लेख विचार
प्रेषित – दिलिप झा ललित
स्रोत – दहेज मुक्त मिथिला
लेखनी के धार, वृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय – संरक्षित पाप आऽ मौन लोकतंत्र
(सम सामयिक अभिव्यक्ति)
समाज सभ्यता के ओ चदरि अछि जे मानवता के झाँपैत अछि। मुदा जखन ई चदरि रक्त-सिक्त होमय लगैत अछि, जखन नारीक अस्मिता आऽ निर्दोष जीवन राजनीतिक सौदेबाजी के वस्तु बनि जाइत अछि, तखन सभ्यता के माथ पर कलंकक दाग लागि जाइत अछि।
आजुक सामाजिक स्थिति एहन मोड़ पर ठाढ़ अछि जतय बलात्कार आऽ हत्या जेकाँ जघन्य अपराध केवल अपराध नहि रहि गेल अछि, बल्कि राजनीतिक समीकरणक मोहरा बनि गेल अछि। न्यायक तराजू कखनो सत्ताक भार सँ झुकि जाइत अछि, तऽ कखनो विरोधक शोर गुल मे गुम भऽ जाइत अछि। प्रश्न उठैत अछि की कानून सभक लेल समान अछि, कि ओहनो लोक लेल जे सत्ता के आँचर पकड़ने छथि?
“बलात्कार आऽ हत्या” ई दू शब्द मात्र नहि, बल्कि सभ्यता पर आघात अछि। बलात्कार केवल देह पर आक्रमण नहि, आत्मा पर आघात अछि। हत्या केवल प्राण हरब नहि, बल्कि एक परिवार, स्वर्णिम एक स्वप्न, एक भविष्य के समाप्त करब अछि। मुदा जखन एहन अपराधक बाद राजनीति अपन रंग बदलैत अछि, तऽ अपराध दोसर रूप धारण कऽ लैत अछि आऽ ओ बनि जाइत अछि संरक्षित पाप।
आई समाज मे एहन दृश्य सामान्य भऽ गेल अछि जे अपराधी के जाति, दल, अथवा राजनीतिक निकटता देखल जाइत अछि, आऽ पीड़िता के वेदना पाछाँ छोड़ि देल जाइत अछि। कखनो अपराधी के बचाबऽ लेल बयान गढ़ल जाइत अछि, कखनो जांच के दिशा मोड़ल जाइत अछि, आऽ कखनो पीड़िता परिवार के चुप कराबऽ लेल दबाव बनाओल जाइत अछि। न्यायक प्रक्रिया लंबा खिंचैत अछि, आऽ समय के संग-संग आक्रोश ठंढा पड़ैत अछि।
राजनीतिक संरक्षण अपराधी के हिम्मत दैत अछि। जखन ओ देखैत अछि जे ओकरा पाछाँ “बड़का-बड़का हाथ” अछि, तऽ कानून ओकरा लेल मात्र कागजक अक्षर बनि जाइत अछि। एहन वातावरण मे अपराध मात्र एक घटना नहि रहि जाइत अछि, बल्कि एक संदेश बनि जाइत अछि “सत्ता संग रहब, तऽ सुरक्षित रहब।”
सब सँ दुखद पक्ष ई अछि जे समाज धीरे-धीरे संवेदनहीन भऽ रहल अछि। घटना घटैत अछि, सोशल मीडिया पर शोर उठैत अछि, मोमबत्ती जरैत अछि, आऽ फेर सब किछु सामान्य भऽ जाइत अछि। पीड़िता के नाम किछु दिन चर्चा मे रहैत अछि, फेर ओ आंकड़ा बनि जाइत अछि एक संख्या, एक केस नंबर।
साहित्य एहन समय मे केवल मूकदर्शक नहि रहि सकैत अछि। साहित्य समाजक अंतःकरण होइत अछि। ओकर कर्तव्य अछि प्रश्न उठेबाक, सत्य उजागर करबाक, आऽ नैतिक साहस जगैबाक। जखन सत्ता अपराधी के बचाबय लगैत अछि, तऽ कलम के धार तेज होयबाक चाही। कियैक कि इतिहास गवाह अछि राजसत्ता कतेको बलवान रहैत अछि, मुदा अंततः सत्य आऽ न्यायक स्वर दबैल नहि जा सकैत अछि।
जरूरत अछि जे कानूनक प्रक्रिया स्वतंत्र आऽ निष्पक्ष हो। राजनीतिक हस्तक्षेप सँ मुक्त जाँच, त्वरित न्याय, आऽ पीड़िता के सम्मानजनक समर्थन ई केवल नारा नहि, बल्कि लोकतंत्रक मूल आधार अछि। यदि राजनीति मानवता सँ ऊपर उठि गेल, तऽ लोकतंत्र केवल ढांचा बनि कऽ रहि जायत।
समाज के भविष्य मात्र सड़क, पुल आऽ भवन सँ सुरक्षित नहि होयत, ओ न्याय, संवेदना आऽ नैतिकता सँ सुरक्षित होइत अछि। जँ बलात्कार आऽ हत्या जेकाँ अपराध राजनीतिक संरक्षणक छाया मे पोषित होइत रहत, तऽ हमरा सभ धीरे-धीरे भय आच्छादित समाज में प्रतिस्थापित मुक मूर्ति बनि जाएब जतय न्याय एक भ्रम आऽ सुरक्षा एक स्वप्न बनि जायत।
एहना समय में आवश्यकता अछि जागरूक नागरिक चेतना के, निर्भीक मीडिया के, आऽ संवेदनशील न्याय व्यवस्था के। राजनीति जँ सेवा बनत, तऽ समाज सुरक्षित रहत, मुदा जँ राजनीति संरक्षण बनत, तऽ अपराध पुष्पित-पल्लवित हाइत रहत।
अंततः यक्ष प्रश्न हमरा सभक समक्ष अछि हम चुप रहब, कि अन्याय के विरुद्ध स्वर बनब? कियैक कि जखन समाज बजैत अछि, तऽ सत्ता के रूमाल खसैत अछि आऽ न्यायक आँखि सँ पट्टी स्वतः हटि जाइत अछि।
