लेख विचार
प्रेषित: आभा झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
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विषय :– मैथिल कोकिल विद्यापति
व्यक्तित्व आ कृतित्व केर धनी कवि-कुल-शिरोमणि, अभिनव जयदेव आ मैथिल कोकिलक नाम सँ विख्यात महाकवि विद्यापति ठाकुर अपन विलक्षण प्रतिभा सँ मैथिली साहित्यक युग प्रवर्तक मानल जाइत छथि। हिनकर जन्म मधुबनी जिलाक बिस्फी गाममे, अनुमानतः १३५० ई. क आस-पास भेल छल। हिनकर व्यक्तित्वमे दरबारी कवि, राज-पुरोहित, ज्योतिषी आ प्रकाण्ड विद्वानक समन्वय छल। ओ मिथिला नरेश राजा शिवसिंहक परम मित्र आ राजकवि छलाह। शिवसिंह हिनका ‘अभिनव जयदेव’ के उपाधि देने छलाह, आ ओहि युगमे हिनका ‘मैथिल कोकिल’के उपाधि सँ सेहो सुशोभित कैल गेल।
“देसिल बयना सब जन मिट्ठा। ते तैसन जम्पओ अवहट्ठा॥”
— विद्यापति (कीर्तिलता)
व्यक्तित्वक विशेषता –
विद्यापतिक व्यक्तित्व बहुआयामी छल। ओ संस्कृत, अवहट्ठ आ मैथिली तीनू भाषामे समान अधिकार रखैत छलाह। ओ दरबारी कवि रहितो लोक-जीवनक प्रति अगाध प्रेम रखैत छलाह। हिनकर कुशाग्र बुद्धि आ साहित्य, संगीत, दर्शन, न्याय आ ज्योतिषमे हिनकर गहन ज्ञानक प्रभाव हिनकर रचनामे साफ देखल जाइत अछि।
ओ केवल श्रृंगारिक कवि नहि छलाह, बल्कि शैव, शाक्त आ वैष्णव तीनू मतमे समान आस्था रखनिहार समन्वयवादी साधक सेहो छलाह। हिनकर व्यक्तिगत जीवन सेहो सरल, संयमित आ धर्मपरायण छल। ओ दरबारी कवि रहितो अपन रचनाक केन्द्रमे जन-सामान्यक भावना, लोक-व्यवहार आ मिथिलाक संस्कृति केँ स्थान देलनि।
कृतित्वक आयाम –
विद्यापतिक कृतित्वक व्यापकता तीनू भाषामे पसरल अछि, मुदा हिनकर ‘पदावली’ हिनका विश्व-साहित्यमे अमरता प्रदान केलक। हिनकर प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित अछि:
१. संस्कृत रचना
भूपरिक्रमण: भूगोल आ मिथिलाक क्षेत्रक वर्णन।
पुरुषपरीक्षा: नैतिक कथाक संग्रह।
गङ्गावाक्यावली: धार्मिक कृति।
दानवाक्यावली, विभागसार आदि।
२. अवहट्ठ रचना
कीर्तिलता: महाराज कीर्ति सिंहक शौर्य वर्णन। एहिमे तत्कालीन दरबारी जीवन, युद्ध आ अवहट्ठ भाषामे ‘देसिल बयना’ (देशी बचन)क प्रयोगक महत्ता बताओल गेल अछि।
कीर्तिपताका: कीर्तिसिंह आ शिवसिंहक युद्ध वर्णन आ प्रशस्ति।
३. मैथिली रचना (पदावली)
विद्यापतिक यशक मूल आधार ‘पदावली’ छी, जकर भाषा शुद्ध मैथिली अछि। ई पद राधा-कृष्णक प्रेम-लीला पर आधारित अछि।
शृंगार रस: पदावलीक अधिकांश पद शृंगार रससँ ओतप्रोत अछि। ओ राधाक रूप-सौन्दर्य, नव-यौवनक उदय (उपक्रम/संयोग) आ प्रेम-वियोग (विप्रलम्भ) क मर्मस्पर्शी चित्रण केने छथि। हिनकर शृंगारमे अश्लीलताक स्थान पर शालीनता आ कलात्मकता बेसी अछि।
“सखी हे की कहब मधुरिमाय।
सखि सब पूछइते ताहि, हमहि बिसरि गेलि दाय॥”
भक्ति रस: शृंगारिक पदमे सेहो भक्ति-भावक पुट रहलाक कारणेँ, बंगालक चैतन्य महाप्रभु आ अन्य भक्त कविगण हिनका वैष्णव कवि मानलनि। नचारी (भगवान शिवक स्तुति) आ विरुदावली (देवीक आराधना) क पद सेहो हिनकर भक्ति-भावक प्रमाण अछि।
गीति-तत्व: हिनकर पदमे संगीतात्मकता प्रमुख अछि। लोक-धुन, राग-रागिनी आ गेयताक कारणेँ ई पद मिथिलाक लोक-जीवनमे विवाह, पर्व-त्योहार आ पूजा-पाठमे आइयो जीबैत अछि।
विद्यापति आदिकाल आ भक्तिकालक मध्यमे एकटा सेतुक समान छथि। ओ दरबारी कविताक रूढिकेँ तोड़ि, लोक-भाषा मैथिलीकेँ साहित्यक उच्चतम शिखर पर पहुँचाओलनि। हिनकर पदावलीक भाव-संपदा आ भाषाक लालित्य हिनका केवल मैथिल कोकिल नहि, अपितु भारतीय साहित्यक एकटा अमर कवि बना देलक। ओ आइयो मिथिलाक सांस्कृतिक आ साहित्यिक पहचानक पर्याय छथि।
