लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- अतिथि सत्कार
माटिक महक आ मनुक्खक स्नेह “मिथिलाक आतिथ्य संस्कार”
मिथिला जनक-सीता-विद्यापतिक धरती,
जहाँक माटि सँ केवल धान आ पान नहि, संस्कारक सुवास उठैत अछि। एहि धरतीक प्राणवायु मे “अतिथि देवो भवः” के गूंज बसल अछि। अतिथि मिथिला में केवल आगन्तुक नहि, भाग्यक प्रतीक, देवता समान पूज्य मानल जाइत अछि। मिथिलाक लोकक हृदयक सहज स्नेह आ अपनापन एहि परम्पराक नींव अछि।
संस्कारक जड़ि में प्रेमक पराग के रूप मे मिथिलाक लोकजीवन मे आतिथ्य एक कर्म नहि, एक भावनात्मक प्रवाह अछि गृहस्थ जीवनक प्रथम धर्म मानल गेल “अतिथि सेवा।”
लोकक विश्वास अछि जे “अतिथि आयल, त’ लक्ष्मी आयल।” घर जँ अल्प साधनक हो, तऽ गृहिणी अपन अंश काटि अतिथि केँ परोसैत छथि। बाबूक कहावत छलैन्ह “घरमे अतिथि बैसल, त’ देवता बैसल।” ई मात्र उपदेश नहि, जीवनक अनुभव छल।
गामक आतिथ्य मानवताक मधुर स्वरूप होइछ, गामक सिकुरल गली सँ जखन अनजान पग घरक द्वार तक पहुँचैत अछि, त’ गृहिणी चूल्ही सुलगबैत, पानि गरम करैत, बाबा अपन पानक बट्टा सँ सुपारी निकालैत, बच्चा दौड़िके आसन बिछबैत अछि। ई दृश्य सभ मात्र स्वागत नहि मिथिलाक आत्मा अछि। लोक कहैत छथि “आतिथ्य में सुख छी, नित नव आनन्दक रास छी।”
धार्मिक आ दार्शनिक दृष्टिकोण दर्शाबैत अछि जे मिथिला धर्मक भूमि रहल अछि। सीरध्वज जनकक दरबार में जे आगन्तुक मुनि, योगी वा पथिक आबैत छलाह, ओ आदर, जल, आ आसनक पात्र बनैत छलाह। सीता स्वयं वाल्य कालहि सँ ई संस्कार सीखलनि “अतिथिक सेवा, देवक सेवा।” धर्मशास्त्रक उक्ति अछि “अतिथिदेवो भव” एहि भूमि पर केवल मंत्र नहि, व्यवहार बनि गेल।
एकर सभक झलक हमरा सभक लोकगीत आ परम्परा मे प्रतिबिम्बित होइत अछि। मिथिला मे जेठ-बैसाखक गर्मी हो या कातिकक ठंढ, अतिथि आयल त’ हृदयक दरवाजा खुलि जाइत अछि। लोकगीत गूँजि उठैत अछि “बरियाती देव एलाह, फूल बरसाउ, तोरण सजाउ।” खास कऽ विवाह, श्राद्ध, उपनयन, आ अन्नप्राशन सभ मे अतिथिक स्वागत पहिल कर्म मानल जाइत अछि। ओहि अवसर पर बुजुर्ग कहैत छथि “अतिथि सुखक बीज, जे घरमे बसै से धन्य।”
मिथिलाक कहावत, लोक-सूक्ति आ आस्थाक तऽ बाते किछु आर मिथिलाक लोकभाषा मे अनेक कहावत एहन अछि, जे आतिथ्यक भावना केँ सहज रूप सँ व्यक्त करैत अछि। “अतिथि अयला’ देव आयल,” “जे अतिथि केँ हँसाबय, से स्वर्ग देखत,” “घरमे अतिथि बिनु, घर सुनसान,” “अन्न अल्प हो, मनु वृहत्तर रह,” “अतिथि जँ सन्तुष्ट, त’ कुल पवित्र” इत्यादि इत्यादि। ई सब लोककथन केवल वचन नहि, सदियों सँ जीबैत आ अभ्यासित मूल्य अछि।
बदलैत समय आ परम्पराक निरंतरता के देखैत आईकाल्हि नगरीकरण, व्यस्तता आ सुविधा-सभ्यताक बीच आतिथ्यक रूप परिवर्तित भेल अछि। पहिने जे चूल्हिक धुँआ सँ उठैत स्नेह छल, से आब होटलक चाय सँ बदैल गेल अछि। तथापि मिथिलाक गाम आइयो धरि अपन माटिक महक जोगा रहल अछि। कोनो पथिक आयल, त’ एखनहुँ आवाज उठैत अछि “बैस लिअ, जल पीबू, विश्राम करू।” एहि एक वाक्य में मिथिलाक आत्मा बसल अछि।
साहित्यिक दृष्टि सँ विद्यापति, हरिमोहन झा, आ आधुनिक मैथिली कवि सभक रचनामे “अतिथि सत्कार” मात्र परम्परा नहि, मानवीय सौन्दर्यक प्रतीक बनल अछि। विद्यापति कहैत छथि “जे ठाम प्रेम आ भक्ति वसै, से ठाम ईश्वरक सानिध्य रहै।” एहि भावनाकेँ जतेक शब्दक रूपमे सजाओल जाए, ओतबे ओ आस्था आ अपनापनक मृदुल संगीत सुनाबैत अछि।
मिथिला में अतिथि सत्कार केवल परम्परा नहि ओ एक जीवित दर्शन अछि, जे मनुष्यक भीतर मानवता जगबैत अछि। ई धरती सिखबैत अछि “अतिथि केँ देवता बुझू, आ अपन हृदयक द्वार सदा खुलल राखू।” जखन धरि ई भावना जीवित रहत, तखन धरि मिथिलाक घर-आँगन सँ स्नेहक धूप मेटाएब असंभव अछि।
मिथिलाक अतिथि सत्कार संस्कारक सुवास, प्रेमक पराग, आ मानवताक उज्ज्वल दीप थिक। “मिथिलाक माटि कहैत अछि जे अतिथि केँ देवता मानै, ओ घरमे सदा सौभाग्य गमकैत रहै।”
जाहि “अतिथि देवो भवः” वाक्य खण्डक भावनासँ लोक जीवनक सहृदयता, स्नेह आ अपनापनक संचार होइत अछि। ओकर संदर्भ में अन्ततः कहब जे…..
जा धरि एहि भूमिक लोक हृदयमे प्रेम आ भक्ति जीवित रहत,
ता धरि मिथिलाक अतिथि-सत्कारक लौ भुकभुका नहि सकत।
मिथिला मे अतिथि देवता समान,
हृदयक द्वार सदा खुलल स्थान।
