लेख-विचार
रहिकाक विद्यापतिपर्व समारोह
— भीमनाथ झा
विद्यापति जयन्ती शुरू भेल जनजागरणक उद्देश्यसँ । बाबू भोला लाल दास आ नरेन्द्रनाथ दास, किरणजी, मधुपजी, अमरजी, मणिपद्मजी प्रभृति अनेक यशस्वी, तनिका संगहि किछु नवोदित कवि लोकनि साइकिलसँ वा पयरे, संगमे दू-चारिटा चद्दरि ल’क’, समूहमे अपन-अपन क्षेत्रक कोनो गाम पहुँचि जाथि आ ओत’ दश लोककेँ निवेदनपूर्वक जुटाक’ कविता-गीत सुनाबथि, मैथिलीक प्रचार करथि आ राति होइत घर घुरि जाथि । ई साधना छल, तपस्या छल, जे अपना लोकनिक पूर्वज कयने रहथि । हुनके लोकनिक प्रसादात् अपन समाजमे मातृभाषाक प्रति एतबो जागरण भेल अछि । विद्यापति जयन्तीक रूपमे आरम्भ भेल ई गोष्टी क्रमश: विद्यापति स्मृतिदिवस, स्मृतिपर्व होइत समारोह धरि पहुँचि गेल । घंटा-दू घंटाक गोष्टी क्रमशः दुदिना-तिनदिना उत्सवक रूप ल’ लेलक । से लेलक तँ साहित्यसँ नहियोँ रुचि रखनिहार जनसमुदाय एहि दिस आकृष्ट भेल । भाषण आ काव्यपाठसँ शुरू भेल एहि गोष्ठीमे अन्यो आकर्षण जुड़ैत चल गेल । विचारगोष्ठी, गायन-वादन, नृत्य आ नाट्य प्रस्तुति आदि अनेक मनोरंजक उपादान सभ अबैत गेल । तखन ई केवल साहित्यकारे धरि सीमित नहि रहल, अपितु बहुत व्यापक भ’ गेल । तस्मात् स्वाभाविक छल जे क्रमश: साहित्य-पक्ष गौण भेल गेल, मनोरंजन-पक्ष जगजियार भ’ उठल ।
एकर पसार द्रुतगतिएँ विस्तार ल’ लेलक । बिहारक तँ लगभग सभ जिलामे, ताहि संग सम्पूर्ण देशस्थ प्रदेशक राजधानी सहित तकर मुख्य-मुख्य नगरमे, जत’ किछुओ संख्यामे मिथिलावासी कार्यरत रहथि, धूमधामसँ विद्यापति उत्सव मनाओल जाय लागल । एहिसँ ई अवश्य भेल जे साहित्यसँ नहियोँ लागि रखनिहार सम्पूर्ण देशमे पसरल मैथिल समाजमे अपन जन्मभूमि आ मातृभाषाक प्रति आकर्षण तँ जगबे कयल, ताहि संग स्वाभिमान सेहो जागल आ तकर सुफल सेहो भेटल – अपन भाषाक संवैधानिक मान्यताक रूपमे ।
प्रकृतिक ई नियम थिकै जे सभ दिन, सभ ठाम, सभटामे परिवर्तन ध्रुव छै, से दुनू दिस जा सकै छै – ऊँचो दिस, नीचो दिस । मोटामोटी मानि क’ चली तँ विद्यापति पर्वक अखिल भारतीय सघनता बीस-पचीस वर्ष पूर्वहिसँ पतराय लागल । ततबे नहि, मिथिलाक गाम-गाममे जे आयोजन – समारोह होइत रहल छल, सेहो घट’ लागल। किन्तु, देशभरिमे आङुरपर गनल एहन किछुए संस्था अछि जे एखन धरि लगातार व्यापक स्तरपर आयोजन करैत आबि रहल अछि । ताहिमे “मैथिल समाज रहिका” प्रमुख अछि, जे आरम्भहिसँ जाहि भव्यताक संग विद्यापति समारोह मनायब आरम्भ कयने छल, ताही त्वरामे अखण्डित रूपमे आगाँ बढा रहल अछि ।
