लेख विचार
प्रेषित: नीलम झा निवेधा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :–#विद्यापति
बिसफी गाममे विद्यापतिक नामक एकटा मैथिली भाषा केर महान कवि छलाह आ महादेवक बहुत पैघ भक्त छलाह।लोक कहैत छैथ जे नचारी आ महेशवाणी हुनके सँ शुरू भेल।ओ भक्ति-भावमे डुबीक बाबाक गीतक रचना करैत छलाह आ गबैत छलाह।हुनक भजन एहन होइत छल जकरा सुनि कैलाशपति बाबा भोलेनाथक आसन डोलय लगैत छलैन्ह। महादेव हुनक नचारी सुनि मुग्ध भ’ जाइत छलाह। एकदिन पार्वती महादेवक पुजाक ठाँउ सराय केलैन आ देखलैन जे घरमे तील नञि अछि।।पार्वती परिशान मोन सँ तील खोजबामे लाइग गेलिह जे आब भगवान विष्णुक पुजा बिनु तीलक कोना होयत । ओ देखल जे मृत्युभुवनमे तीलक गाछ छैक।ओ एकटा झाड़के उखारलैन आ ओहिके मीरक,झाइरक तीलक ओरियान केलैन।महादेव जखन पुजा करबालेल एलखिन त’ हुनका कहलखिन जे हे महादेव घरमे तील नञि छल,कहुनाक हम मृत्युभुवन सँ एकटा झाड़ अनलहुँ त’ आजुक पुजाक ओरियान केलहुँ।महादेव कहलखिन हे पार्वती ई की केलहुँ ? अनर्थ भगेल। एकत ओ ब्राह्मण दोसर बिनु कहने अहाँ तील ललेलहुँ।ताहुपर ओ हमर अनन्य भक्त।आब हमरा किछु दिन कवि कोकिल केर संग रहबा परत । तेँ हम मृत्यु लोक जा रहल छी। भोलेनाथ के अपन भक्ति के प्रति श्रद्धा आ तीलक ऋण देखि पार्वती किछु नहि बजलीह आ भोलेनाथ अपन रूप बदलि क गामक चरवाह उगना केर नाम सँ कवि विद्यापति के ओहिठाम उपस्थित भ गेलाह। विद्यापति परिचय पूछलथिन्ह त उगना कहैत छैन्ह सरकार हमर घर पहाड़ पर बहुत दुरमे अछि। परवतिया सँ वियाह केने छी तेँ हम गाय बरद केर सेबा बहुत नीक जकाँ क सकैत छी। विद्यापति ओकरा राखि लेलाह। आ एहि प्रकार सँ भक्त केर सेवा भगवान करय लगलाह। विद्यापति पुजा कालमे महादेवकेँ नचारी खूम भक्तिविभोर भए गबैथ आ महादेव खूम झुइम- झुइमक सभटा सुनैथ। किछु दिनुका बाद कैलाश में पार्वती के सन्देह भेलैन्ह जे महादेव आब महाकवि के छोड़ि क कैलाश वापस नहि अओताह। तखन ओ अपन तीन टा दूत क्रोध, पिपासा आ घमण्डकेँ एहि पृथ्वी पर पठेलनि। क्रोध आ अभिमान महाकवि केर पत्नी सुधीरा के अन्दर प्रवेश क लेलन्हि आ पिपासा अर्थात प्यास महाकवि के इर्द-गिर्द घुमय लागल। महाकवि अपन यजमान ओहिठाम जएवाक लेल रजवारा विदा भेलाह संग में उगना सैहो विदा भेल। रस्ता में एकटा सुनसान बाध रहैक जाहि ठाम महाकवि के शरीर में पिपासा प्रवेश क गेलखिन। महाकवि प्यास सँ छरपटाय लगलाह। उगना कहैत छथिन्ह जे सरकार किछु देर प्यास बर्दास्त करू किछु दूर बाद भवानीपुर गाम छैक ओहि ठाम जा कय भरि छाक पैन पिबि लेब। ई सुनि महाकवि किछु दूर हिम्मत कए चललाह आ किछुए कालक बाद प्यास सँ लटुआ क’ मूर्छित भए खसि पड़लाह । होश एलाक बाद उगना सँ कहलखिन्ह जे आब हमरा कतहु सँ पैन पिया नहिं त’ हमर प्राण निकलि जायत आ कहि क आँखि मुनि लेलाह। आब उगना परेशान भगेलाह । ओ किछु दूर जा क अपन असली रूप में आबि जटा सँ एक लोटा गंगाजल ल क उगना बनि महाकवि लग उपस्थित भ गेलाह आ महाकवि के जल पीया देलखिन मुदा जल पीवाक पश्चात् महाकवि आश्चर्य चकित भ गेलाह जे एहन निर्जन वनमेमे ई गंगाजल कतय सँ आयल? उगना सँ पूछलथिन्ह त ओ कहैत छथिन्ह जे मालिक बगलेमे एकटा डबरा छैक ओहिमे सँ ई जल अनलियै अछि। मुदा महाकवि अड़ि गेलाह आ कहलखिन जे हमरा त’ कतहु पैन नञि देखा रहल अछि। रौ उगना बूढ़ भेलहुँ पैन आ गंगाजलमे फर्क नञि बुझबैक की? सोझ मोन सँ कह ई जल कत सँ अनलहिन?