दूर कयकेँ, सन्देह (मोह, भ्रम, शंका, आदि) केँ दूर कयकेँ, इंद्रिय सब पर नियंत्रण पाबिकेँ आ समस्त जीव सभक भलाइ – परोपकार मे लागल रहला सँ ऋषि लोकनि केँ पूर्ण स्वतंत्रता भेटैत छन्हि, अर्थात् हमरा लोकनि सेहो ऋषि बनी, एहि तरहक आचरण अपनाबी ।

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ॥
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥५-२६॥

काम आर क्रोध सँ मुक्त, हृदय नियंत्रित, आत्मसाक्षात्कारी, एहेन संन्यासी सभक लेल एहिठाम (एहि संसार मे) आर एकरा बादो (अन्यान्य संसारहु मे) पूर्ण स्वतंत्रता अछि ।

@सब

अध्याय ५ सँ एहि छंद सबपर बहुत विशेष नोट्स लेब, एकरा पूरा बुझि पेनाय कनेक कठिन भ’ सकैत अछि, लेकिन वर्तमान अनुवाद हमरा सब केँ समग्रता मे बुझबाक अवसर प्रदान कय रहल अछि । 

स्पर्शान् कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ॥
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणी ॥५-२७॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ॥
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥५-२८॥

बाहरी वस्तु सब केँ बाहर रखनाय; आँखि केँ भौंह केर बीच स्थिर कयनाय; नाकक अन्दर प्राण आ अपान केर बराबर धारा सब केँ रोकनाय; इंद्रिय, मन आ बुद्धि केँ नियंत्रित कयनाय; मोक्ष केँ सबसँ उच्च लक्ष्य बनेनाय; इच्छा, डर आ क्रोध सँ मुक्त भेनाय: एना ध्यान करयवला आदमी हमेशाक लेल स्वतंत्र भ’ जाइत अछि ।

बाहरी वस्तु: आवाज आ दोसर इंद्रिय सभक वस्तु सब । बाहरी वस्तु सभक बारे मे नहि सोचला सँ ओ मन सँ बाहर भ’ जाइत छैक । जखन ध्यान मे आँखि आधा बन्द होइत छैक, तऽ आँखिक पुतली सब स्थिर रहैत छैक, आर ओकर नजरि, मानू भौंह सभक बीच मिलि जाइत छैक । प्राण बाहर जायवाली साँस छी, अपान अन्दर आबयवाली साँस छी; कहल गेल रोकबाक विधि प्राणायाम सँ होइत छैक ।

ई दुइ श्लोक सूत्र थिक जेकर ऐगला अध्याय (अध्याय छठम) भाष्य कहाइछ ।

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ॥
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥५-२९॥

हमरा यज्ञ आ तप केर भोक्ता (ग्रहण करयवला), समस्त लोक केर महान स्वामी (परमाधिपति) केर रूप मे, सब प्राणीक मित्र जानिकय, ओ शान्ति प्राप्त करैत अछि ।

दयवला: (यज्ञ केर विधान) बनबयवला आ लक्ष्य (परिणाम निर्धारण करयवला) दुनू रूप मे, भगवान समस्त कर्म केर फल दयवला छथि ।

मित्र: बिना कोनो बदला मे कयल जायवला हित केर अपेक्षा कएने नीक (कर्म) करयवला । 

एहि तरहें कर्म मे श्रेष्ठ कर्म केकरा आ कियैक कहल जाइछ, कर्मसिद्धान्तक पूर्ण मीमांसा एहि अध्याय सँ भेटैत अछि । आशा करैत छी जे व्याख्या प्रसंग अपने सब केँ आर विशेष आनन्द प्रदान करैत होयत । स्वाध्याय जारी राखब । बस । बम बम महादेव !!

हरिः हरः!!

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