रहिकामे सेहो विद्यापति-स्मृतिदिवसक आरम्भ 1973 मे ओही कड़ीक रूपमे भेल छलै । गामक ताहि दिनुक किछु तेजस्वी आ उत्साही युवकगण तथा किछु प्रतिष्ठित सुधी अभिभावक लोकनिक समर्थन आ सर्वविध सहायतासँ निरन्तर एकर प्रतिष्ठा बढैत गेलै आ आभा पसरैत गेलै । पहिल संगोष्ठी स्थानीय खादीभंडारक प्रांगणमे आयोजित भेल रहै । अगिलो साल ओतहि दोहराओल गेलै । किन्तु, अपन गाम एवं चारू कातक निकटवर्ती गामसभक एहि प्रति अपूर्व आकर्षण देखि तेसर साल (1975) सँ वृहत् स्तरपर गामक विस्तृत मैदानमे समेना टाङिक’ तृदिवसीय भव्य आयोजन होब’ लगलै, जे क्रमश: भव्यतर होइत चल गेलै । रहिका आरम्भेसँ सजग आ समुन्नत गाम रहल अछि । प्राय: सर्वप्रथम मिथिलाक एही गाममे विद्यापतिक प्रस्तर मूर्ति स्थानीय चौकपर स्थापित कयल गेल । जिला मुख्यालय मधुबनीक निकटवर्ती रहलाक कारणे, कालेज तथा ब्लौक आफिस रहने लोकक अवर्यात अनवरत बनल रहलाक कारणे, सौराठ सहित मिथिलाक अनेक प्रतिष्ठित गामक सन्निकट रहलाक कारणे तथा सर्वोपरि निज गामक तथा पड़ोसक जाग्रत युवावर्गमे मान्यजनक समर्थनसँ विशेष उत्साहित मिथिला-मैथिलीक प्रति प्रगाढ अनुरागक संग अपन कर्तव्यबोधक प्रति जागरूकताक कारणे एहि गामक विद्यापतिपर्वक लोकप्रियता क्रमश: बढैत चल गेलै । आरम्भहिसँ तिनदिना ई समारोह साहित्य, मनोरंजन ओ जनजागरणकेँ समर्पित अछि । तीनू दिनक उत्सव विद्यापतिक मूर्तिपर माल्यार्पणसँ आरम्भ होइछ । पहिल दिन मुख्यता रहैछ मिथिला-मैथिलीक उत्थान लेल सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्रक प्रतिष्ठित व्यक्तित्वक उद्बोधन-संदेशक । दोसर दिन साहित्यकेँ समर्पित रहैछ, जाहिमे मुख्यत: कविसम्मेलनक इन्द्रधनुषी आभा छिटकैछ । तेसर दिनक सांस्कृतिक कार्यक्रम अगिला दिनक भोर धरि विशाल जनमानसकेँ विभोर करैत रहैछ ।
समारोहक न्योँ केँ मजगूत करबामे गामक प्रतिष्ठित व्यक्ति लोकनिक वरदहस्त अवश्य छलनि । ताहिमे दूरसँ जे अनुभव हम कयलहुँ से ई जे मैथिली आन्दोलनक प्रसिद्ध सेनानी तथा गामक तत्कालीन मुखिया एवं मिथिला-मैथिली लेल जी-जान झोँकि देनिहार स्मृतिशेष चुनचुन बाबू यावत रहला, एकर रीढक हड्डी छला । दोसर व्यक्ति छथि कविवर श्री उदयचन्द्र झा ‘विनोद’, जे एकर साहित्यिक गरिमाकेँ लगातार सुप्रतिष्ठित करैत आबि रहल छथि । हम आन्तरिक विषय नहि जनै छी, किन्तु जे आरम्भहिसँ देखैत आबि रहल छी, ताहि आधारपर निस्संकोच कहि सकै छी जे विनोदजीक सक्रियता आ कार्यकौशलक प्रसादेँ चारि गोट ‘सम्मान’ गरिमापूर्ण ढंगसँ अद्यावधि संचालित होइत आबि रहल अछि । परमादरणीय किरणजी यावत् कनेको सक्रिय रहला, एहि समारोहमे अबिते रहला आ अपन उद्बोधनसँ जनमानसकेँ ऊर्जस्वित करिते रहला । हुनक देहान्तक बाद एहि संस्थाक प्रति हुनक गाढ अनुरागकेँ देखैत ई समिति हुनक नामपर ‘किरण सम्मान’ शुरू कयलक । तहिना, परमादरणीय यात्रीजी जर्जरावस्थामे पहुँचि गेलाक बादो एहि ठामक आह्वानपर एत’ अयबाक लोभ सम्वरण नहि क’ सकला तथा संस्था आ समारोहकेँ गौरवान्वित कयलनि । हुनक महाप्रयाणक बाद हुनको नामपर ‘यात्री सम्मान’ शुरू कयल गेल । समिति निर्णय लेलक जे गद्यक टटका पोथीपर ‘किरण सम्मान’ आ टटका काव्यकृतिपर ‘यात्री सम्मान’ प्रतिवर्ष प्रदान कयल जायत ।