उगना कहैत छथि जे एहि दुआरे लोक कहैत छैक जे पंडितजीकेँ ने आगाँ जाइ आ ने पाछाँ। सरकार। रजवारा नञि जेबाक अछि ? महाकवि कहैत छथिन्ह जे नहि हम त आब जाबेत ई नञि बुझबैक ताबत आगा नञि बढ़ब।उगना बूझि गेलाह जे आब ई नहि मानताह आ ओ महाकवि के अपन साक्षात रूप के दर्शन कराओल आ कहि देलखिन्ह जे ई बात अहाँ ककरो सँ नहि कहबैक। आ जाहि दिन कहबैक ताहि दिन हम अहाँ लग सँ चलि जायब। महाकवि शर्त मानि लेलाह आ जजमानक ओहि ठाम सँ अपन गाम आबि गेलाह। उगना सैहो पहिने जकाँ अपन कार्य में लागि गेलाह। मुदा विद्यापति त’ आब उगनाके सक्षात महादेव बुइझ हुनके सभ मोने मोन अर्पण कर लगलाह। एम्हर पार्वती के पठाओल अभिमान आ क्रोध सुधीरा के देह पर सबार भ गेलखिन। एक दिन बेलपात अनबामे उगना के विलम्ब होइत भगेलैन सुधीराके क्रोधक चरमसीमा पार भ’ गेलैन । ओ उगनाकेँ बड्ड फेज्जैत कैल।विद्यापतिकेँ ई बरदाश्त नञि होइन मुदा कहबैन महादेव छैथ त’ महादेव भाइग जेता ई सोइच चुप भ’ जाइथ।एकदिन सुधिरा चुइल्हपर भोजन बनबैत छलिह।उगना सँ कहलखिन जो भोजनक कराबालेल केराक पात काइटक लेने अबै। उगना विद्यापतिक नचारी सुनबामे मनोमग्न छल।नञि सुनलक ओ सुधिराक गप्प।सुधिराके बड्ड तामस उठलैन।ओ एकटा जरैत चेरा चुइल्ह सँ उठलैन आ उगनाके मारबालेल दौड़लिह।ई महाकविके बर्दास्त नञि होइत छैन्ह आ मुंह सँ एकाएक निकलि जाइत छैन्ह जे हाँ हाँ ई त’ साक्षात महादेव छैथ। हिनका अहाँ कोना मारि रहल छी। बस एतबामे महादेव अन्तर्ध्यान भ जाइत छैथि आ महाकवि विद्यापति विक्षिप्त भ जाइत छैथि। “उगना रे मोरा कतय गेलाह, कतय गेलाह शिव किदहु भेलाह करैत वन-वनमे बौआइत हुनका खोजबामे लाइग जाइत छैथ। मुदा उगना नञि भेटलखिन। ओ अन्न-पैन सेहो तेजी दैत छैथ, मुद्रा तैयो उगना नञि भेटलखिन। जखन ओ विरक्त भए खटबास ध’ लैत छथिन तखन गामक लोक अबैत छैन हुनकर अंतिम इच्छा पुछबालेल। ओ कहलखिन हमरा गंगा लाभ करबाक इच्छा अछि।
मुदा ओ त’ आब चलबा फिरबामे सेहो असमर्थ छलैथ।तखन सभ गामक लोकसभ हुनका खाटपर धेलक आ बिदा भेल गंगा। बहुतो दिन चललाक उपरांत सभ थाइक गेल। आ बैसगेल एकटा निर्जन सन जगहमे। ई जे देखल विद्यापति ओ गंगाक अवाहन ओतहि कर लगलाह। ओ गीतक माध्यम सँ गंगाक प्रार्थना कर लगलाह।
कत सुख सार पाओल तुअ तीरे
छोरैत निकट मोर नयन बहु नीरे
ई सुनि गंगा साक्षात ओत प्रगट भ’ गेलिह। पहिने विद्यापति सभ गामक लोक सहित सुधिराके गंगा स्नान करा गाम पठाओल। तखन अपने गंगामे समाधि ललेलैन।
धन्य छलैथ विद्यापति जिनकर चाकर बैन साक्षात महादेव एलखिन आ साक्षात गंगा अपन शरणमे समैट अंत केलखिन।
तैं लोक कहैत छैक जे ककरो तील ज्यों लेलहुँ वा खेलहुँ तऽ बहैइएटा परैत छै।