तहिना, सम्पूर्ण भारतमे मैथिली मंचपर रवीन्द्रजी आ महेन्द्रजीक जोड़ी सर्वाधिक यशस्वी रहल । ई जोड़ी अनेक बेर रहिकोक मंचपर अपन शब्द आ स्वरक चमत्कार देखा चुकल छल । महेन्द्रजीक देहान्तक बाद गीत-संगीत क्षेत्रमे विशिष्ट योगदान लेल मैथिल कलाकारकेँ ‘महेन्द्र सम्मान’ देबाक निर्णय भेल आ कार्यान्वित सेहो कयल गेल । बादमे रवीन्द्रजीक देहावसान भेलापर एहि सुविख्यात जोड़ीक नामपर ओकरा ‘रवीन्द्र महेन्द्र सम्मान’ – रूपमे केवल नाम-परिवर्तन क’ देल गेल । चारिम पुरस्कार एहि संस्थाक प्रमुख स्थापक सदस्य आ पूर्वोक्त मैथिली सेनानी चुनचुन मिश्रक स्मृतिमे हुनके नामपर अछि, जे मैथिली आन्दोलनमे प्रमुख योगदाताकेँ प्रदान कयल जाइछ ।
दुनू साहित्यिक पुरस्कारक प्रसंग ई स्पष्ट करब आवश्यक बुझै छी जे एकर निर्णय कोनो प्रतियोगिताक माध्यमे नहि लेल जाइछ, ने किनकोसँ पोथिए आमंत्रित कयल जाइछ । ई तँ बस मैथिलीक रचनाकारकेँ हुनक नवप्रकाशित पोथीपर सम्मानित करबाक शुभेच्छा मात्र थिक । तेँ सम्मान-राशिक सार्वजनिक घोषणो नहि कयल जाइछ । ई प्रसन्नताक विषय थिक जे एहि संस्था द्वारा अपना लेल चयनित पोथी बहुजन प्रशंसाक पात्र बनैछ आ ताहिमे किछु तँ आनो सम्मानसँ आगाँ आदृत होइछ । ध्यातव्य जे राज्य आ देशक अनेको अन्य संस्था जत’ ‘रत्न’ आ ‘विभूति’क वर्षा करैत अछि, तत’ ई संस्था अपन अक्षरपुरुषक पावन स्मृतिमे हुनक मानस सन्ततिक सत्कार करैत अछि ।
अधिसंख्य साहित्यकार आ कलाकारकेँ एहि संस्थाक आयोजनक प्रति खास वा विशेष आकर्षणक एक मुख्य कारण ईहो थिक जे एहि संस्थासँ सम्बद्ध साम्प्रतिक साहित्य आ रंगमंच क्षेत्रक दू अमर विभूति श्री उदयचन्द्र झा ‘विनोद’ तथा श्रीमती प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’क एकसंग सान्निध्यलाभक दुर्लभ संयोग हुनका लोकनिकेँ सहजेँ उपलब्ध भ’ जाइ छनि । हम तँ एम्हर किछु वर्षसँ अशक्यो रहने तहुँ जाइत रहलहुँ अछि । ओना, हम 1975 सँ 2024 धरि, केवल एक वर्षकेँ छोड़ि हुनका लोकनिक समक्ष अपन हाजिरी दैत आयल छियनि आ तकरा हम अपन सौभाग्य मानै छी ।
श्री शीतलाम्बर बाबूकेँ एहि संस्थाक प्रति समर्पण आ एकरा एहि स्तर धरि पहुँचयबाक हुनक क्षमता आ लगनक आगाँ के नहि कृतज्ञ होयत ?

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अत्यंत सारगर्भित